पाकिस्तान में ईसाई लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन: 14 वर्षीय के अपहरण ने खोली क्रूर व्यवस्था की पोल
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन और जबरन विवाह की एक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है — एक 14 वर्षीय ईसाई लड़की के गायब होने ने उस सुनियोजित तंत्र को एक बार फिर उजागर किया है जो अल्पसंख्यक समुदाय की नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाता है। रिपोर्टों के अनुसार, यह मामला अकेला नहीं है — यह एक ऐसे व्यापक पैटर्न का हिस्सा है जिसमें अपहरण, जाली दस्तावेज, पुलिस की मिलीभगत और न्यायिक उदासीनता मिलकर काम करती है।
निशा बीबी का मामला: दस्तावेजी धोखे की दास्तान
घरों में काम करने वाली निशा बीबी को एक विवाहित मुस्लिम व्यक्ति अपने साथ ले गया। रिपोर्टों के अनुसार, उसने निशा की चिकित्सकीय स्थिति का फायदा उठाया, कथित तौर पर जबरदस्ती उनका धर्म परिवर्तन कराया और उनसे विवाह कर लिया। जब निशा के पिता अब्बास मसीह — जो एक दिहाड़ी मजदूर हैं — पुलिस के पास पहुँचे, तो उन्हें ऐसे दस्तावेज दिखाए गए जिनमें दावा किया गया था कि निशा ने महीनों पहले स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन किया और विवाह किया।
अब्बास मसीह ने कहा, हम सबूत के तौर पर दिखाए गए कथित धर्म परिवर्तन प्रमाण-पत्र और शादी के दस्तावेज देखकर हैरान रह गए।
उन्होंने जोर देकर कहा कि ये सभी दस्तावेज मनगढ़ंत थे और अपराधी को सजा से बचाने के लिए तैयार किए गए थे। इससे भी आगे, मजिस्ट्रेट के सामने एक बयान पेश किया गया जिसमें दावा किया गया कि निशा 18 वर्ष की हैं और अपने परिवार से सुरक्षा माँग रही हैं।
जिया लियाकत का मामला: सीमा पार तक फैला जाल
अप्रैल 2026 में, 16 वर्षीय ईसाई लड़की जिया लियाकत को उस समय अगवा कर लिया गया जब उसके माता-पिता खेतों में काम कर रहे थे। कुछ सप्ताह बाद जिया के पिता को दुबई से एक व्यक्ति का व्हाट्सएप संदेश आया जिसमें मामले की पैरवी न करने की धमकी दी गई। रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की और कथित तौर पर जिया की शादी संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में एक मुस्लिम व्यक्ति से ऑनलाइन करा दी गई। यह मामला सीमा-पार हेरफेर, स्थानीय मिलीभगत और पुलिस की निष्क्रियता के उस पैटर्न को रेखांकित करता है जो इन मामलों में बार-बार सामने आता है।
अदालत का विवादास्पद फैसला और बिशपों की चिंता
25 मार्च 2026 को पाकिस्तान की फेडरल कॉन्स्टिट्यूशनल कोर्ट की दो-सदस्यीय पीठ ने ईसाई लड़की मारिया बीबी और मुस्लिम युवक शहरयार अहमद के विवाह को वैध ठहरा दिया। अदालत ने मारिया के पिता शाहबाज मसीह की वह याचिका खारिज कर दी जिसमें उन्होंने कहा था कि उनकी लगभग 13 वर्षीय बेटी को जुलाई 2025 में गैर-कानूनी तरीके से बंधक बनाया गया था। अदालत ने माना कि कानून कम उम्र में विवाह के लिए दंड का प्रावधान करता है, लेकिन ऐसे विवाहों को स्वतः अमान्य नहीं माना जाता।
इस फैसले के बाद पाकिस्तान कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस (PCBC) ने गहरी चिंता व्यक्त की। PCBC के अध्यक्ष बिशप सैमसन शुकार्डिन ने कहा कि अगवा की गई ईसाई लड़कियों से जुड़े मामलों में कानून के अनुसार सुनवाई नहीं हो रही। लाहौर के कैथोलिक आर्कबिशप खालिद रहमत OFM Cap ने एक अलग 'विरोध और तत्काल खंडन बयान' जारी कर अदालत के फैसले पर नाराजगी जताई।
व्यवस्थागत पैटर्न: धर्म को हथियार बनाने की रणनीति
रिपोर्टों के अनुसार, पीड़ित ज्यादातर 12 से 17 वर्ष की नाबालिग होती हैं जिन्हें अगवा किया जाता है, धमकाया जाता है और जबरन विवाह के लिए मजबूर किया जाता है। बाद में जाली धर्म परिवर्तन प्रमाण-पत्रों के जरिए इन विवाहों को कानूनी मान्यता दे दी जाती है। रिपोर्टों में कहा गया है कि यौन हिंसा को छिपाने के लिए धर्म परिवर्तन का उपयोग किया जाता है, जबकि पुलिस और अदालतें लापरवाही या मिलीभगत के जरिए अपराधियों को संरक्षण देती हैं। गौरतलब है कि इस तंत्र में अपहरण, जबरदस्ती, जाली दस्तावेज और न्यायिक मान्यता — ये चारों तत्व एक साथ काम करते हैं।
आगे क्या होगा
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने पाकिस्तान सरकार से बाल विवाह निरोधक कानूनों को समान रूप से लागू करने और अल्पसंख्यक समुदायों को न्यायिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की माँग की है। PCBC ने स्पष्ट किया है कि जब तक अदालतें 18 वर्ष से कम आयु के विवाहों को अमान्य घोषित नहीं करतीं, तब तक यह व्यवस्था बेरोकटोक जारी रहेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना जवाबदेही तंत्र के, पाकिस्तान में अल्पसंख्यक लड़कियों की सुरक्षा महज कागजी वादा बनी रहेगी।