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फिजी में 125वीं रामलीला: नौसोरी में भव्य आयोजन, भारत-फिजी की साझा विरासत का जीवंत उत्सव

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फिजी में 125वीं रामलीला: नौसोरी में भव्य आयोजन, भारत-फिजी की साझा विरासत का जीवंत उत्सव

सारांश

फिजी के नौसोरी में 125वीं रामलीला सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं — यह गिरमिटिया पूर्वजों की उस जिजीविषा का प्रमाण है जिन्होंने समुद्र पार भी अपनी संस्कृति की लौ बुझने नहीं दी। भारतीय उच्चायोग और ICCR के सहयोग से यह आयोजन भारत-फिजी की साझा विरासत का जीवंत उत्सव बना।

मुख्य बातें

नौसोरी, फिजी में 26 जुलाई 2025 को 125वीं रामलीला (धारा पार) का भव्य आयोजन हुआ।
भारतीय उच्चायोग और ICCR ने श्री सनातन रामायण मंडली के सहयोग से बाबा राघो विष्णु कुटी में समारोह आयोजित किया।
फिजी में रामलीला की परंपरा 100 से अधिक वर्षों पुरानी है, जिसकी शुरुआत गिरमिटिया भारतीय पूर्वजों ने की थी।
संत श्री बाबा राघो दास जी — जो 28 मार्च 1901 को नौसोरी पहुँचे थे — के योगदान को विशेष रूप से स्मरण किया गया।
पारंपरिक रूप से 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में रामायण के विभिन्न प्रसंगों का मंचन होता है।

फिजी के नौसोरी स्थित बाबा राघो विष्णु कुटी में 26 जुलाई 2025 को 125वीं रामलीला का भव्य आयोजन हुआ, जिसे स्थानीय रूप से 'धारा पार' भी कहा जाता है। भारतीय उच्चायोग और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) ने श्री सनातन रामायण मंडली के सहयोग से इस ऐतिहासिक समारोह का आयोजन किया। सैकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में रामायण के विभिन्न प्रसंगों का मंचन कर बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव मनाया गया।

आयोजन का महत्व और पृष्ठभूमि

फिजी में रामलीला की यह परंपरा 100 से अधिक वर्षों पुरानी है। गिरमिटिया पूर्वजों — यानी वे भारतीय मजदूर जो 19वीं सदी में अनुबंध पर फिजी लाए गए थे — ने अपनी सांस्कृतिक पहचान जीवित रखने के लिए इस परंपरा की नींव रखी थी। नौसोरी स्थित बाबा राघो विष्णु कुटी और बुलिलेका रामलीला मंदिर इस परंपरा के दो प्रमुख ऐतिहासिक केंद्र हैं, जहाँ पारंपरिक रूप से 10 दिनों तक रामलीला का उत्सव मनाया जाता है।

यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है जब भारत और फिजी के बीच सांस्कृतिक एवं कूटनीतिक संबंध नई ऊँचाइयाँ छू रहे हैं। सुवा, नौसोरी और लाबासा — तीनों स्थानों पर रामलीला की यह जीवंत परंपरा प्रवासी भारतीय समाज की सांस्कृतिक जड़ों की गहराई को दर्शाती है।

उच्चायोग की प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया पोस्ट

फिजी स्थित भारतीय उच्चायोग ने रामलीला की तस्वीरें साझा करते हुए एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, "बाबा राघो विष्णु कुटी लंबे समय से आस्था और सांस्कृतिक विरासत के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित है। यह स्थल सेवा, एकता और आध्यात्मिक मूल्यों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ भारत और फिजी की साझी परंपराओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभा रहा है।"

उच्चायोग के अनुसार, 125वाँ यह आयोजन दोनों देशों के बीच साझा विरासत, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक जुड़ाव की अटूट निरंतरता का प्रतीक बना।

संत बाबा राघो दास जी की विरासत

इस समारोह में संत श्री बाबा राघो दास जी के तप और सनातन धर्म के लिए किए गए उनके अवदान को भी विशेष रूप से स्मरण किया गया। वे गिरमिटिया काल के प्रमुख धर्म प्रचारकों में से एक थे, जो 28 मार्च 1901 को नौसोरी के सवानी पहुँचे थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन सनातन धर्म की स्थापना, संरक्षण और उसके मूल्यों के प्रचार-प्रसार को समर्पित किया।

