आचार्य प्रशांत का कैम्ब्रिज यूनियन में संबोधन: 'आंतरिक शिक्षा के बिना बाहरी प्रगति गलत दिशा में त्वरण है'
सारांश
मुख्य बातें
दार्शनिक और बेस्टसेलिंग लेखक आचार्य प्रशांत ने 30 मई 2025 को यूके के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक कैम्ब्रिज यूनियन में आयोजित फायर-साइड चैट में कहा कि मानवता के सबसे गहरे संकट — जिनमें जलवायु परिवर्तन सर्वप्रमुख है — न तो तकनीक से सुलझेंगे, न नीतियों से, क्योंकि उनकी जड़ें बाहरी व्यवस्थाओं में नहीं बल्कि उस आंतरिक जीवन में हैं जिसे सभ्यता ने कभी गंभीरता से नहीं परखा। सभागार की सभी सीटें एक दिन पहले ही बुक हो चुकी थीं।
ऐतिहासिक मंच और कार्यक्रम का महत्त्व
कैम्ब्रिज यूनियन वह मंच है जहाँ विंस्टन चर्चिल, फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट और स्टीफन हॉकिंग जैसी विभूतियाँ अपने विचार रख चुकी हैं। यह कार्यक्रम कैम्ब्रिज इंडिया बिज़नेस डायलॉग द्वारा आयोजित था और इसका संचालन कैम्ब्रिज जज बिज़नेस स्कूल में सेंटर फॉर इंडिया एंड ग्लोबल बिज़नेस के निदेशक प्रोफेसर जयदीप प्रभु ने किया। आयोजकों के अनुसार यह शिखर सम्मेलन का सबसे प्रमुख सत्र था।
राजनीति, कूटनीति और उद्योग जगत के तमाम प्रतिष्ठित वक्ताओं के बीच आचार्य प्रशांत इस कार्यक्रम में एकमात्र दार्शनिक थे और उन्हें दिन का सबसे लंबा स्पीकर-स्लॉट दिया गया। उल्लेखनीय है कि वे एकमात्र ऐसे वक्ता थे जिनके सत्र का संचालन कैम्ब्रिज के एक प्रोफेसर ने किया। सभा में कनिष्क नारायण (एआई और ऑनलाइन सेफ्टी मंत्री तथा वेल ऑफ ग्लैमॉर्गन से सांसद), लॉर्ड करण बिलिमोरिया, यूनाइटेड किंगडम में भारत के उच्चायुक्त महामहिम पेरियासामी कुमारन और गोदरेज एंटरप्राइज़ेज़ ग्रुप की न्यरिका होल्कर भी उपस्थित थे।
मुख्य तर्क: आंतरिक शिक्षा की अनुपस्थिति
आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र और प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक आचार्य प्रशांत ने कहा, "बाहर से हम इतिहास के किसी भी दौर से अधिक विकसित हैं। भीतर से हम अभी भी गुफाओं में जीने वाले मनुष्य हैं।" उनका तर्क था कि मनुष्य की कामना कोई तकनीकी समस्या नहीं है और इसे तकनीकी उपायों से नहीं सुलझाया जा सकता।
उन्होंने कहा कि स्कूल, विश्वविद्यालय और संस्थान लोगों को कौशल और बाहरी ज्ञान तो देते हैं, लेकिन आंतरिक शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। वे प्रश्न जो यह तय करते हैं कि ज्ञान का उपयोग कैसे होगा — कामना क्या है, हमारी इच्छाएँ कहाँ से आती हैं, हम जो चाहते हैं वह क्यों चाहते हैं — ये प्रश्न किसी भी संस्था ने अपने केंद्र में नहीं रखे। उन्होंने 'विद्या' और 'अविद्या' के उपनिषदिक भेद को आधुनिक सभ्यता के असंतुलन की सबसे पुरानी और अब भी सबसे सटीक पहचान बताया।
जलवायु संकट पर दृष्टिकोण
जलवायु संकट पर आचार्य प्रशांत ने कहा कि इस समस्या को बार-बार गलत ढंग से पढ़ा जा रहा है। उनके अनुसार दक्षता ने ऐतिहासिक रूप से कभी उपभोग को कम नहीं किया — भाप के इंजन बेहतर हुए, लेकिन बिजली की खपत कई गुना बढ़ गई। इलेक्ट्रिक वाहनों को समाधान बताया जा रहा है, फिर भी उनके लिए कोबाल्ट और लिथियम का खनन, जंगलों की कटाई और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान अनिवार्य है।
जब प्रोफेसर प्रभु ने पूछा कि क्या आंतरिक परिवर्तन के लिए अब समय बचा है, तो उन्होंने कहा, "गति बढ़ाने में समय लगता है। जहाँ हो, वहीं रुकने में कितना समय लगता है?" उनका तर्क था कि वैश्विक जलवायु सम्मेलन इसीलिए विफल होते रहे हैं क्योंकि हर बार यह मान लिया गया कि समाधान के लिए और अधिक करना होगा, जबकि संकट ही बहुत अधिक करने का परिणाम है।
कॉर्पोरेट राह छोड़ने का निर्णय और प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन
प्रोफेसर प्रभु के यह पूछने पर कि आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद से पढ़ने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट राह क्यों छोड़ी, आचार्य प्रशांत ने इसे एक क्रमिक पहचान बताया। उन्होंने कहा कि जो लोग उनके साथ प्रवेश परीक्षाओं में थे — असाधारण प्रतिभा के धनी — वे अपनी उसी प्रतिभा को उन संकटों को गहरा करने में लगा रहे हैं जो आज समाधान माँग रहे हैं।
प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के माध्यम से वे महीने के हर दिन एक ऑनलाइन नाइट स्कूल संचालित करते हैं जिसमें छात्र उपनिषदों, भगवद् गीता, बौद्ध शिक्षाओं, लाओ त्ज़ु के लेखन और अस्तित्ववादी साहित्य के माध्यम से अपने जीवन को परखते हैं। यह कार्यक्रम 100 से अधिक देशों तक पहुँचता है। उन्होंने कहा, "हम अहम के विद्यार्थी हैं। ये ग्रंथ मंज़िल नहीं हैं। ये हमें वापस अपने पास लाते हैं।"
आगे का दौरा और व्यापक पहुँच
यूके दौरे पर निकले आचार्य प्रशांत कैम्ब्रिज के बाद ऑक्सफोर्ड, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, किंग्स कॉलेज लंदन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों को संबोधित करेंगे। उपनिषदों, भगवद् गीता, माध्यमिक बौद्ध दर्शन और वैश्विक ज्ञान परंपराओं पर आधारित उनके कार्य की पहुँच 100 से अधिक देशों में 10 करोड़ से अधिक ऑनलाइन फॉलोवर्स तक है। सत्र के बाद मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि पिछले दो सौ वर्षों में मानवता ने विज्ञान, तकनीक और आर्थिक विकास में अभूतपूर्व प्रगति की है, फिर भी वह युद्ध, पारिस्थितिक विनाश और गहरी आंतरिक असंतुष्टि की ओर बढ़ती जा रही है — और इसकी एकमात्र गंभीर चूक 'सामूहिक आंतरिक शिक्षा' का अभाव है।