30 जुलाई 2026
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पाकिस्तान: 13 वर्षीय ईसाई लड़की की कस्टडी कथित अपहरणकर्ता को, मेडिकल जांच से पहले ही फैसला

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पाकिस्तान: 13 वर्षीय ईसाई लड़की की कस्टडी कथित अपहरणकर्ता को, मेडिकल जांच से पहले ही फैसला

सारांश

फैसलाबाद की अदालत ने 13 वर्षीय ईसाई नाबालिग अंबर नदीम की कस्टडी कथित अपहरणकर्ता को सौंप दी — अदालत के ही आदेश पर होने वाली मेडिकल जांच पूरी होने से पहले। दस्तावेज़ों में जन्मतिथि की स्पष्ट विसंगति और यूरोपीय संसद की हालिया निंदा के बीच यह मामला पाकिस्तान में अल्पसंख्यक लड़कियों के खिलाफ जारी पैटर्न को उजागर करता है।

मुख्य बातें

फैसलाबाद की अदालत ने 13 वर्षीय ईसाई नाबालिग अंबर नदीम की कस्टडी कथित अपहरणकर्ता मोहसिन लियाकत को सौंपी।
मेडिकल जांच — जो अदालत ने खुद उम्र निर्धारित करने के लिए आदेशित की थी — पूरी होने से पहले ही कस्टडी का फैसला सुनाया गया।
धर्म परिवर्तन प्रमाणपत्र में अंबर की जन्मतिथि जून 2008 दर्ज, जबकि माता-पिता की शादी 2012 में हुई — दस्तावेज़ों की विश्वसनीयता संदिग्ध।
यूरोपीय संसद ने इसी महीने प्रस्ताव पारित कर पाकिस्तान में अल्पसंख्यक नाबालिग लड़कियों के अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन की निंदा की।
2025 के संयुक्त राष्ट्र आँकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन पीड़ितों में 75% हिंदू और 25% ईसाई महिलाएँ व लड़कियाँ हैं।

फैसलाबाद की एक अदालत ने 13 वर्षीय ईसाई नाबालिग अंबर नदीम की कस्टडी कथित तौर पर उस व्यक्ति को सौंप दी है, जिस पर उसे अगवा करने, जबरन धर्म परिवर्तन कराने और उससे विवाह करने का आरोप है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, यह फैसला तब सुनाया गया जब अदालत के ही आदेश पर होने वाली मेडिकल जांच — जो लड़की की उम्र निर्धारित करने के लिए थी — अभी पूरी भी नहीं हुई थी।

मुख्य घटनाक्रम

'वॉयस फॉर जस्टिस' संगठन के चेयरमैन जोसेफ जॉनसेन ने बताया कि फैसलाबाद के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज राणा सोहेल ने नाबालिग अंबर का वह हलफनामा स्वीकार कर लिया जिसमें उसने दावा किया कि उसने स्वेच्छा से इस्लाम कबूल किया और आरोपी मोहसिन लियाकत से विवाह किया। अंबर के इस बयान के बाद जज ने लियाकत को — जो 26 जून से न्यायिक हिरासत में था — जमानत दे दी।

जॉनसेन ने बताया, 'इसके बाद अंबर आरोपी के रिश्तेदारों और वकीलों के साथ कोर्टरूम से चली गई, जबकि उसके गरीब माता-पिता इस गंभीर अन्याय को देखकर रोते हुए खड़े रहे।'

दस्तावेज़ों में गंभीर विसंगतियाँ

इससे पहले 27 जून को अंबर एक ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने पेश हुई थी और उसने कहा था कि आरोपी के परिवार के सदस्यों ने उस पर दबाव डाला था कि वह झूठ बोले कि वह बालिग है। इस बयान के बाद आरोपी पक्ष ने धर्म परिवर्तन और विवाह का एक प्रमाणपत्र पेश किया, जिसमें अंबर की जन्मतिथि जून 2008 दर्ज थी — जबकि उसके माता-पिता की शादी 2012 में हुई थी। इस स्पष्ट विरोधाभास ने दस्तावेज़ों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए।

जॉनसेन ने कहा, 'इन बड़ी विसंगतियों को देखते हुए मजिस्ट्रेट ने अंबर की उम्र निर्धारित करने के लिए मेडिकल जांच का आदेश दिया और निर्देश दिया कि आगे की कार्यवाही तक उसे सरकारी शेल्टर होम में रखा जाए।' लेकिन यह मेडिकल जांच पूरी होने से पहले ही सेशंस कोर्ट ने कस्टडी का फैसला सुना दिया।

