पाकिस्तान की मध्यस्थता: अमेरिका-ईरान वार्ता में क्यों आया संकट?

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पाकिस्तान की मध्यस्थता: अमेरिका-ईरान वार्ता में क्यों आया संकट?

सारांश

पाकिस्तान ने अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच मध्यस्थता का दावा किया, लेकिन ईरान ने वार्ता से इनकार कर दिया। जानिए इस संकट का कारण और पाकिस्तान की स्थिति को।

Key Takeaways

  • पाकिस्तान की मध्यस्थता की स्थिति संदेहास्पद हो गई है।
  • ईरान ने पाकिस्तान को अस्वीकार किया।
  • भारत का विपक्ष पाकिस्तान की भूमिका का विरोध कर रहा है।
  • पाकिस्तान की स्थिति वार्ता की सफलता पर निर्भर करेगी।
  • अमेरिका का पाकिस्तान के प्रति कर्ज का दबाव है।

नई दिल्ली, 10 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। पाकिस्तान ने अभी तो अमेरिका-ईरान संघर्ष के बीच एक शांतिदूत बनने की कोशिश में खुद को पीठ थपथपाने का मौका भी नहीं दिया था कि अचानक उसकी चिंता की लकीरें उभरने लगीं। जो पाकिस्तान अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर कराने का दावा कर रहा था, वह अब इजरायल के खिलाफ अपने बयानों के कारण चिंतित है। दूसरी ओर, ईरान, जिसे वह अपना शुभचिंतक बनाने की कोशिश कर रहा था, पाकिस्तान के इस बिचौलिये व्यवहार को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। ईरान ने इस्लामाबाद में अमेरिका के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करने से स्पष्ट इनकार कर दिया है।

भारत पहले से ही यह कहता आ रहा है कि अमेरिका और चीन दोनों ने अपने लाभ के लिए पाकिस्तान को सीजफायर की बंदूक के रूप में इस्तेमाल किया है। अमेरिका ने इस युद्ध में अब तक इतना बड़ा नुकसान उठाया है, जिसकी उसने उम्मीद भी नहीं की थी। ऐसे में, अमेरिका इस युद्ध से सम्मानजनक तरीके से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है और इसके लिए उसने पाकिस्तान को बिचौलिया बनाया है। वहीं, चीन के कर्ज के बोझ तले दबी पाकिस्तान को भी पता है कि उसे अपने गले में फंदा लगने से बचाने के लिए चीन की मदद चाहिए।

अमेरिका ने चालाकी से ईरान से वार्ता के लिए पाकिस्तान को चुना, जबकि इसके किसी भी शीर्ष नेता या अधिकारी ने 2006 के बाद से सुरक्षा कारणों से पाकिस्तान का दौरा नहीं किया है। इससे स्पष्ट है कि अमेरिका जानता था कि यदि वह सीजफायर के लिए सहमत नहीं होता तो वह सुरक्षा के नाम पर अपने लोगों को वार्ता के लिए इस्लामाबाद नहीं भेजेगा और इस वार्ता की असफलता की जिम्मेदारी पाकिस्तान पर डाल दी जाएगी। लेकिन पाकिस्तान ने यह नहीं सोचा था कि ईरान भी इस्लामाबाद आने से इनकार कर देगा और उसकी भद्द पिट जाएगी।

भारत का विपक्ष भले ही कई मुद्दों पर सरकार के साथ न हो, लेकिन सीजफायर के लिए पाकिस्तान की 'दलाल' की भूमिका पर सरकार के साथ खड़ा है। प्रियंका चतुर्वेदी और शशि थरूर जैसे वरिष्ठ भारतीय नेताओं ने पाकिस्तान की इस स्थिति पर तीखा कटाक्ष किया है। प्रियंका चतुर्वेदी ने स्पष्ट रूप से बताया कि कैसे पाकिस्तान अमेरिका का पालतू जानवर बना हुआ है। वहीं, शशि थरूर ने कहा कि कई संकेत हैं जो दिखाते हैं कि इस प्रक्रिया में असली फैसले कहीं और से लिए जा रहे हैं, और पाकिस्तान केवल एक मुखौटा है।

शशि थरूर ने यह भी कहा कि पाकिस्तान एक ऐसी भूमिका निभा सकता है, जिसमें अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम हो, जबकि दोनों युद्धग्रस्त देशों को यह भी न लगे कि वे एक-दूसरे के सामने झुक रहे हैं।

