पाकिस्तान: 13 वर्षीय ईसाई लड़की की कस्टडी कथित अपहरणकर्ता को, मेडिकल जांच से पहले ही फैसला
सारांश
मुख्य बातें
फैसलाबाद की एक अदालत ने 13 वर्षीय ईसाई नाबालिग अंबर नदीम की कस्टडी कथित तौर पर उस व्यक्ति को सौंप दी है, जिस पर उसे अगवा करने, जबरन धर्म परिवर्तन कराने और उससे विवाह करने का आरोप है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, यह फैसला तब सुनाया गया जब अदालत के ही आदेश पर होने वाली मेडिकल जांच — जो लड़की की उम्र निर्धारित करने के लिए थी — अभी पूरी भी नहीं हुई थी।
मुख्य घटनाक्रम
'वॉयस फॉर जस्टिस' संगठन के चेयरमैन जोसेफ जॉनसेन ने बताया कि फैसलाबाद के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज राणा सोहेल ने नाबालिग अंबर का वह हलफनामा स्वीकार कर लिया जिसमें उसने दावा किया कि उसने स्वेच्छा से इस्लाम कबूल किया और आरोपी मोहसिन लियाकत से विवाह किया। अंबर के इस बयान के बाद जज ने लियाकत को — जो 26 जून से न्यायिक हिरासत में था — जमानत दे दी।
जॉनसेन ने बताया, 'इसके बाद अंबर आरोपी के रिश्तेदारों और वकीलों के साथ कोर्टरूम से चली गई, जबकि उसके गरीब माता-पिता इस गंभीर अन्याय को देखकर रोते हुए खड़े रहे।'
दस्तावेज़ों में गंभीर विसंगतियाँ
इससे पहले 27 जून को अंबर एक ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने पेश हुई थी और उसने कहा था कि आरोपी के परिवार के सदस्यों ने उस पर दबाव डाला था कि वह झूठ बोले कि वह बालिग है। इस बयान के बाद आरोपी पक्ष ने धर्म परिवर्तन और विवाह का एक प्रमाणपत्र पेश किया, जिसमें अंबर की जन्मतिथि जून 2008 दर्ज थी — जबकि उसके माता-पिता की शादी 2012 में हुई थी। इस स्पष्ट विरोधाभास ने दस्तावेज़ों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए।
जॉनसेन ने कहा, 'इन बड़ी विसंगतियों को देखते हुए मजिस्ट्रेट ने अंबर की उम्र निर्धारित करने के लिए मेडिकल जांच का आदेश दिया और निर्देश दिया कि आगे की कार्यवाही तक उसे सरकारी शेल्टर होम में रखा जाए।' लेकिन यह मेडिकल जांच पूरी होने से पहले ही सेशंस कोर्ट ने कस्टडी का फैसला सुना दिया।
यूरोपीय संसद की निंदा और व्यापक संदर्भ
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब इसी महीने यूरोपीय संसद ने एक प्रस्ताव पारित कर पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की नाबालिग लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और बाल विवाह की कड़ी निंदा की है। उस प्रस्ताव में खास तौर पर मारिया शाहबाज का मामला उठाया गया — 13 वर्षीय ईसाई लड़की जिसे मार्च 2026 में अगवा कर उसका धर्म परिवर्तन कराया गया और जबरन विवाह कराया गया।
यूरोपीय संसद के सदस्यों (एमईपी) ने जोर दिया कि मारिया को कानूनी सहायता, परिवार से मिलने की सुविधा और मनोवैज्ञानिक सहयोग मिलना चाहिए। संसद ने पाकिस्तान के अधिकारियों से आग्रह किया कि वे बाल विवाह समाप्त करने के राष्ट्रीय ढाँचे को पूरी तरह लागू करें और अगवा की गई या जबरन धर्म परिवर्तन का शिकार बनी लड़कियों के परिवारों की शिकायतें सुनने के लिए एक राष्ट्रीय कानून या तंत्र बनाएँ।
संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े और पैटर्न
2025 के संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में विवाह के ज़रिए जबरन धर्म परिवर्तन का शिकार होने वाली महिलाओं और लड़कियों में से लगभग 75 प्रतिशत हिंदू और 25 प्रतिशत ईसाई थीं। गौरतलब है कि अंबर का मामला इस व्यापक और चिंताजनक पैटर्न की एक और कड़ी के रूप में सामने आया है।
आगे की राह
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने मेडिकल जांच से पहले कस्टडी सौंपने के सेशंस कोर्ट के फैसले को चुनौती देने का संकेत दिया है। अंबर के माता-पिता की स्थिति और उच्च न्यायालय में अपील की संभावना पर नज़र बनी हुई है। यह मामला अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की निगाह में है और पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।