यूसीएल में आचार्य प्रशांत और न्यूरोसाइंटिस्ट स्टीव फ्लेमिंग का संवाद: 'कोई चालक नहीं है'
सारांश
मुख्य बातें
दार्शनिक एवं लेखक आचार्य प्रशांत और कॉग्निटिव न्यूरोसाइंटिस्ट प्रोफेसर स्टीव फ्लेमिंग ने 9 जुलाई 2026 की शाम यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) में आत्म-ज्ञान, मेटाकॉग्निशन और चेतना की प्रकृति पर एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक संवाद किया। 'थिंकिंग अबाउट थिंकिंग' शीर्षक से आयोजित यह सत्र आचार्य प्रशांत की ब्रिटेन यात्रा की अंतिम कड़ी था, जिसके अंतर्गत वे कैंब्रिज यूनियन, ऑक्सफोर्ड, हाउस ऑफ लॉर्ड्स, क्वीन मेरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में भी संबोधन दे चुके थे।
सत्र की पृष्ठभूमि और वक्ता-परिचय
छात्रों से खचाखच भरे सभागार में दोनों वक्ताओं के मंच पर आते ही देर तक तालियाँ गूंजती रहीं और संवाद के बाद का प्रश्नोत्तर सत्र निर्धारित समय से काफी आगे तक चला। सत्र का संचालन यूसीएल में कम्प्यूटेशनल कॉग्निशन की प्रोफेसर डॉ. मेगन पीटर्स ने किया, जिनका शोध मेटाकॉग्निशन, सब्जेक्टिव अनुभव और चेतना पर केंद्रित है।
उन्होंने आचार्य प्रशांत का परिचय वाटकिन्स 2026 सूची में विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली जीवित विचारकों में से एक के रूप में दिया — यह उस क्षेत्र के 100 सर्वाधिक प्रभावशाली जीवित व्यक्तित्वों की वार्षिक सूची है — और बताया कि उनका कार्य 10 करोड़ से अधिक लोगों तक पहुँचता है। प्रोफेसर फ्लेमिंग यूसीएल के इंस्टीट्यूट ऑफ कॉग्निटिव न्यूरोसाइंस में प्रोफेसर तथा मैक्स प्लांक–यूसीएल सेंटर फॉर कम्प्यूटेशनल साइकिएट्री में ग्रुप लीडर हैं, और उन्हें रॉयल सोसाइटी के फ्रांसिस क्रिक मेडल सहित कई सम्मान मिल चुके हैं। उनकी पुस्तक 'नो थाय सेल्फ: द साइंस ऑफ सेल्फ अवेयरनेस' का सात भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।
मुख्य वैचारिक संवाद: चालक और वाहन का रूपक
आचार्य प्रशांत ने मेटाकॉग्निशन और आत्म-ज्ञान के भेद को एक रूपक से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि एक वाहन में इंजन गति उत्पन्न करता है — यह फर्स्ट-ऑर्डर वेरिएबल है — जबकि डैशबोर्ड का स्पीडोमीटर उसी गति को मापता है, अर्थात प्रणाली का एक हिस्सा दूसरे हिस्से को पढ़ता है। बाहर खड़ी रडार गन 'ग्राउंड ट्रुथ' देती है। उन्होंने कहा, 'यह पढ़ना एक रिपोर्ट है, चुनाव नहीं, और इसमें से कुछ भी चालक की ओर संकेत नहीं करता।'
उनके अनुसार, प्रणाली का प्रणाली को पढ़ना मेटाकॉग्निशन है, जबकि चालक का स्वयं की जाँच करना और अंततः यह पाना कि कोई चालक है ही नहीं — यही आत्म-ज्ञान है। प्रोफेसर फ्लेमिंग ने रूपक की सराहना करते हुए एक संशोधन जोड़ा कि मस्तिष्क में इंजन से अलग कोई डैशबोर्ड नहीं होता, क्योंकि स्पष्ट और अस्पष्ट मेटाकॉग्निशन दोनों एक ही फिज़िकल हार्डवेयर के भिन्न स्तर हैं।
