यूएन कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तान की ईसाई लड़कियों पर जबरन धर्मांतरण का मुद्दा उठा, हर साल 1,000 मामले
सारांश
मुख्य बातें
जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (यूएनओजी) में हाल ही में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तान में ईसाई और हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों एवं महिलाओं के विरुद्ध जबरन धर्मांतरण, अपहरण और बाल विवाह की व्यवस्थित समस्या को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया गया। मानवाधिकार संगठन जुबली कैंपेन द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का शीर्षक था — 'पाकिस्तान में मानवाधिकार: जबरन धर्मांतरण और बाल विवाह को संबोधित करना।' यहाँ पेश किए गए आँकड़ों के अनुसार पाकिस्तान में हर साल कम से कम एक हजार अल्पसंख्यक लड़कियों का अपहरण कर जबरन धर्म बदला जाता है और निकाह कराया जाता है।
कार्यक्रम का स्वरूप और वक्तागण
इस कार्यक्रम का संचालन जुबली कैंपेन की कम्युनिकेशन एसोसिएट हिल्डा फार्मिंगटन ने किया। पैनल में जुबली कैंपेन के जोसेफ जानसेन, अल्पसंख्यक मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक प्रोफेसर निकोलस लेवरेट और यूरोपियन सेंटर फॉर लॉ एंड जस्टिस (ईसीएलजे) के एडवोकेसी ऑफिसर क्रिस्टोफ फोल्टजेनलोगेल शामिल थे। तुर्किए में रह रही पत्रकार उजाय बुलुत ने पीजे मीडिया में रिपोर्ट किया कि फार्मिंगटन ने बताया कि जमीनी हकीकत में यह आँकड़ा आधिकारिक दस्तावेज़ीकरण से कहीं अधिक हो सकता है।
पीड़ित परिवारों की गवाही
कार्यक्रम के दौरान अंबर नदीम, मारिया शहबाज और सताइश मरियम के माता-पिता ने अपनी बेटियों के लापता होने की दर्दनाक दास्तान सुनाई। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान में पुलिस में शिकायत दर्ज कराना बेहद कठिन रहा और अदालतों से कोई राहत नहीं मिली। परिवारों ने न्यायिक एवं पुलिस प्रक्रियाओं में लंबी देरी और अपहरणकर्ताओं की हिरासत में रखी गई नाबालिग बच्चियों की असुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपनी बेटियों की वापसी के लिए हस्तक्षेप करने की अपील की।
विशेषज्ञों की चिंताएँ और कानूनी खामियाँ
प्रोफेसर निकोलस लेवरेट ने जबरन धर्मांतरण और शादी को धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रभावित करने वाली गंभीर समस्या बताया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की जिम्मेदारी है कि वह अपने मानवाधिकार दायित्वों को स्वयं लागू करे और अंतरराष्ट्रीय समर्थन केवल आवश्यकता पड़ने पर ही लिया जाए। क्रिस्टोफ फोल्टजेनलोगेल ने रेखांकित किया कि पाकिस्तान में बाल संरक्षण, धार्मिक स्वतंत्रता और बाल विवाह के विरुद्ध पहले से ही कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन इन्हें लागू नहीं किया जा रहा — यही मूल संकट है।
दस्तावेज़ीकृत मामले: पंजाब और सिंध सबसे अधिक प्रभावित
जोसेफ जानसेन ने बताया कि जुबली कैंपेन ने 2019 से 2025 के बीच ऐसे 210 मामलों का दस्तावेज़ीकरण किया है। 'स्टोलन गर्ल्स' शीर्षक वाली प्रस्तुति में सामने आया कि दर्ज किए गए अधिकांश मामले पंजाब और सिंध प्रांत से हैं। उन्होंने बताया कि पीड़िताएँ कानूनी विवाह योग्य उम्र से कम थीं और अपहरणकर्ता अधिकतर अधिक उम्र के पुरुष थे। कुछ मामलों में पुलिस ने शुरुआत में शिकायत दर्ज करने से भी इनकार किया।
सिंध में हिंदू बहनों का मामला: ताज़ा उदाहरण
गौरतलब है कि पिछले महीने एक प्रमुख अल्पसंख्यक अधिकार संगठन ने पाकिस्तान के सिंध प्रांत में दो नाबालिग हिंदू बहनों के अपहरण का मामला उठाया था। वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (वीओपीएम) के अनुसार, परिवार ने आरोप लगाया कि 13 और 14 साल की रूपी और सीता का सिंध के टंडो अल्लाहयार जिले की इब्राहिम कॉलोनी से अपहरण कर लिया गया, जबरन इस्लाम कबूल करवाया गया और अमजद सोलंगी व मंसूर सोलंगी नामक दो व्यक्तियों से निकाह करवाया गया। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने दोनों बहनों को उनके परिवार को तत्काल सौंपने के बजाय एक सुरक्षित आश्रय स्थल (सेफ हाउस) भेज दिया, जिससे परिवार की चिंताएँ और बढ़ गईं। यह मामला इस बात का ताज़ा उदाहरण है कि यूएन मंच पर उठाई गई समस्याएँ ज़मीन पर किस तरह दोहराई जा रही हैं।