ट्रंप-किम मुलाकात की घोषणा और वांग यी की सोल यात्रा से कोरियाई प्रायद्वीप पर कूटनीतिक हलचल तेज
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 20 अगस्त 2025 को घोषणा की कि वे इस वर्ष उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन से मुलाकात करेंगे, जबकि इसी दौरान चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने सोल में दक्षिण कोरियाई विदेश मंत्री चो ह्यून से मिलकर कोरियाई प्रायद्वीप में बीजिंग की 'रचनात्मक भूमिका' की पुनः पुष्टि की। इन दोनों घटनाक्रमों ने एक साथ यह स्पष्ट कर दिया है कि कोरियाई प्रायद्वीप एक बार फिर वैश्विक महाशक्तियों की कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुका है।
ट्रंप का बयान और किम से संभावित वार्ता
व्हाइट हाउस में तकनीकी नेताओं के साथ आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने कहा, 'मेरे रिश्ते किम के साथ बहुत अच्छे हैं। न उन्हें ओबामा पसंद थे, न बाइडेन, लेकिन पता नहीं क्यों मुझे वो पसंद करते हैं।' उन्होंने जापान और दक्षिण कोरिया के साथ अमेरिकी सैन्य अभ्यास पर भी सवाल उठाए, यह कहते हुए कि यह उत्तर कोरिया के साथ संबंधों के लिए उचित नहीं था।
गौरतलब है कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में 2018 और 2019 में दोनों नेताओं के बीच तीन मुलाकातें हो चुकी हैं, परंतु उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर कोई स्थायी समझौता नहीं हो सका था। इस बार परिस्थितियाँ कहीं अधिक जटिल हैं।
परमाणु क्षमता पर आकलन में बड़ा अंतर
ट्रंप के अनुसार उत्तर कोरिया के पास 57 'बहुत शक्तिशाली' परमाणु हथियार हैं। वहीं, दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री आन ग्यू-बैक ने संसद में कहा कि प्योंगयांग के पास आम तौर पर 80 से 120 परमाणु हथियार होने का अनुमान लगाया जाता है। परमाणु क्षमता के इस विरोधाभासी आकलन से ही संभावित वार्ता की जटिलता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
उत्तर कोरिया अब केवल परमाणु कार्यक्रम विकसित करने वाला देश नहीं रहा — वह अपने परमाणु हथियारों को अपनी शासन-व्यवस्था की निरंतरता और राष्ट्रीय सुरक्षा से अभिन्न रूप से जोड़ चुका है। यह बदलाव किसी भी भावी ट्रंप-किम वार्ता को पहले से कहीं अधिक कठिन बनाता है।
चीन की रणनीतिक चाल
वांग यी की सोल यात्रा को महज शिष्टाचार भेंट नहीं कहा जा सकता। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने दक्षिण कोरियाई विदेश मंत्री चो ह्यून से मुलाकात में कहा कि 'चीन शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने में रचनात्मक भूमिका निभाता रहेगा।' उन्होंने उत्तर और दक्षिण कोरिया के धीरे-धीरे सह-अस्तित्व की ओर बढ़ने की इच्छा भी जताई।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने 1950-53 के कोरियाई युद्ध को औपचारिक रूप से समाप्त करने के लिए बहुपक्षीय बातचीत का प्रस्ताव रखा है। यह युद्ध युद्धविराम के साथ रुका था, परंतु दोनों कोरियाई देश तकनीकी रूप से आज भी युद्ध की स्थिति में हैं।
अमेरिका और चीन की अलग-अलग प्राथमिकताएँ
वाशिंगटन की प्राथमिकता उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को नियंत्रित करना और अपने दक्षिण कोरियाई व जापानी सहयोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। पूर्वी एशिया में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति की रीढ़ इन्हीं गठबंधनों पर टिकी है।
बीजिंग के लिए तस्वीर भिन्न है। चीन उत्तर कोरिया को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पड़ोसी मानता है, लेकिन वह किसी भी ऐसे संकट से बचना चाहता है जो उसकी सीमा पर अस्थिरता पैदा करे या अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को उसके और करीब ले आए। इसीलिए बीजिंग की प्राथमिकता तनाव नियंत्रित रखना और बातचीत के लिए रास्ता खुला रखना है।
दक्षिण कोरिया की दोहरी चुनौती और आगे की राह
इस पूरी कूटनीतिक खींचतान में सोल की स्थिति सबसे संवेदनशील है। उसकी सुरक्षा अमेरिका के साथ सैन्य गठबंधन पर निर्भर है, जबकि चीन उसका सबसे बड़ा आर्थिक साझेदार है। यदि ट्रंप-किम वार्ता में दक्षिण कोरिया की सुरक्षा चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिला, तो सोल के लिए यह अवसर नहीं, बल्कि संकट बन सकता है।
ट्रंप-किम संपर्क और वांग यी की सोल यात्रा को एक साथ देखने पर तस्वीर स्पष्ट होती है — एक ओर अमेरिका सीधे प्योंगयांग तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है, दूसरी ओर चीन यह संकेत दे रहा है कि कोरियाई प्रायद्वीप की शांति-प्रक्रिया में बीजिंग की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आने वाले महीनों में यह कूटनीतिक त्रिकोण और अधिक निर्णायक मोड़ ले सकता है।