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करूर भगदड़: डीएमके का दावा — धूप में 10 घंटे बिना पानी खड़े रहे लोग, विजय की देरी बनी वजह

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करूर भगदड़: डीएमके का दावा — धूप में 10 घंटे बिना पानी खड़े रहे लोग, विजय की देरी बनी वजह

सारांश

करूर भगदड़ पर DMK प्रवक्ता एलंगोवन ने साफ कहा — पुलिस नहीं, विजय की देरी ज़िम्मेदार थी। 10 घंटे बिना पानी धूप में खड़े रहे लोग बेहोश हुए, 41 की जान नहीं बचाई जा सकी। अनुकंपा नियुक्तियों के बाद यह मामला फिर सुर्खियों में है।

मुख्य बातें

DMK प्रवक्ता टीकेएस एलंगोवन ने 10 जुलाई को करूर भगदड़ पर पार्टी का पक्ष रखा।
कथित तौर पर मुख्यमंत्री विजय के दोपहर 12 बजे तय कार्यक्रम में देरी के कारण भीड़ 10 घंटे बिना पानी-भोजन के धूप में खड़ी रही।
लगभग 100 लोग बेहोश हुए; DMK सरकार के अनुसार 60 लोगों की जान बचाई गई, 41 की मौत हुई।
एलंगोवन ने पुलिस की लापरवाही के आरोप को खारिज किया — भीड़ के कारण एम्बुलेंस को समय पर अंदर जाने नहीं दिया जा सका।
मुख्यमंत्री विजय ने पीड़ित परिवारों को अनुकंपा नियुक्ति पत्र सौंपे।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की करूर रैली में हुई भगदड़ को लेकर द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के प्रवक्ता टीकेएस एलंगोवन ने शुक्रवार, 10 जुलाई को स्पष्ट किया कि उस दिन लगभग 100 लोग चिलचिलाती धूप में बेहोश हुए थे — और इसका कारण पुलिस की लापरवाही नहीं, बल्कि 10 घंटे तक बिना पानी और भोजन के खड़े रहना था। एलंगोवन के अनुसार, विजय को दोपहर 12 बजे सभा को संबोधित करना था, लेकिन वे समय पर नहीं पहुँचे, जिससे भीड़ घंटों धूप में खड़ी रही।

क्या हुआ था करूर रैली में

एलंगोवन ने बताया कि रैली स्थल पर पुलिस सुरक्षा तो मौजूद थी, लेकिन भीड़ को पानी पिलाने या छाया की व्यवस्था नहीं थी। उनके अनुसार, करीब 100 लोग बेहोश हो गए और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। उन्होंने कहा, 'बेहोश होने वालों को पानी पिलाने के लिए भी कोई मौजूद नहीं था — यह एक प्राकृतिक कारण था।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि न कोई दुर्घटना हुई, न धक्का-मुक्की।

डीएमके सरकार की प्रतिक्रिया और राहत कार्य

एलंगोवन ने दावा किया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली DMK सरकार की त्वरित कार्रवाई से 60 लोगों की जान बचाई जा सकी। उन्होंने बताया कि करूर के सरकारी अस्पताल में पर्याप्त डॉक्टर नहीं थे, इसलिए अन्य सरकारी अस्पतालों से डॉक्टरों को तत्काल बुलाया गया। हालाँकि, 41 लोगों को नहीं बचाया जा सका — एलंगोवन के अनुसार, कथित तौर पर एम्बुलेंस को भीड़ के कारण समय पर अंदर जाने की अनुमति नहीं मिल पाई।

विजय की प्रतिक्रिया और अनुकंपा नियुक्तियाँ

यह बयान उस समय आया जब मुख्यमंत्री विजय ने करूर भगदड़ में अपनों को खोने वाले परिवारों को अनुकंपा नियुक्ति पत्र सौंपे। विजय ने इस त्रासदी को 'एक ऐसा जख्म बताया जो आज भी उनके दिल पर गहरा बोझ है।' गौरतलब है कि यह कदम पीड़ित परिवारों को सरकारी रोज़गार देने की दिशा में उठाया गया है।