दूसरी ओर, पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इजरायल और यहूदियों के खिलाफ कुछ ऐसा कह दिया कि इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू भड़क उठे और पाकिस्तान को सीधी चेतावनी दे दी। यह पाकिस्तान के लिए अब चिंता का विषय बन गया है। पाकिस्तान जानता है कि इजरायल अमेरिका नहीं है और वह अपनी मातृभूमि और अपने लोगों के खिलाफ अपमान सहन नहीं करेगा। ख्वाजा आसिफ ने इजरायल के खिलाफ आग उगलते हुए कहा, "मैं उम्मीद करता हूं कि जिन लोगों ने फिलिस्तीनी धरती पर इस कैंसर जैसे राज्य का निर्माण किया है, वे यूरोपीय यहूदियों से छुटकारा पाएं।" इसके बाद ख्वाजा आसिफ अपनी पोस्ट डिलीट कर मैदान छोड़कर भाग गए।

अभी तक पाकिस्तान को अपनी सीमाओं पर संकट का सामना करना पड़ रहा था, लेकिन उसे पता है कि इजरायल से दुश्मनी उसे महंगी पड़ सकती है। पाकिस्तान के पश्चिम में ईरान है, जो युद्ध से जूझ रहा है, और पूर्व में भारत है, जिसके साथ पाकिस्तान के संबंध हमेशा से तनावपूर्ण रहे हैं।

अब पाकिस्तान की मध्यस्थता पर नजर डालें तो ईरान और इजरायल से इस मध्यस्थता के लिए उसे फटकार मिली है। ईरान ने पाकिस्तान को आतंकवादी ठिकानों का पनाहगार मानते हुए बार-बार फटकार लगाई है। अमेरिका ने पाकिस्तान को इस सीजफायर के लिए मोहरा बनाने का फैसला किया है क्योंकि उसने पाकिस्तान को भारी कर्ज दे रखा है।

इस्लामाबाद में होने वाली ईरान-अमेरिका बातचीत की स्थिति यह है कि ईरान ने स्पष्ट किया है कि जब तक लेबनान पर हमले नहीं रुकेंगे, कोई बातचीत नहीं होगी।

ईरान और अमेरिका दोनों ही सीजफायर के बाद अपनी-अपनी जीत का दावा कर चुके हैं, लेकिन हार पाकिस्तान की है। यदि वार्ता असफल होती है और सीजफायर टूटता है, तो पाकिस्तान के लिए ईरान एक बड़ा दुश्मन बन जाएगा।

पाकिस्तान ने इस मध्यस्थता में अपनी पूरी राजनीतिक पूंजी लगा दी है। अगर बातचीत विफल होती है, तो यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ी हार साबित होगी।

पाकिस्तान को यह भी पता है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच कोई ठोस समझौता नहीं होता, तो उसके पास इतनी ताकत नहीं है कि वह अमेरिका और ईरान को इस समझौते को मानने के लिए मजबूर कर सके।

Point of View

NationPress
11/04/2026

Frequently Asked Questions

पाकिस्तान ने अमेरिका-ईरान वार्ता में क्या भूमिका निभाई?
पाकिस्तान ने वार्ता का मध्यस्थ बनने की कोशिश की, लेकिन ईरान ने उसे स्वीकार नहीं किया।
ईरान ने पाकिस्तान को क्यों अस्वीकार किया?
ईरान ने पाकिस्तान के बिचौलिये व्यवहार को स्वीकार नहीं किया और वार्ता में भाग लेने से इनकार कर दिया।
भारत का इस स्थिति पर क्या दृष्टिकोण है?
भारत का विपक्ष पाकिस्तान की बिचौलिया भूमिका की आलोचना कर रहा है और सरकार के साथ खड़ा है।
क्या पाकिस्तान की स्थिति और भी खराब हो सकती है?
अगर वार्ता असफल होती है, तो पाकिस्तान को ईरान के खिलाफ एक बड़ा दुश्मन बनना पड़ सकता है।
अमेरिका ने पाकिस्तान को क्यों चुना?
अमेरिका ने पाकिस्तान को भारी कर्ज के कारण चुना ताकि उसे अपने हितों के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
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