यूरोपीय संसद की निंदा और व्यापक संदर्भ

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब इसी महीने यूरोपीय संसद ने एक प्रस्ताव पारित कर पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की नाबालिग लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और बाल विवाह की कड़ी निंदा की है। उस प्रस्ताव में खास तौर पर मारिया शाहबाज का मामला उठाया गया — 13 वर्षीय ईसाई लड़की जिसे मार्च 2026 में अगवा कर उसका धर्म परिवर्तन कराया गया और जबरन विवाह कराया गया।

यूरोपीय संसद के सदस्यों (एमईपी) ने जोर दिया कि मारिया को कानूनी सहायता, परिवार से मिलने की सुविधा और मनोवैज्ञानिक सहयोग मिलना चाहिए। संसद ने पाकिस्तान के अधिकारियों से आग्रह किया कि वे बाल विवाह समाप्त करने के राष्ट्रीय ढाँचे को पूरी तरह लागू करें और अगवा की गई या जबरन धर्म परिवर्तन का शिकार बनी लड़कियों के परिवारों की शिकायतें सुनने के लिए एक राष्ट्रीय कानून या तंत्र बनाएँ।

संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े और पैटर्न

2025 के संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में विवाह के ज़रिए जबरन धर्म परिवर्तन का शिकार होने वाली महिलाओं और लड़कियों में से लगभग 75 प्रतिशत हिंदू और 25 प्रतिशत ईसाई थीं। गौरतलब है कि अंबर का मामला इस व्यापक और चिंताजनक पैटर्न की एक और कड़ी के रूप में सामने आया है।

आगे की राह

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने मेडिकल जांच से पहले कस्टडी सौंपने के सेशंस कोर्ट के फैसले को चुनौती देने का संकेत दिया है। अंबर के माता-पिता की स्थिति और उच्च न्यायालय में अपील की संभावना पर नज़र बनी हुई है। यह मामला अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की निगाह में है और पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक व्यवस्थागत पैटर्न है जिसे पाकिस्तान की राज्य-व्यवस्था अब तक तोड़ने में विफल रही है। अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है, लेकिन जब तक घरेलू न्यायिक और कानूनी ढाँचा अल्पसंख्यक पीड़ितों को वास्तविक सुरक्षा नहीं देता, ऐसे मामले सामने आते रहेंगे।
RashtraPress
30 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अंबर नदीम कौन है और उसका मामला क्या है?
अंबर नदीम पाकिस्तान के फैसलाबाद की 13 वर्षीय ईसाई नाबालिग है। उस पर आरोप है कि मोहसिन लियाकत ने उसे अगवा किया, जबरन धर्म परिवर्तन कराया और उससे विवाह किया — जिसके बाद एक अदालत ने कस्टडी आरोपी को ही सौंप दी।
फैसलाबाद कोर्ट का फैसला विवादास्पद क्यों है?
अदालत ने खुद मेडिकल जांच का आदेश दिया था ताकि अंबर की सही उम्र पता चल सके, लेकिन वह जांच पूरी होने से पहले ही कस्टडी आरोपी को सौंप दी गई। इसके अलावा, धर्म परिवर्तन प्रमाणपत्र में दर्ज जन्मतिथि और माता-पिता की विवाह तिथि में स्पष्ट विरोधाभास था।
यूरोपीय संसद ने पाकिस्तान के बारे में क्या प्रस्ताव पारित किया?
यूरोपीय संसद ने जुलाई 2026 में एक प्रस्ताव पारित कर पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की नाबालिग लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और बाल विवाह की निंदा की। प्रस्ताव में मारिया शाहबाज का मामला विशेष रूप से उठाया गया और पाकिस्तान से राष्ट्रीय कानून बनाने का आग्रह किया गया।
पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन का शिकार कौन होता है?
संयुक्त राष्ट्र के 2025 के आँकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में विवाह के ज़रिए जबरन धर्म परिवर्तन का शिकार होने वाली महिलाओं और लड़कियों में लगभग 75 प्रतिशत हिंदू और 25 प्रतिशत ईसाई हैं।
अंबर नदीम के मामले में आगे क्या होने की उम्मीद है?
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सेशंस कोर्ट के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने का संकेत दिया है। मामला अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की निगरानी में है और पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ने की संभावना है।
राष्ट्र प्रेस
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