पुलिस की भूमिका पर DMK का पक्ष

एलंगोवन ने पुलिस को इस घटना के लिए ज़िम्मेदार ठहराने से साफ इनकार किया। उनका तर्क था कि पुलिस का काम सुरक्षा देना है, न कि चिकित्सा सेवाएँ प्रदान करना। उन्होंने कहा, 'पुलिस इसमें क्या कर सकती थी? क्या वे डॉक्टर हैं जो दवा देकर उन्हें बचा सकें?' DMK का यह बयान उन आलोचनाओं के जवाब में आया है जिनमें पुलिस प्रबंधन पर सवाल उठाए गए थे।

आगे क्या

करूर भगदड़ तमिलनाडु की राजनीति में एक संवेदनशील मुद्दा बनी हुई है। अनुकंपा नियुक्तियों के बाद अब यह देखना होगा कि विपक्ष इस मामले को किस दिशा में ले जाता है। पीड़ित परिवारों को न्याय और पारदर्शी जाँच की माँग अभी भी बनी हुई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन सवाल यह है कि यदि रैली आयोजकों को पता था कि विजय देर से आएंगे, तो भीड़ को पानी और छाया की व्यवस्था क्यों नहीं दी गई। 41 मौतों को 'प्राकृतिक कारण' बताना पीड़ित परिवारों के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। अनुकंपा नियुक्तियाँ राहत देती हैं, लेकिन जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। तमिलनाडु में बड़े राजनीतिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन की कमज़ोरी यह पहली बार सामने नहीं आई — यह एक प्रणालीगत समस्या है जिस पर ध्यान देना ज़रूरी है।
RashtraPress
10 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

करूर भगदड़ में क्या हुआ था?
DMK प्रवक्ता एलंगोवन के अनुसार, मुख्यमंत्री विजय की करूर रैली में लोग दोपहर की चिलचिलाती धूप में 10 घंटे तक बिना पानी और भोजन के खड़े रहे, जिससे लगभग 100 लोग बेहोश हो गए। 41 लोगों की मौत हुई और 60 को DMK सरकार की त्वरित कार्रवाई से बचाया जा सका।
DMK ने पुलिस को ज़िम्मेदार क्यों नहीं माना?
DMK प्रवक्ता एलंगोवन ने कहा कि पुलिस सुरक्षा मौजूद थी और कोई धक्का-मुक्की या दुर्घटना नहीं हुई। उनके अनुसार, लोग विजय की देरी के कारण घंटों धूप में खड़े रहे और बेहोश हुए — यह एक 'प्राकृतिक कारण' था, पुलिस की लापरवाही नहीं।
करूर भगदड़ में कितने लोगों की जान गई?
DMK के बयान के अनुसार, लगभग 100 बेहोश हुए लोगों में से 41 को नहीं बचाया जा सका। कथित तौर पर भीड़ के कारण एम्बुलेंस को समय पर अंदर जाने नहीं दिया गया, जिससे अस्पताल पहुँचने में देरी हुई।
विजय ने पीड़ित परिवारों के लिए क्या किया?
मुख्यमंत्री विजय ने करूर भगदड़ में जान गँवाने वालों के परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति पत्र सौंपे। विजय ने इस त्रासदी को 'एक ऐसा जख्म बताया जो आज भी उनके दिल पर गहरा बोझ है।'
DMK सरकार ने उस दिन राहत के लिए क्या कदम उठाए?
एलंगोवन के अनुसार, DMK सरकार ने करूर सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों की कमी देखते हुए अन्य सरकारी अस्पतालों से तत्काल डॉक्टर बुलाए। इस त्वरित कार्रवाई से 60 लोगों की जान बचाई जा सकी।
राष्ट्र प्रेस
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