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क्या म्यांमार में सैन्य शासन के तहत चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं?

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क्या म्यांमार में सैन्य शासन के तहत चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं?

सारांश

म्यांमार में सैन्य जुंटा के तहत हो रहे चुनावों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। विशेषज्ञ इसे एक दिखावटी प्रक्रिया मानते हैं, जिसमें वास्तविक लोकतंत्र के लिए कोई जगह नहीं है। क्या ये चुनाव देश में किसी बदलाव की संभावनाएं दिखाते हैं? जानिए इस रिपोर्ट में।

मुख्य बातें

म्यांमार में चुनाव सैन्य जुंटा के अधीन हो रहे हैं।
इन चुनावों को पश्चिमी विश्लेषकों द्वारा दिखावटी प्रक्रिया कहा गया है।
मतदान केंद्रों पर सुरक्षा बढ़ाई गई है।
यांगही ली का कहना है कि ये चुनाव फर्जी हैं।
लोगों में मतदान को लेकर उत्साह की कमी है।

लंदन, 6 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। म्यांमार में सैन्य जुंटा के नियंत्रण में आयोजित किए जा रहे हालिया चुनावों को लेकर गंभीर चिंताएँ उठी हैं। पश्चिमी राजनयिक और विश्लेषक इन चुनावों को एक “पैंटोमाइम” यानि केवल दिखावटी प्रक्रिया करार दे रहे हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैधता प्राप्त करना। एक रिपोर्ट के अनुसार, 28 दिसंबर से 25 जनवरी तक तीन चरणों में होने वाले ये चुनाव देश में किसी वास्तविक बदलाव की संभावना को प्रदर्शित नहीं करते।

यूके के प्रमुख अखबार द टेलीग्राफ की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बीजिंग यह मानता है कि उसके पड़ोस में एक अस्थिर और आपराधिक राज्य अस्वीकार्य है, लेकिन म्यांमार में चल रहे चुनाव न तो स्वतंत्र हैं और न ही निष्पक्ष।

रिपोर्ट में बताया गया है कि मतदान केंद्रों के बाहर हथियारबंद पुलिस तैनात है और लोगों को मतदान के लिए प्रेरित करने वाले उत्साही संगीत वीडियो लगातार चल रहे हैं, हालाँकि देश के प्रमुख शहर यांगून में मतदान के प्रति लोगों में विशेष उत्साह नहीं है।

यह 2020 के बाद म्यांमार का पहला चुनाव है, जब भारी मतदान के चलते लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची की पार्टी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। इसके विपरीत, मौजूदा चुनावों में यांगून और मांडले में मतदान की संख्या बहुत कम है।

द टेलीग्राफ से बातचीत करते हुए एक 32 वर्षीय महिला ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “मैं वोट नहीं देना चाहती, लेकिन वोट न देने से डर लगता है। अगर मैंने वोट दिया तो ऐसा लगेगा जैसे मैं अपने ही विश्वासों से धोखा कर रही हूं। और अगर वोट नहीं दिया तो डर है कि मेरा नाम दर्ज हो जाएगा और बाद में पूछताछ हो सकती है। हर फैसला खतरनाक लगता है।”

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सैन्य तख्तापलट को अब लगभग पांच वर्ष हो चुके हैं, जिसने सू ची की लोकप्रिय सरकार को अपदस्थ कर दिया था। इसके परिणामस्वरूप देश में भीषण संघर्ष, आर्थिक बर्बादी और गहरे सामाजिक संकट ने म्यांमार को झकझोर दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक सुधारों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने के बजाय, जुंटा का पूरा जोर लोगों को किसी तरह मतदान के लिए मजबूर करने पर है, न कि देश की गंभीर समस्याओं के समाधान पर।

संयुक्त राष्ट्र की पूर्व विशेष दूत यांगही ली ने कहा, “यह सैन्य शासन द्वारा दशकों से रचे जा रहे फर्जी चुनावों की श्रृंखला का सबसे खराब उदाहरण है। इनका उद्देश्य लोकतांत्रिक स्थान को दोबारा खोलना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वह कभी खुले ही नहीं।”

उन्होंने चेतावनी दी कि ये चुनाव “न तो स्वतंत्र हैं और न ही निष्पक्ष” और इनके नतीजे पहले से तय हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह स्पष्ट है कि म्यांमार में चुनावों का आयोजन एक दिखावटी प्रक्रिया है। सैन्य शासन के तहत हो रहे ये चुनाव न तो स्वतंत्रता और न ही निष्पक्षता का ध्यान रखते हैं। हमें इस स्थिति पर गहरी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यह न केवल म्यांमार के लोगों के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
RashtraPress
6 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या म्यांमार के चुनाव स्वतंत्र हैं?
नहीं, म्यांमार में हो रहे चुनावों को स्वतंत्र नहीं माना जा रहा है।
इन चुनावों का उद्देश्य क्या है?
इन चुनावों का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैधता प्राप्त करना है।
यांगही ली ने इन चुनावों पर क्या कहा?
यांगही ली ने कहा कि ये चुनाव फर्जी चुनावों की श्रृंखला का सबसे खराब उदाहरण हैं।
क्या मतदान केंद्रों पर सुरक्षा है?
हाँ, मतदान केंद्रों पर हथियारबंद पुलिस तैनात है।
क्या लोग मतदान को लेकर उत्साहित हैं?
नहीं, यांगून में मतदान को लेकर लोगों में खास उत्साह नहीं है।
राष्ट्र प्रेस
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