पाकिस्तान में अल्पसंख्यक महिलाओं के जबरन धर्म परिवर्तन पर यूएन का कड़ा रुख, 75%25 पीड़ित हिंदू
सारांश
Key Takeaways
- संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने 23 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान में अल्पसंख्यक महिलाओं के जबरन धर्म परिवर्तन पर गंभीर चेतावनी जारी की।
- 2025 में जबरन धर्म परिवर्तन की पीड़ित महिलाओं में 75%25 हिंदू और 25%25 ईसाई समुदाय से थीं।
- लगभग 80%25 घटनाएं पाकिस्तान के सिंध प्रांत में दर्ज हुईं, जहां 14 से 18 वर्ष की लड़कियां मुख्य निशाना हैं।
- यूएन ने विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष करने और जबरन धर्म परिवर्तन को अलग आपराधिक अपराध घोषित करने की मांग की।
- विशेषज्ञों ने कहा कि दंडमुक्ति का माहौल और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की निष्क्रियता इस समस्या को बढ़ावा दे रही है।
- पीड़ितों के लिए सुरक्षित आश्रय, कानूनी सहायता, मनोवैज्ञानिक परामर्श और पुनर्वास की मांग भी की गई।
जिनेवा, 23 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं और लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और जबरन विवाह की बढ़ती घटनाओं को लेकर कड़ी चेतावनी जारी की है। विशेषज्ञों ने कहा कि दंडमुक्ति (इम्प्यूनिटी) का व्यापक माहौल इस अमानवीय प्रथा को पूरे देश में निर्बाध रूप से जारी रखने का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है।
आंकड़े जो चौंकाते हैं
वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार, जबरन विवाह के माध्यम से धर्म परिवर्तन का शिकार हुई महिलाओं और लड़कियों में लगभग 75 प्रतिशत हिंदू धर्म से थीं, जबकि शेष 25 प्रतिशत ईसाई समुदाय से संबंधित थीं। इनमें से करीब 80 प्रतिशत घटनाएं पाकिस्तान के सिंध प्रांत में दर्ज की गईं।
विशेषज्ञों ने बताया कि 14 से 18 वर्ष की आयु की लड़कियों को विशेष रूप से निशाना बनाया जाता है। कुछ मामलों में तो इससे भी कम उम्र की बच्चियां इस क्रूर प्रथा का शिकार हुई हैं।
दंडमुक्ति और प्रणालीगत भेदभाव
यूएन विशेषज्ञों ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी भी व्यक्ति का धर्म या आस्था परिवर्तन पूर्णतः स्वैच्छिक और दबावमुक्त होना चाहिए। इसी तरह विवाह तभी वैध माना जा सकता है जब दोनों पक्षों की स्वतंत्र और पूर्ण सहमति हो। उन्होंने रेखांकित किया कि यदि पीड़िता नाबालिग है, तो ऐसी सहमति कानूनी दृष्टि से मान्य ही नहीं होती।
विशेषज्ञों ने इन उल्लंघनों के पैमाने और निरंतरता को देखते हुए कहा कि यह पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध प्रणालीगत भेदभाव का प्रमाण है, जहां उन्हें मुस्लिम पुरुषों से विवाह के लिए इस्लाम कबूल करने पर मजबूर किया जाता है।
उन्होंने कहा, "ये महिलाएं और लड़कियां निरंतर भय के वातावरण में जीती हैं, उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वायत्तता छीन ली जाती है — यह स्थिति तत्काल समाप्त होनी चाहिए।"
गरीबी और सामाजिक हाशियाकरण बढ़ाता है खतरा
विशेषज्ञों ने बताया कि गरीबी और सामाजिक हाशिए पर रहने वाली महिलाओं एवं लड़कियों के लिए यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है। उन्हें शारीरिक व यौन उत्पीड़न, सामाजिक कलंक और गहरे मनोवैज्ञानिक आघात का सामना करना पड़ता है।
यह उल्लेखनीय है कि सिंध प्रांत में हिंदू अल्पसंख्यकों की बड़ी आबादी निवास करती है और यह क्षेत्र वर्षों से इस प्रकार की घटनाओं का केंद्र रहा है। मानवाधिकार संगठनों ने पहले भी इस पर चिंता जताई है, लेकिन पाकिस्तान सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई अब तक नदारद रही है।
यूएन की पाकिस्तान सरकार से मांगें
संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने पाकिस्तान सरकार से निम्नलिखित ठोस कदम उठाने की अपील की है:
— सभी प्रांतों और क्षेत्रों में विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष निर्धारित की जाए।
— जबरन धर्म परिवर्तन को एक पृथक और गंभीर आपराधिक अपराध के रूप में परिभाषित किया जाए।
— मानव तस्करी और यौन हिंसा से संबंधित कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए।
— सभी आरोपों की निष्पक्ष और प्रभावी जांच हो और दोषियों को दंडित किया जाए।
विशेषज्ञों ने यह भी चिंता जताई कि कई मामलों में कानून प्रवर्तन एजेंसियां पीड़ित परिवारों की शिकायतों को नजरअंदाज कर देती हैं, समय पर जांच या अभियोजन नहीं होता, और पीड़िताओं की सही उम्र का आकलन भी नहीं किया जाता।
पीड़ितों के लिए व्यापक सहायता की मांग
विशेषज्ञों ने पाकिस्तान सरकार से पीड़ितों के लिए लैंगिक दृष्टि से संवेदनशील और समावेशी सहायता सेवाएं सुनिश्चित करने की मांग की है। इसमें सुरक्षित आश्रय, कानूनी सहायता, मनोवैज्ञानिक परामर्श और पुनर्वास कार्यक्रम शामिल होने चाहिए।
अंत में विशेषज्ञों ने आगाह किया कि पाकिस्तान सरकार ने अब तक इस समस्या की जड़ों — पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचा, लैंगिक असमानता, गरीबी, सामाजिक बहिष्कार, अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भेदभाव, धार्मिक असहिष्णुता और दंडमुक्ति — को दूर करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा, "धर्म या आस्था की स्वतंत्रता और समानता बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए सुनिश्चित की जानी चाहिए।"
यूएन की इस रिपोर्ट के बाद अंतरराष्ट्रीय दबाव में आए पाकिस्तान की प्रतिक्रिया और संभावित नीतिगत बदलावों पर दुनिया की नजर बनी रहेगी।