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डॉ. अंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता वैश्विक बहुपक्षवाद को सशक्त बना सकती है: पी. हरीश

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डॉ. अंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता वैश्विक बहुपक्षवाद को सशक्त बना सकती है: पी. हरीश

सारांश

अंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता का सिद्धांत आज की वैश्विक चुनौतियों के बीच बहुपक्षवाद को मजबूती प्रदान कर सकता है। पी. हरीश ने इसकी महत्ता पर प्रकाश डाला है।

मुख्य बातें

संवैधानिक नैतिकता बहुपक्षवाद के लिए आवश्यक है।
अंबेडकर का दृष्टिकोण संयुक्त राष्ट्र में सुधार में मदद कर सकता है।
भारत सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग कर रहा है।
अंबेडकर का संविधान सामाजिक न्याय का प्रतीक है।
यूएन में भारत की स्थायी सदस्यता महत्वपूर्ण है।

न्यूयॉर्क, 15 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने कहा है कि बीआर अंबेडकर द्वारा प्रस्तुत ‘संवैधानिक नैतिकता’ का सिद्धांत वर्तमान समय की संघर्षों और राजनीतिक विभाजनों से जूझती दुनिया में बहुपक्षवाद को मजबूती प्रदान कर सकता है।

मंगलवार को अंबेडकर जयंती के अवसर पर पी हरीश ने कहा कि भारतीय संविधान के निर्माता का नैतिकता और कानून के प्रति दृष्टिकोण जब बहुपक्षवाद पर लागू होता है, तो यह संयुक्त राष्ट्र में सुधार और पुनर्जीवित करने में सहायक हो सकता है।

अंबेडकर की 135वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में “डॉ. बीआर अंबेडकर का संवैधानिक नैतिकता का दृष्टिकोण और बहुपक्षवाद के लिए इसकी प्रासंगिकता” पर चर्चा हुई।

अंबेडकर के विचारों के विशेषज्ञ राजा शेखर वुंडरू ने बताया कि उन्होंने दो विश्व युद्धों और यूएन की स्थापना के दौरान बहुपक्षवाद की आवश्यकता को समझा।

हरियाणा सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव वुंडरू, जो “अंबेडकर, गांधी और पटेल: द मेकिंग ऑफ इंडियाज इलेक्टोरल सिस्टम” के लेखक हैं, ने कहा कि अंबेडकर द्वारा निर्मित भारतीय संविधान शांति के लिए यूएन के चार्टर की भावना का संवहन करता है।

अंबेडकर के संवैधानिक नैतिकता के विचार बहुपक्षवाद और यूएन चार्टर के अनुपालन को बढ़ावा देने में मदद कर सकते हैं।

हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल के विजिटिंग प्रोफेसर संतोष राउत ने कहा कि अंबेडकर संविधान को सामाजिक न्याय और आर्थिक बदलाव का माध्यम मानते थे, जो यूएन के लक्ष्यों के लिए आवश्यक हैं।

बौद्ध धर्म के विशेषज्ञ ने कहा कि नैतिकता वह बल है जो यूएन चार्टर जैसे दस्तावेजों की भावना को लागू करने में सहायक होती है और अंबेडकर ने इसकी पहले से ही कल्पना की थी।

इससे इतर, भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग कर रहा है। यूएन में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने यूएनएससी में दो-स्तरीय स्थायी सदस्यता के प्रस्ताव का विरोध किया और जी4 के सुधार के बाद 15 वर्षों के लिए वीटो पावर को टालने के प्रस्ताव पर सहमति जताई।

ज्ञात हो कि यूएनएससी में 'दो-स्तरीय' स्थायी सदस्यता प्रस्ताव नए सदस्यों के लिए स्थायी सीटों की एक नई श्रेणी बनाने का उल्लेख करता है। पी5 (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन) के पास वर्तमान में मौजूद वीटो पावर इन नए स्थायी सदस्यों में शामिल नहीं है। भारत इसका विरोध कर रहा है।

यूएन में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए पी हरीश ने कहा, "संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का ढांचा असंतुलित दिखता है, जिसके कारण इसकी वैधता और प्रतिनिधित्व पर सवाल उठते हैं, ये कारण हैं सदस्यता और वीटो प्रणाली। इन दोनों पहलुओं में सुधार की आवश्यकता है। यह स्पष्ट है कि लगभग 80 वर्ष पहले बना यह ढांचा आज की बदलती भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं है। इन मुद्दों पर पहले भी चर्चा हो चुकी है, विशेष रूप से वीटो व्यवस्था पर विचार-विमर्श अंतर-सरकारी वार्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है।"

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डॉ. बीआर अंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता क्या है?
डॉ. बीआर अंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता एक नैतिक सिद्धांत है जो मानवाधिकारों, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित है।
पी. हरीश ने अंबेडकर की नैतिकता के बारे में क्या कहा?
पी. हरीश ने कहा कि अंबेडकर का दृष्टिकोण बहुपक्षवाद को मजबूत कर सकता है और यह यूएन में सुधार में मदद कर सकता है।
भारत सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग क्यों कर रहा है?
भारत सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग कर रहा है क्योंकि वर्तमान ढांचा असंतुलित है और वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं है।
अंबेडकर का योगदान क्या है?
डॉ. अंबेडकर का योगदान भारतीय संविधान की रचना में है, जो सामाजिक न्याय और अधिकारों की रक्षा करता है।
यूएन में भारत की स्थायी सदस्यता का क्या महत्व है?
यूएन में भारत की स्थायी सदस्यता से भारत को वैश्विक निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा।
राष्ट्र प्रेस
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