संयुक्त राष्ट्र में भारत की चेतावनी: आतंकवाद से जुड़े देशों को संवेदनशील तकनीक न दें
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में 20 अक्टूबर 2026 को भारत ने विश्व समुदाय से आग्रह किया कि ऐसी संवेदनशील तकनीकों के हस्तांतरण को रोका जाए जिन्हें हथियारों के निर्माण में प्रयोग किया जा सकता है — विशेष रूप से उन देशों को, जिनका आतंकवाद से संबंध रहा है या जिन पर परमाणु प्रसार के आरोप लगते रहे हैं। जनता दल (यूनाइटेड) के सांसद और गोपालगंज लोकसभा क्षेत्र के प्रतिनिधि आलोक कुमार सुमन ने संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधिमंडल की ओर से यह वक्तव्य दिया।
भारत की मुख्य चिंता: आतंकवादियों तक WMD की पहुँच
सुमन ने समिति को संबोधित करते हुए कहा, 'भारत इस बात को लेकर बेहद चिंतित है कि कहीं सामूहिक विनाश के हथियार आतंकवादी संगठनों या गैर-राज्य तत्वों के हाथ न लग जाएं।' उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी सदस्य देशों को संवेदनशील तकनीक के हस्तांतरण या उसके प्रसार के मामले में सतर्कता बरतनी होगी — 'खासकर उन देशों के संदर्भ में जिनका परमाणु या अन्य तकनीकों के प्रसार का रिकॉर्ड रहा है।' हालाँकि सुमन ने सीधे तौर पर किसी देश का नाम नहीं लिया, परंतु संदर्भ पाकिस्तान की ओर स्पष्ट संकेत करता था। पाकिस्तान पर लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों को समर्थन देने के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं, और अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को वहाँ शरण मिलने का मसला भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया जाता रहा है।
संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव: भारत की दो दशक पुरानी पहल
सुमन ने समिति को याद दिलाया कि भारत 2002 से संयुक्त राष्ट्र में 'आतंकवादियों को सामूहिक विनाश के हथियार हासिल करने से रोकने के उपाय' शीर्षक से एक प्रस्ताव प्रस्तुत करता आ रहा है। यह प्रस्ताव अब तक सर्वसम्मति से पारित होता रहा है। इसमें सभी सदस्य देशों से अपील की जाती है कि वे आतंकवादियों को WMD (Weapons of Mass Destruction), उनसे जुड़ी तकनीक और उन्हें बनाने की सामग्री तक पहुँच रोकने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का समर्थन करें। गौरतलब है कि यह प्रस्ताव ऐसे समय में और अधिक प्रासंगिक हो गया है जब गैर-राज्य तत्वों की तकनीकी पहुँच वैश्विक सुरक्षा के लिए एक नई चुनौती बनती जा रही है।
रासायनिक व जैविक हथियार सम्मेलनों पर भारत का रुख
सुमन ने कहा कि भारत 'रासायनिक हथियार सम्मेलन' में ऐसे संशोधनों का समर्थन करता है जो निगरानी और सत्यापन प्रक्रिया को और अधिक मज़बूत बना सकें। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अब खतरा बढ़ रहा है — आतंकवादी जैसे गैर-राज्य तत्व भी रासायनिक और जैविक हथियार हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं। यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर दोहरे उपयोग वाली तकनीकों के व्यापार की निगरानी कमज़ोर पड़ने की चिंता जताई जा रही है।
नई दिल्ली सम्मेलन: ग्लोबल साउथ की भूमिका
अंतरराष्ट्रीय सहयोग के क्षेत्र में भारत की सक्रियता का उल्लेख करते हुए सुमन ने बताया कि पिछले दिसंबर में नई दिल्ली में 'जैविक हथियार सम्मेलन' की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें 80 देशों ने भाग लिया। यह संधि जैविक हथियारों के विकास, उत्पादन, भंडारण और हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाती है। सुमन के अनुसार, इस सम्मेलन ने जैविक सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य में भारत की क्षमता को उजागर किया और यह भी स्पष्ट हुआ कि आने वाले वर्षों में इस संधि को दिशा देने में ग्लोबल साउथ के देश महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।
आगे की राह
भारत का यह वक्तव्य संयुक्त राष्ट्र में उसकी दीर्घकालिक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है, जिसमें परमाणु और जैव-रासायनिक हथियारों के अप्रसार को वैश्विक सुरक्षा से जोड़ा जाता है। प्रथम समिति की यह बैठक निरस्त्रीकरण और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर केंद्रित है, और भारत के इस हस्तक्षेप से अपेक्षा है कि तकनीक हस्तांतरण पर अधिक कठोर अंतरराष्ट्रीय नियमों की माँग और तेज होगी।