अहंकार, कष्ट और 'कम्प्यूटेशनल एरर'
आचार्य प्रशांत ने कहा कि मस्तिष्क कष्ट नहीं भोगता। 'शरीर पीड़ा अनुभव कर सकता है, पर भीतर कोई और है जो रात के तीन बजे जागकर कहता है कि मैं अकेला हूँ' — यह कष्ट भोगने वाला शरीर में कहीं स्थित नहीं किया जा सकता, और यही आत्म-ज्ञान का असली विषय है। उन्होंने अहंकार को प्रणाली में एक 'कम्प्यूटेशनल एरर' बताया — कुछ ऐसा जैसे दो और दो को पाँच मान लेना — जिसका अस्तित्व नहीं होता, फिर भी जिस पर विश्वास किया जा सकता है।
प्रोफेसर फ्लेमिंग ने इस दृष्टिकोण को दार्शनिक डेनियल डेनेट की 'यूज़र इल्यूज़न' की अवधारणा के निकट बताया और विभाजित-मस्तिष्क पर हुए प्रसिद्ध प्रयोगों का उल्लेख किया, जिनमें मस्तिष्क का एक गोलार्ध दूसरे के किए की मनगढ़ंत व्याख्या रच लेता था।
ईमानदारी, बाहरी दर्पण और बोध का भेद
आचार्य प्रशांत ने कहा कि सटीकता संरचनात्मक होती है, किंतु 'ईमानदारी सदैव एक चुनाव है, इरादे की बात है — यह किसी बनावट का उत्पाद नहीं हो सकती।' उन्होंने एक बाहरी, तटस्थ दर्पण की आवश्यकता पर बल दिया — चाहे वह सच्चा मित्र हो, कोई श्रेष्ठ पुस्तक हो, या ऐसा शिक्षक जो उपदेशक नहीं बल्कि दर्पण हो। एक हिंदी पंक्ति उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा, 'किसी पर भरोसा कर लो, खुद पर मत करना' — अर्थात स्वयं को निरंतर परखते रहना चाहिए।
संवाद के समापन में उन्होंने सोच और बोध का भेद स्पष्ट किया। 'बोध प्रणाली की कोई क्रिया नहीं है,' उन्होंने कहा। 'बोध तो उस घुसपैठिये का पीछे हट जाना है जो दृष्टि को विकृत करता है।' इसी संदर्भ में उन्होंने क्वीन मेरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के प्रोफेसर लार्स चिटका के साथ हुई अपनी हालिया बातचीत का उल्लेख किया, जिनका शोध मधुमक्खियों के संज्ञान पर केंद्रित है।
आगे की योजनाएँ और यात्रा का सारांश
यात्रा के दौरान आचार्य प्रशांत ने प्रोफेसर जोनाथन बर्च, प्रोफेसर लार्स चिटका, मनोवैज्ञानिक डॉ. मेलानी जॉय, कैंब्रिज-प्रशिक्षित जीवविज्ञानी रूपर्ट शेल्ड्रेक और अद्वैत-चिंतक रूपर्ट स्पाइरा के साथ भी संवाद किए। वे पेटा के लंदन कार्यालय और आध्यात्मिक साहित्य की लंदन की सबसे पुरानी दुकान वॉटकिंस बुक्स भी गए, जहाँ पाठक उनकी पुस्तकों पर हस्ताक्षर लेने के लिए कतार में खड़े थे।
आगे की योजनाओं पर उन्होंने बताया कि भारत में दो बड़े आयोजन प्रस्तावित हैं, वे अपनी आगामी पुस्तक 'बीइंग विदाउट बीइंग' पर कार्य कर रहे हैं और लंदन के लिए सितंबर-अक्टूबर में कुछ और कार्यक्रमों पर विचार चल रहा है। आचार्य प्रशांत आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र तथा प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं।