लंदन में आचार्य प्रशांत का पेटा अध्यक्ष मिमी बेखेची से संवाद: 'पशु के प्रति हिंसक व्यक्ति सबके प्रति हिंसक बनता है'
सारांश
मुख्य बातें
दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत को विश्व की सबसे बड़ी पशु अधिकार संस्था पेटा फाउंडेशन ने 5 जुलाई 2026 को लंदन स्थित अपने कार्यालय में एक विशेष फायरसाइड संवाद के लिए आमंत्रित किया। पेटा फाउंडेशन की अध्यक्ष मिमी बेखेची के साथ हुए इस संवाद में खचाखच भरे सभागार के समक्ष पशु-चेतना, शाकाहार और अहिंसा के दार्शनिक आधारों पर गहन विमर्श हुआ। आचार्य प्रशांत ने स्पष्ट किया कि करुणा कोई सिखाया जाने वाला गुण नहीं, बल्कि मनुष्य का मूल स्वभाव है — असली प्रश्न यह है कि हमें हिंसा किसने सिखाई।
पेटा नेतृत्व के साथ चौथा संवाद
यह पेटा के शीर्ष नेतृत्व के साथ आचार्य प्रशांत का चौथा संवाद था। इससे पूर्व वे पेटा की सह-संस्थापक इंग्रिड न्यूकर्क और पेटा की अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्वा जोशीपुरा के साथ विस्तृत बातचीत कर चुके हैं। इसी ब्रिटेन यात्रा के दौरान जोशीपुरा के साथ उनका पुनः संवाद भी हुआ। उल्लेखनीय है कि पेटा ने वर्ष 2022 में आचार्य प्रशांत को 'मोस्ट इन्फ्लुएंशियल वीगन ऑफ द ईयर' सम्मान से नवाज़ा था।
संवाद के मुख्य विचार
संवाद के आरंभ में बेखेची ने आचार्य प्रशांत की पुस्तक 'इज़ शी जस्ट फूड टू यू' की सराहना करते हुए कहा कि यह पुस्तक पशु अधिकार आंदोलन की उस केंद्रीय चुनौती को संबोधित करती है, जिसमें लोगों को पशुओं को उपभोग की वस्तु नहीं बल्कि सोचने और अनुभव करने वाले जीव के रूप में देखना है।
आचार्य प्रशांत ने कहा कि एक छोटा बच्चा खरगोश या मेमने को देखकर उससे खेलना चाहता है, उसे मारना नहीं। उन्होंने प्रश्न उठाया, 'क्या मनुष्य को करुणा सिखानी पड़ती है, या उसे सिखाई गई हिंसा से मुक्त करना पड़ता है?' उन्होंने यह भी जोड़ा कि जिस बच्चे को किसी एक जीव के प्रति हिंसक बनाया जाता है, वह केवल उसी दिशा में हिंसक नहीं रहता — वह समग्र रूप से हिंसक बन जाता है।
उन्होंने कहा, 'अब आपके पास खरगोश या बकरी के प्रति हिंसक बच्चा नहीं है, अब आपके पास बस एक हिंसक बच्चा है। हम एक हिंसक समाज खड़ा कर रहे हैं।'
अहंकार, शोषण और अद्वैत दर्शन
अपनी पुस्तक के शीर्षक की व्याख्या करते हुए आचार्य प्रशांत ने कहा कि पशुओं और स्त्रियों पर की गई हिंसा दो अलग बातें नहीं हैं — इसीलिए पुस्तक में 'शी' शब्द का प्रयोग हुआ। उनके अनुसार शोषित कोई भी हो सकता है — जंगल, नदी, स्त्री या गाय — किंतु शोषक एक ही है: संस्कारित मानवीय अहंकार।
उन्होंने कहा, 'मनुष्य हत्यारा नहीं है, अहंकार हत्यारा है। शरीर को मांस से कुछ नहीं मिलता — अहंकार अपनी भीतरी अपूर्णता को तीस सेकंड के लिए बहलाता है।' भारतीय अद्वैत परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मुक्त पुरुष का आचरण 'सहज' कहा गया है — पशु जैसा स्वाभाविक — और यही आंतरिक स्वतंत्रता की पहचान है।
व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामाजिक परिवर्तन
श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर में आचार्य प्रशांत ने व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर बल दिया। उन्होंने कहा कि कत्लखाने से निकला हर ग्राम मांस अंततः एक अकेला व्यक्ति ही खाता है, इसलिए माँग व्यक्ति से शुरू होती है और परिवर्तन भी वहीं से आएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कानून और नीतिगत समर्थन आवश्यक हैं, पर पर्याप्त नहीं — क्योंकि लोकतंत्र में विधायक को चुनने वाला मतदाता ही उपभोक्ता है।
सोशल मीडिया पर पशु-क्रूरता के वायरल वीडियो से जुड़े एक प्रश्न पर उन्होंने कहा, 'हिंसा कभी हिंसा के नाम से नहीं सिखाई जाती। हिंसा परंपरा के नाम से, महत्वाकांक्षा के नाम से, जिम्मेदारी के नाम से, यहाँ तक कि प्रेम के नाम से भी सिखाई जाती है।'
ब्रिटेन यात्रा और आगे की कड़ियाँ
यह संवाद आचार्य प्रशांत की व्यापक ब्रिटेन यात्रा का हिस्सा है, जिसके अंतर्गत वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, कैंब्रिज विश्वविद्यालय, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और ब्रिटिश संसद में शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और विचारकों से चेतना, जलवायु और आंतरिक रूपांतरण के प्रश्नों पर संवाद कर चुके हैं। यात्रा 10 जुलाई तक चलेगी, जिसमें यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में प्रोफेसर स्टीवन फ्लेमिंग के साथ संवाद, क्वीन मेरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में प्रोफेसर लार्स चिट्टिका से संवाद और वॉटकिंस बुक स्टोर में पुस्तक-हस्ताक्षर सत्र प्रस्तावित हैं।
आचार्य प्रशांत IIT दिल्ली और IIM अहमदाबाद के पूर्व छात्र और प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। उनका कार्य सोशल मीडिया पर 10 करोड़ से अधिक सब्सक्राइबर्स तक पहुँचता है और हाल ही में उन्हें वाटकिंस 2026 सूची में विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली जीवित विचारकों में सम्मिलित किया गया है।