हुमायूं कबीर की चेतावनी: 'आग से मत खेलो', गाय सहित सभी जायज पशुओं की कुर्बानी होगी — सुवेंदु अधिकारी पर निशाना
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल में खुले में नमाज और बकरीद की कुर्बानी को लेकर सियासी तापमान तेजी से बढ़ रहा है। आम जनता उन्नयन पार्टी के अध्यक्ष हुमायूं कबीर ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) और नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी को सीधी चेतावनी देते हुए कहा कि मुस्लिम समुदाय कुर्बानी के मामले में किसी भी हाल में कोई समझौता नहीं करेगा। यह विवाद 27 मई 2026 को पड़ने वाली बकरीद से ठीक पहले उभरा है।
हुमायूं कबीर का बयान
कबीर ने कहा, 'संविधान का सम्मान करना चाहिए, लेकिन कुर्बानी होगी — गाय की भी होगी, बकरे की भी होगी और ऊंट की भी होगी। कुर्बानी के लिए जो पशु जायज हैं, उनकी कुर्बानी होगी।' उन्होंने सुवेंदु अधिकारी को सीधे संबोधित करते हुए कहा, 'आग से मत खेलो।' उनके अनुसार, यदि कुर्बानी पर रोक लगाने की कोशिश हुई, तो इससे BJP के लिए ही मुश्किलें खड़ी होंगी।
स्लॉटर हाउस और बीफ निर्यात पर सवाल
कबीर ने तर्क दिया कि देश में 37 प्रतिशत से अधिक मुसलमान गाय का गोश्त खाते हैं और सरकार को पहले लाइसेंसशुदा स्लॉटर हाउस बंद करने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार बीफ का निर्यात कर विदेशी मुद्रा अर्जित कर रही है, ऐसे में केवल कुर्बानी पर आपत्ति उठाना दोहरा मापदंड है।
नमाज के लिए मैदान की माँग
कबीर ने यह भी कहा कि ईद की नमाज के लिए सरकार को बड़ा मैदान उपलब्ध कराना चाहिए। उनके अनुसार, यदि पर्याप्त स्थान की व्यवस्था नहीं होगी, तो समुदाय को सड़क पर नमाज पढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
BJP का पक्ष
सड़क पर नमाज के विरोध में BJP नेताओं का कहना है कि यह विवाद किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि तुष्टीकरण की राजनीति के खिलाफ है। उनका तर्क है कि यूएई, सऊदी अरब और ईरान जैसे इस्लामिक देशों में भी सार्वजनिक सड़कों पर नमाज पर प्रतिबंध है, इसलिए इस मुद्दे को धार्मिक नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
पश्चिम बंगाल सरकार का नोटिस
पश्चिम बंगाल सरकार ने बकरीद (27 मई) से पहले एक औपचारिक सार्वजनिक सूचना जारी की है, जिसमें फिटनेस प्रमाण पत्र के बिना गाय और भैंस के वध पर सख्त प्रतिबंध को दोहराया गया है। नोटिस के अनुसार, बिना प्रमाण पत्र के किसी भी बैल, बछड़े, गाय या भैंस का वध नहीं किया जा सकता। प्रमाण पत्र पर दो अलग-अलग अधिकारियों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं। उल्लंघन को संज्ञेय अपराध माना जाएगा, जिसके लिए छह महीने तक की कैद और ₹1,000 तक के जुर्माने का प्रावधान है। गौरतलब है कि यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब राज्य में सांप्रदायिक तनाव पहले से ही संवेदनशील स्थिति में है। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि प्रशासन कुर्बानी की अनुमति और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच किस प्रकार संतुलन बनाता है।