नेपाल में बालेंद्र शाह के खिलाफ जेन-जी का विद्रोह: 4 महीने में इस्तीफे की मांग, 15,000 बेघर
सारांश
मुख्य बातें
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के खिलाफ देश की जेन-जी पीढ़ी एक बार फिर सड़कों पर उतर आई है। 18 जुलाई 2026 को काठमांडू में हुए युवा विरोध प्रदर्शनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि सत्ता संभालने के चार महीने से भी कम समय में शाह सरकार गंभीर जनाक्रोश का सामना कर रही है। गौरतलब है कि यही जेन-जी आंदोलन था जिसने पिछले वर्ष केपी ओली की सरकार को सत्ता से बाहर कर बालेंद्र शाह को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाया था।
मुख्य घटनाक्रम
विरोध की आग को सबसे पहले भड़काया काठमांडू में नदी किनारे बसी झुग्गी बस्तियों पर चले बुलडोजर अभियान ने। रिपोर्टों के अनुसार, अप्रैल 2026 से शुरू हुए इस बेदखली अभियान में 2,600 से अधिक घर ध्वस्त किए गए, जिससे 15,000 से ज़्यादा लोग बेघर हो गए। आलोचकों का कहना है कि सरकार ने बिना किसी ठोस पुनर्वास योजना के बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को उनके घरों से बेदखल कर दिया।
इसी बीच गणेश नेपाली नामक 25 वर्षीय राइड-शेयरिंग चालक की मौत ने जनाक्रोश को और धधका दिया। रिपोर्टों के अनुसार, काठमांडू पुलिस ने पार्किंग नियम उल्लंघन के आरोप में उनकी मोटरसाइकिल का पहिया जाम कर दिया, जिसके बाद उन्होंने खुद को आग लगा ली और उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने पूरे नेपाल में आक्रोश की लहर पैदा कर दी।
सरकार पर आरोप और दमन की खबरें
बेघर हुए लोगों के समर्थन में शांतिपूर्वक आवाज़ उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। रिपोर्टों के अनुसार, हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं के साथ थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया गया — एक आरोप जो सरकार की छवि को और धूमिल कर रहा है। इसके अलावा, सरकारी सुरक्षा वाहन द्वारा मीडिया गेट को अवरुद्ध करने की घटना ने भी व्यापक आलोचना बटोरी।
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) — जो शाह की अपनी पार्टी है — के भीतर भी असंतोष के स्वर सुनाई दे रहे हैं, जो सरकार की राजनीतिक स्थिति को और कमज़ोर करता है।
बेरोज़गारी और किसानों का असंतोष
नेपाल में बेरोज़गारी लंबे समय से एक ज्वलंत मुद्दा रहा है। सितंबर 2025 के जेन-जी आंदोलन के दौरान भी युवाओं की यह प्रमुख माँग थी। आलोचकों का कहना है कि शाह सरकार के नए बजट और आर्थिक नीतियों में बेरोज़गारी से निपटने के लिए कोई ठोस प्रावधान नहीं किया गया। इसके साथ ही देश के किसानों ने भी मौजूदा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है, जिससे असंतोष का दायरा और व्यापक हो गया है।
आम जनता पर असर
जेन-जी आंदोलन ने शाह को सत्ता तक पहुँचाते समय बड़े सपने देखे थे। शुरुआती दिनों में वीआईपी संस्कृति के खिलाफ उठाए गए कुछ कदमों ने सुर्खियाँ भी बटोरीं, लेकिन झुग्गी बस्तियों के विध्वंस, युवा चालक की मौत और कार्यकर्ताओं पर कथित दमन ने उस उम्मीद को गहरी चोट पहुँचाई है। यह ऐसे समय में आया है जब नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था पहले से ही अस्थिर मानी जाती है — बीते कई वर्षों में किसी भी प्रधानमंत्री ने अपना पूरा कार्यकाल नहीं पूरा किया है।
क्या होगा आगे
नेपाल में इस्तीफे की माँग तेज़ होती जा रही है। यदि जनदबाव इसी तरह बना रहा, तो राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार बालेंद्र शाह का पद पर बने रहना कठिन हो सकता है। नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता का इतिहास देखते हुए, आने वाले हफ्ते देश की सत्ता की दिशा तय करने में निर्णायक साबित हो सकते हैं।