कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2026: भारत की विकास क्षमता और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर से बढ़ रहा वैश्विक निवेशकों का भरोसा
सारांश
मुख्य बातें
कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2026 में 4 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में एकत्रित वैश्विक अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों ने एकस्वर में कहा कि भारत की मजबूत विकास क्षमता, सुदृढ़ इंफ्रास्ट्रक्चर और जनसांख्यिकीय शक्ति उसे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की प्राथमिक पसंद बना रही है। भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और वैश्विक व्यापार दबावों के बावजूद विशेषज्ञों ने भारत को उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सबसे स्थिर और संभावनाशील गंतव्य बताया।
सम्मेलन का परिदृश्य और बढ़ती भागीदारी
स्वीडिश अर्थशास्त्री एरिक बर्गलोफ ने कहा कि वे इस सम्मेलन से इसकी स्थापना के समय से जुड़े हैं और वर्षों में इसकी गुणवत्ता तथा अंतरराष्ट्रीय भागीदारी में उल्लेखनीय सुधार आया है। उनके अनुसार, इस बार पहले की तुलना में कहीं अधिक देशों और प्रतिनिधियों की उपस्थिति देखने को मिल रही है।
बर्गलोफ ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियाँ अत्यधिक अनिश्चित हैं और ऊर्जा, व्यापार तथा आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़े जोखिमों के बीच अर्थव्यवस्थाओं को अधिक लचीला व सक्षम बनाना समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
भारत की विकास संभावनाएँ और राजकोषीय चुनौतियाँ
एरिक बर्गलोफ ने कहा, 'भारत की विकास संभावनाएँ मजबूत हैं और कोविड-19 के बाद देश ने प्रभावशाली आर्थिक गति हासिल की है।' हालाँकि उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि ईरान से जुड़े संघर्ष और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर भारत समेत कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा है।
उन्होंने आगे बताया कि सरकार ने आम लोगों और कारोबारों को राहत देने के प्रयास किए हैं, लेकिन इससे राजकोषीय दबाव भी बढ़ सकता है। वैश्विक संकटों के बीच विकास गति बनाए रखना नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।
जलवायु परिवर्तन और भारत-ब्राजील सहयोग
ब्राजील स्थित क्लाइमेट पॉलिसी इनिशिएटिव के कार्यकारी निदेशक जुलियानो असुन्साओ ने कहा कि आज दुनिया के सामने सबसे बड़ा साझा जोखिम जलवायु परिवर्तन है। उनके अनुसार, 'जलवायु संकट किसी एक देश का मुद्दा नहीं है और इससे निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य होगा।'
असुन्साओ ने कहा कि भारत और ब्राजील न केवल जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना कर रहे हैं, बल्कि BRICS जैसे मंचों के ज़रिये मजबूत संस्थागत संबंध बना कर समाधान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय कंपनियों का ब्राजील में निवेश भी बढ़ रहा है और दोनों देशों के बीच विकास, कृषि तथा सतत आर्थिक वृद्धि जैसे साझा मुद्दों पर सहयोग की संभावनाएँ प्रबल हैं।
मुक्त व्यापार और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था
न्यूज़ीलैंड के अर्थशास्त्री प्रो. जॉन गिब्सन ने कहा कि कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मंच बन चुका है, जहाँ एशिया-प्रशांत क्षेत्र और वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े सार्थक प्रश्नों पर विचार होता है। उन्होंने दुनिया में बढ़ती अनिश्चितता के बीच मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को स्थिरता का आधार बताया।
गौरतलब है कि गिब्सन ने भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच हाल ही में संपन्न मुक्त व्यापार समझौते का उल्लेख करते हुए इसे नियम-आधारित और अधिक व्यवस्थित आर्थिक सहयोग का जीवंत उदाहरण बताया।
जापानी निवेशकों की नज़र में भारत
जापान के इंस्टीट्यूट ऑफ जियोइकॉनॉमिक्स के निदेशक काजुतो सुजुकी ने कहा कि आज के दौर में अर्थव्यवस्था, भू-राजनीति और जियोइकॉनॉमिक्स आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि चीन के साथ जटिल संबंधों के चलते जापानी उद्योग लंबे समय से भारत को एक महत्वपूर्ण और संभावनाओं से भरे बाजार के रूप में देख रहे हैं।
सुजुकी के अनुसार, बड़ी संख्या में जापानी कंपनियाँ भारत में निवेश अवसर तलाश रही हैं और देश को दीर्घकालिक विकास एवं विनिर्माण केंद्र के रूप में देखती हैं। उन्होंने कहा कि भारत की बाजार क्षमता, जनसांख्यिकीय ताकत और आर्थिक विस्तार की संभावनाएँ विदेशी निवेशकों को लगातार आकर्षित कर रही हैं।
यह सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हुआ है जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में पुनर्गठन तेज हो रहा है और भारत 'चाइना प्लस वन' रणनीति के प्रमुख लाभार्थी के रूप में उभर रहा है। विशेषज्ञों की राय से साफ है कि अगले कुछ वर्षों में भारत में विदेशी निवेश का प्रवाह और तेज हो सकता है।