यूरोपीय संसद का पाकिस्तान पर बड़ा प्रस्ताव: अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन की कड़ी निंदा
सारांश
मुख्य बातें
यूरोपीय संसद ने 10 जुलाई 2026 को ब्रसेल्स में पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों की नाबालिग लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और बाल विवाह के विरुद्ध एक औपचारिक प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में इन घटनाओं को एक व्यापक और संगठित मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में रेखांकित किया गया है।
मारिया शाहबाज का मामला: प्रस्ताव का केंद्र-बिंदु
प्रस्ताव में विशेष रूप से मारिया शाहबाज के मामले को उजागर किया गया — एक 13 वर्षीय पाकिस्तानी ईसाई लड़की, जिसका कथित तौर पर मार्च 2026 में अपहरण किया गया, उसे इस्लाम में धर्म परिवर्तित कराया गया और फिर उसी अपहरणकर्ता से उसका विवाह करा दिया गया। यूरोपीय संसद के सदस्यों (एमईपी) ने मारिया को कानूनी प्रतिनिधित्व, परिवार तक पहुँच और मनोवैज्ञानिक सहायता सुनिश्चित करने की तत्काल माँग की।
एमईपी ने कहा कि मारिया का मामला पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे व्यापक मानवाधिकार उल्लंघन का एक प्रतीकात्मक उदाहरण है — न कि कोई अपवाद।
संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े और व्यापक पैटर्न
2025 के संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों का हवाला देते हुए प्रस्ताव में बताया गया कि पाकिस्तान में विवाह के माध्यम से जबरन धर्म परिवर्तन से प्रभावित महिलाओं और लड़कियों में से लगभग 75 फीसदी हिंदू और 25 फीसदी ईसाई हैं। यह आँकड़ा इस समस्या की गहराई और उसके सांप्रदायिक स्वरूप को स्पष्ट करता है।
गौरतलब है कि अप्रैल 2026 की शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने भी पाकिस्तान में अल्पसंख्यक महिलाओं और लड़कियों को निशाना बनाकर किए जा रहे अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और विवाह पर गहरी चिंता जताई थी। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि दोषियों को सज़ा न मिलने का माहौल इस प्रथा को देशभर में बढ़ावा दे रहा है।
यूरोपीय संसद की पाकिस्तान से माँगें
प्रस्ताव में यूरोपीय संसद ने पाकिस्तानी अधिकारियों से कई ठोस कदम उठाने की अपील की। संसद ने माँग की कि पाकिस्तान बाल विवाह उन्मूलन के राष्ट्रीय ढाँचे को पूरी तरह लागू करे, जैसा कि देश के कुछ प्रांतों में पहले से हो रहा है। साथ ही, अपहृत या जबरन धर्म परिवर्तित लड़कियों के परिवारों की शिकायतों के निपटारे के लिए एक राष्ट्रीय प्रणाली स्थापित की जाए।
एमईपी ने यह भी माँग की कि नाबालिगों या जबरदस्ती से जुड़े सभी मामलों की जाँच पारदर्शी और खुली प्रक्रिया से हो, दोषियों पर मुकदमा चलाया जाए, कानूनी व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाए और अपहृत लड़कियों को उनके परिवारों के पास सुरक्षित वापस पहुँचाया जाए।
संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों का रुख
संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा, "धर्म या आस्था में कोई भी बदलाव वास्तव में बिना किसी दबाव के होना चाहिए और विवाह पूर्ण सहमति पर आधारित होनी चाहिए — जो कानूनी रूप से तब संभव नहीं है जब पीड़ित एक बच्ची हो।"
विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया कि पाकिस्तान सरकार ने इस समस्या की जड़ों — पितृसत्तात्मक सामाजिक ढाँचा, लैंगिक असमानता, गरीबी, सामाजिक बहिष्करण, अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव, धार्मिक असहिष्णुता और व्यापक दण्डमुक्ति — को दूर करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं।
आगे क्या होगा
यह प्रस्ताव यूरोपीय संसद की ओर से पाकिस्तान पर बढ़ते कूटनीतिक दबाव का संकेत है। आलोचकों का कहना है कि जब तक पाकिस्तान में दण्डमुक्ति की संस्कृति समाप्त नहीं होती और राष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक इस तरह के प्रस्ताव महज़ प्रतीकात्मक रहेंगे। मानवाधिकार संगठनों की नज़रें अब पाकिस्तान सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।