बाबा राघो दास जी के प्रयासों ने फिजी के प्रवासी भारतीय समाज में सनातन संस्कृति, रामायण परंपरा और सामुदायिक एकता को जीवित रखने में ऐतिहासिक योगदान दिया। आज भी उन्हें फिजी में भारतीय विरासत और आध्यात्मिक परंपराओं के सम्मानित प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।

भारत-फिजी सांस्कृतिक संबंध

यह आयोजन भारत और फिजी के बीच सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संबंधों की मजबूती का जीवंत प्रमाण है। गौरतलब है कि फिजी की कुल जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा भारतीय मूल के लोगों का है, जिनके पूर्वज गिरमिटिया प्रथा के तहत यहाँ आए थे। रामलीला जैसे सांस्कृतिक आयोजन इस समुदाय की पहचान और एकजुटता के सूत्र बने हुए हैं।

आगे भी इस परंपरा को और अधिक व्यापक रूप देने की दिशा में ICCR और भारतीय उच्चायोग के प्रयास जारी रहने की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह भारत की सॉफ्ट पावर कूटनीति का एक सशक्त उदाहरण है — जहाँ ICCR और उच्चायोग की भागीदारी यह संकेत देती है कि सरकार प्रवासी भारतीय समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को रणनीतिक महत्व देती है। हालाँकि, यह भी विचारणीय है कि गिरमिटिया समुदाय ने यह परंपरा बिना किसी सरकारी सहयोग के एक सदी से अधिक समय तक जीवित रखी — संस्थागत समर्थन उसे और मजबूत करता है, लेकिन उसकी असली शक्ति तो उस समुदाय की जड़ों में है। यह आयोजन इस बात की याद दिलाता है कि सांस्कृतिक विरासत की सबसे मजबूत कड़ी राज्य नहीं, समाज होता है।
RashtraPress
26 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फिजी में 125वीं रामलीला का आयोजन कहाँ और कब हुआ?
यह आयोजन 26 जुलाई 2025 को फिजी के नौसोरी स्थित बाबा राघो विष्णु कुटी में हुआ। भारतीय उच्चायोग और ICCR ने श्री सनातन रामायण मंडली के सहयोग से इसे आयोजित किया।
फिजी में रामलीला की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई?
फिजी में रामलीला की शुरुआत 100 से अधिक वर्ष पहले गिरमिटिया भारतीय पूर्वजों ने की थी, जो 19वीं सदी में अनुबंध पर काम करने के लिए फिजी लाए गए थे। उन्होंने अपनी सांस्कृतिक पहचान जीवित रखने के लिए इस परंपरा की नींव रखी।
संत बाबा राघो दास जी कौन थे और फिजी में उनका क्या योगदान है?
संत श्री बाबा राघो दास जी गिरमिटिया काल के प्रमुख धर्म प्रचारक थे, जो 28 मार्च 1901 को नौसोरी के सवानी पहुँचे थे। उन्होंने अपना जीवन सनातन धर्म की स्थापना और फिजी के भारतीय समुदाय में सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं को मजबूत करने में समर्पित किया।
फिजी में रामलीला कितने दिनों तक चलती है और इसके प्रमुख केंद्र कौन से हैं?
पारंपरिक रूप से फिजी में रामलीला 10 दिनों तक मनाई जाती है, जिसमें रामायण के विभिन्न प्रसंगों का मंचन होता है। नौसोरी स्थित बाबा राघो विष्णु कुटी और बुलिलेका रामलीला मंदिर इसके दो प्रमुख ऐतिहासिक केंद्र हैं।
यह आयोजन भारत-फिजी संबंधों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
125वीं रामलीला भारत और फिजी के बीच साझा विरासत, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक जुड़ाव की निरंतरता का प्रतीक है। भारतीय उच्चायोग की सक्रिय भागीदारी इसे दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक कूटनीति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी बनाती है।
राष्ट्र प्रेस
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