फिजी में 125वीं रामलीला: नौसोरी में भव्य आयोजन, भारत-फिजी की साझा विरासत का जीवंत उत्सव
सारांश
मुख्य बातें
फिजी के नौसोरी स्थित बाबा राघो विष्णु कुटी में 26 जुलाई 2025 को 125वीं रामलीला का भव्य आयोजन हुआ, जिसे स्थानीय रूप से 'धारा पार' भी कहा जाता है। भारतीय उच्चायोग और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) ने श्री सनातन रामायण मंडली के सहयोग से इस ऐतिहासिक समारोह का आयोजन किया। सैकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में रामायण के विभिन्न प्रसंगों का मंचन कर बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव मनाया गया।
आयोजन का महत्व और पृष्ठभूमि
फिजी में रामलीला की यह परंपरा 100 से अधिक वर्षों पुरानी है। गिरमिटिया पूर्वजों — यानी वे भारतीय मजदूर जो 19वीं सदी में अनुबंध पर फिजी लाए गए थे — ने अपनी सांस्कृतिक पहचान जीवित रखने के लिए इस परंपरा की नींव रखी थी। नौसोरी स्थित बाबा राघो विष्णु कुटी और बुलिलेका रामलीला मंदिर इस परंपरा के दो प्रमुख ऐतिहासिक केंद्र हैं, जहाँ पारंपरिक रूप से 10 दिनों तक रामलीला का उत्सव मनाया जाता है।
यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है जब भारत और फिजी के बीच सांस्कृतिक एवं कूटनीतिक संबंध नई ऊँचाइयाँ छू रहे हैं। सुवा, नौसोरी और लाबासा — तीनों स्थानों पर रामलीला की यह जीवंत परंपरा प्रवासी भारतीय समाज की सांस्कृतिक जड़ों की गहराई को दर्शाती है।
उच्चायोग की प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया पोस्ट
फिजी स्थित भारतीय उच्चायोग ने रामलीला की तस्वीरें साझा करते हुए एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, "बाबा राघो विष्णु कुटी लंबे समय से आस्था और सांस्कृतिक विरासत के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित है। यह स्थल सेवा, एकता और आध्यात्मिक मूल्यों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ भारत और फिजी की साझी परंपराओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभा रहा है।"
उच्चायोग के अनुसार, 125वाँ यह आयोजन दोनों देशों के बीच साझा विरासत, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक जुड़ाव की अटूट निरंतरता का प्रतीक बना।
संत बाबा राघो दास जी की विरासत
इस समारोह में संत श्री बाबा राघो दास जी के तप और सनातन धर्म के लिए किए गए उनके अवदान को भी विशेष रूप से स्मरण किया गया। वे गिरमिटिया काल के प्रमुख धर्म प्रचारकों में से एक थे, जो 28 मार्च 1901 को नौसोरी के सवानी पहुँचे थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन सनातन धर्म की स्थापना, संरक्षण और उसके मूल्यों के प्रचार-प्रसार को समर्पित किया।
बाबा राघो दास जी के प्रयासों ने फिजी के प्रवासी भारतीय समाज में सनातन संस्कृति, रामायण परंपरा और सामुदायिक एकता को जीवित रखने में ऐतिहासिक योगदान दिया। आज भी उन्हें फिजी में भारतीय विरासत और आध्यात्मिक परंपराओं के सम्मानित प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।
भारत-फिजी सांस्कृतिक संबंध
यह आयोजन भारत और फिजी के बीच सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संबंधों की मजबूती का जीवंत प्रमाण है। गौरतलब है कि फिजी की कुल जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा भारतीय मूल के लोगों का है, जिनके पूर्वज गिरमिटिया प्रथा के तहत यहाँ आए थे। रामलीला जैसे सांस्कृतिक आयोजन इस समुदाय की पहचान और एकजुटता के सूत्र बने हुए हैं।
आगे भी इस परंपरा को और अधिक व्यापक रूप देने की दिशा में ICCR और भारतीय उच्चायोग के प्रयास जारी रहने की उम्मीद है।