क्या ईरान-अमेरिका संघर्ष से इंटरनेट ब्लैक आउट का खतरा है? भारत पर असर पड़ सकता है
सारांश
Key Takeaways
- ईरान-अमेरिका संघर्ष का इंटरनेट पर संभावित प्रभाव
- सबमरीन केबल्स की महत्वपूर्णता
- भारत में इंटरनेट की गति में गिरावट की संभावना
- बैंकिंग और ई-कॉमर्स पर प्रभाव
- केबल मरम्मत में समय और चुनौतियाँ
नई दिल्ली, 30 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे इस गंभीर टकराव का प्रभाव इंटरनेट केबल्स और सबमरीन केबल्स पर भी पड़ सकता है। यदि इस टकराव में इंटरनेट केबल्स को लक्ष्य बनाया जाता है, तो पूरी दुनिया के संचालन में रुकावट आ सकती है। वर्तमान समय में, सभी देशों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से इंटरनेट पर निर्भर है। इंटरनेट के माध्यम से विभिन्न हिस्सों के बीच संपर्क स्थापित होता है। इस स्थिति में यदि सबमरीन केबल्स पर हमला होता है, तो होने वाले नुकसान का आकलन करना भी कठिन होगा।
आइए हम यह समझते हैं कि सबमरीन केबल्स का अंतरराष्ट्रीय मार्ग क्या है और होर्मुज स्ट्रेट की वर्तमान स्थिति इसका क्या प्रभाव डाल सकती है। यदि सबमरीन केबल्स को नुकसान होता है, तो उन्हें पुनः चालू करने में कितना समय लगेगा? लगभग 95-97 प्रतिशत इंटरनेट की आपूर्ति इन्हीं सबमरीन केबल्स के माध्यम से होती है। यदि संघर्ष बढ़ता है और इन केबल्स को नुकसान पहुंचता है, तो भारत सहित कई देशों में इंटरनेट की गति बहुत कम हो सकती है या कुछ क्षेत्रों में पूरी तरह ठप भी हो सकती है। इंटरनेट की रुकावट से बैंकिंग, ऑनलाइन पेमेंट, ई-कॉमर्स, क्लाउड सर्विसेज, और एआई हब्स पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरी चोट लगेगी, जिससे उबरने में लंबा समय लगेगा।
इन इंटरनेट केबल्स का मार्ग तीन प्रमुख महासागरों, प्रशांत, हिंद, और अटलांटिक महासागर से होकर गुजरता है। इस में सबसे महत्वपूर्ण मार्ग लाल सागर और होर्मुज स्ट्रेट का है।
वास्तव में, हिंद महासागर में होर्मुज स्ट्रेट के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में 15 से 30 प्रतिशत तक का इंटरनेट सप्लाई होता है। सीमीवी-6, 2अफ्रीका (मेटा/फेसबुक), और ब्लू रमन (गूगल का प्रोजेक्ट) इसी मार्ग से भारत और यूरोप को जोड़ते हैं। 2अफ्रीका दुनिया का सबसे लंबा सबमरीन केबल सिस्टम (45,000 किमी) है। इस प्रोजेक्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा पूरा हो चुका है। हालांकि, हूतियों के हमलों और असुरक्षा के कारण पर्शियन गल्फ और लाल सागर में इस प्रोजेक्ट का आगे का काम रुका हुआ है। ब्लू रमन प्रोजेक्ट का अधिकांश हिस्सा पूरा हो चुका है, लेकिन लाल सागर के मार्ग में कार्य रुका है।
सीमवी-6, 21,700 किमी लंबी केबल सिंगापुर से फ्रांस तक बिछाई जा रही है। भारत में भारती एयरटेल इसके मुख्य भागीदारों में से एक है। भारती एयरटेल ने चेन्नई और मुंबई में इस केबल लाइन की लैंडिंग पूरी की है।
