कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2026: भारत की विकास दर सराहनीय, पर वैश्विक अनिश्चितताओं से सावधानी जरूरी
सारांश
मुख्य बातें
5वें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2026 में नई दिल्ली के अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों ने 4 अक्टूबर 2026 को एकमत से कहा कि भारत की आर्थिक प्रगति प्रभावशाली बनी हुई है, किंतु मध्य पूर्व में तनाव, रूस-यूक्रेन संघर्ष और अमेरिकी नीतियों में बदलाव जैसी वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच आर्थिक लचीलेपन को प्राथमिकता देना अपरिहार्य हो गया है। 'प्रवाह के युग में सुदृढ़शीलता' विषय के तहत 3 से 5 अक्टूबर 2026 तक आयोजित इस सम्मेलन में सरकारी अधिकारियों, उद्योगपतियों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों की व्यापक भागीदारी देखी गई।
सम्मेलन का महत्व और विषय-वस्तु
वाशिंगटन डीसी स्थित अर्थशास्त्री एवं व्यवसाय विशेषज्ञ प्रो. प्रवीण कृष्णा ने कहा कि यह सम्मेलन बिल्कुल सही समय पर आयोजित हो रहा है। उनके अनुसार, दुनिया इस समय जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियों से जूझ रही है और इन हालात में सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारें और उद्योग जगत लगातार बदलती परिस्थितियों में अपनी अर्थव्यवस्था को किस प्रकार मजबूत और सुरक्षित रखें।
उन्होंने स्पष्ट किया कि मध्य पूर्व में तनाव, रूस-यूक्रेन संघर्ष और अमेरिकी नीतियों में उभरते बदलाव वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं और ऊर्जा बाजारों को सीधे प्रभावित कर रहे हैं। इन तीनों मोर्चों पर अनिश्चितता एक साथ बने रहने की स्थिति को उन्होंने 'असाधारण' बताया।
भारत की आर्थिक प्रगति: सराहना के साथ सतर्कता
प्रो. प्रवीण कृष्णा ने कहा, 'भारत की आर्थिक प्रगति पिछले वर्षों में काफी प्रभावशाली रही है और यह देश की आर्थिक नीतियों और प्रबंधन की सफलता को दर्शाती है।' हालाँकि, उन्होंने आगाह किया कि अच्छी वृद्धि दर के बावजूद कई मौजूदा चुनौतियाँ बरकरार हैं और कुछ नई चुनौतियाँ भविष्य में भी उभर सकती हैं।
उन्होंने इस बात को सकारात्मक संकेत बताया कि सम्मेलन में सरकारी अधिकारी, उद्योग जगत और नीति निर्माता संभावित जोखिमों को लेकर पूरी तरह जागरूक दिखे। विभिन्न पक्ष जोखिम न्यूनीकरण, वैकल्पिक व्यवस्थाओं के निर्माण और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के उपायों पर गंभीरता से विचार करते दिखे।
विविधीकरण: व्यापार और ऊर्जा दोनों में
प्रो. कृष्णा ने रेखांकित किया कि वर्तमान वैश्विक माहौल में केवल एक या दो बाजारों अथवा ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर रहना जोखिम को बढ़ावा देता है। उनके अनुसार, देशों को व्यापारिक साझेदारों और ऊर्जा आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने को प्राथमिकता देनी होगी।
उन्होंने कहा कि जोखिम प्रबंधन, वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाओं का निर्माण और विभिन्न देशों के साथ आर्थिक संबंधों को प्रगाढ़ करना आने वाले दशक की महत्वपूर्ण रणनीतियाँ होंगी — और यही विषय इस सम्मेलन की चर्चाओं के केंद्र में भी रहा।
कृषि क्षेत्र की चुनौतियाँ: सूखे का असर
इंस्टीट्यूट फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज (ISEC) के कृषि विकास एवं ग्रामीण परिवर्तन केंद्र के प्रमुख प्रो. परमोद कुमार ने कहा कि कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव केवल अर्थशास्त्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सार्थक संवाद का मंच भी है। उन्होंने कहा कि इसमें बड़ी संख्या में शोधार्थी, पीएचडी छात्र, शिक्षाविद, नौकरशाह और नीति निर्माता भाग ले रहे हैं, जिससे युवा शोधकर्ताओं को विशेषज्ञों की सोच से सीधे रू-ब-रू होने का अवसर मिलता है।
प्रो. परमोद कुमार ने कृषि क्षेत्र पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत के कई राज्यों, जिनमें महाराष्ट्र भी शामिल है, में सूखे जैसी परिस्थितियों का असर खरीफ फसलों पर स्पष्ट रूप से देखने को मिला है। कर्नाटक सहित कई जिलों में बुवाई के दौरान उर्वरकों की माँग में तीव्र वृद्धि हुई, जिससे किसानों को लंबी कतारों का सामना करना पड़ा।
उनके अनुसार, मौसम से जुड़ी चुनौतियाँ न केवल कृषि उत्पादन बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सीधे प्रभावित करती हैं — इसीलिए कृषि क्षेत्र में बेहतर नियोजन और संसाधन प्रबंधन की दिशा में ठोस कदम उठाना आज के समय की माँग है। सम्मेलन के नतीजे और विशेषज्ञों की सिफारिशें आने वाले नीति-विमर्श को नई दिशा दे सकती हैं।