हिंद महासागर में रिलायंस जियो का प्रोजेक्ट सक्रिय है। रिलायंस जियो भारत-एशिया-एक्सप्रेस (आईएएक्स) और इंडिया-यूरोप-एक्सप्रेस (आईईएक्स) जैसे प्रोजेक्ट इसी मार्ग में हैं। यह केबल लाइन पूर्व में सिंगापुर और पश्चिम में यूरोप की दिशा में बिछाई जा रही है। रिलायंस जियो आईईएक्स को इस प्रकार तैयार कर रहा है कि लाल सागर में किसी भी समस्या के उत्पन्न होने पर ट्रैफिक को अन्य मार्गों पर मोड़ा जा सके।
अटलांटिक महासागर में मौजूद केबल लाइन अमेरिका और यूरोप के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यूरोप और अमेरिका के बीच यह सबसे व्यस्त मार्ग है। इस मार्ग पर 1858 में दुनिया की पहली ट्रांसअटलांटिक केबल बिछाई गई थी। इस मार्ग में एमएआरईए और एमिटी, गूगल के नूवेम जैसे प्रोजेक्ट हैं। इनकी क्षमता को बढ़ाने के लिए अभी कार्य चल रहा है।
इसके अलावा, प्रशांत महासागर में मौजूद इंटरनेट लाइन केबल्स अमेरिका और पूर्वी एशिया के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह मार्ग अमेरिका को जापान, चीन और ऑस्ट्रेलिया जैसे पूर्वी एशियाई देशों से जोड़ता है। जापान और अमेरिका के बीच इस मार्ग से फॉस्टर नाम की केबल मौजूद है, जो दोनों देशों को जोड़ती है। पैसिफिक कनेक्ट इनिशिएटिव (गूगल) प्रोजेक्ट के तहत इस मार्ग में 1 अरब डॉलर का निवेश किया जा रहा है। इसमें प्रोआ और तैहेई जैसे नए केबल्स पर काम हो रहा है।
इसके अतिरिक्त, इको और बिफ्रॉस्ट (मेटा/गूगल) के प्रोजेक्ट भी यहाँ हैं। ये केबल्स अमेरिका को सीधे इंडोनेशिया और सिंगापुर से जोड़ेंगे। यह पहली बार होगा जब दक्षिण-पूर्वी एशिया अमेरिका से सीधे जुड़ेगा। हवाईकी नुई के माध्यम से ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अमेरिका के बीच डेटा क्षमता को कई गुना बढ़ाने पर काम चल रहा है।
वर्तमान समय में जो तनावपूर्ण हालात बने हुए हैं, इसका सबसे ज्यादा असर लाल सागर और होर्मुज स्ट्रेट के मार्ग में होने वाला है। लाल सागर, एशिया और यूरोप के लिए सबसे महत्वपूर्ण कनेक्टिविटी है और यहाँ से लगभग 17 अत्यंत महत्वपूर्ण केबल्स गुजरती हैं। मौजूदा संघर्ष की स्थिति में सबमरीन केबल से संबंधित कई प्रोजेक्ट पर विराम लग गया है।
हाल में, फरवरी 2024 में हूती के हमलों के कारण लाल सागर में सीकॉम, टीजीएन, और एएई-1 जैसी 4 प्रमुख केबल कट गई थीं। इसके कारण एशिया और यूरोप के बीच का 25 प्रतिशत इंटरनेट ट्रैफिक प्रभावित हुआ। इन केबल्स को पूरी तरह ठीक होने में लगभग 5 महीने (जुलाई 2024 तक) लग गए। युद्ध क्षेत्र होने के कारण बीमा कंपनियों और मरम्मत करने वाले जहाजों (केबल शिप) ने वहाँ जाने से मना कर दिया था। परमिट मिलने और सुरक्षा सुनिश्चित करने में महीनों लग गए।
इससे पहले जनवरी 2022 में टोंगा ज्वालामुखी विस्फोट के कारण प्रशांत महासागर में टोंगा देश को दुनिया से जोड़ने वाली एकमात्र सबमरीन केबल कट गई। पूरा देश इंटरनेट ब्लैकआउट में चला गया। केबल को पुनः जोड़ने में 5 हफ्ते (37 दिन) का समय लगा। समुद्र के नीचे जमा ज्वालामुखी की राख और मलबे के कारण केबल के सिरों को खोजना मुश्किल हो गया था।