LSE में आचार्य प्रशांत और प्रो. जोनाथन बर्च का संवाद: पशु चेतना पर विज्ञान और वेदांत आमने-सामने
सारांश
मुख्य बातें
लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स (LSE) के हॉन्ग कॉन्ग थिएटर में 1 जुलाई 2026 की शाम दार्शनिक आचार्य प्रशांत और प्रोफेसर जोनाथन बर्च के बीच पशु चेतना, जलवायु नैतिकता और वेदांत पर एक ऐतिहासिक सार्वजनिक संवाद संपन्न हुआ। 'पशु चेतना और पर्यावरण: विज्ञान और वेदांत के दृष्टिकोण' शीर्षक से आयोजित इस सत्र में छात्र, शोधकर्ता, शिक्षक और आम जनता बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सत्र शुरू होते ही खचाखच भरे सभागार में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।
आयोजन की पृष्ठभूमि
यह संवाद लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक के अंतर्गत आयोजित किया गया। सत्र का संचालन LSE में पशु कल्याण विज्ञान की फ़ैकल्टी डॉ. ईवा रीड ने किया, जिन्होंने इसे पश्चिमी और भारतीय दर्शन के बीच एक दुर्लभ मिलन बिंदु बताया। प्रोफेसर बर्च LSE के जेरेमी कॉलर सेंटर फॉर एनिमल सेंटियेंस के निदेशक हैं और उन्होंने 2021 में सेफलोपॉड और डेकापॉड क्रस्टेशियन जीवों में चेतना के प्रमाणों की समीक्षा का नेतृत्व किया था, जिसने ब्रिटेन के पशु कल्याण (चेतना) अधिनियम को आकार दिया। उनकी हालिया पुस्तक — जो मनुष्यों, पशुओं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में चेतना के प्रश्नों पर केंद्रित है — को प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका नेचर ने सराहा है।
आचार्य प्रशांत को वाटकिन्स 2026 सूची में विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली जीवित विचारकों में शीर्ष बीस में स्थान प्राप्त है। आत्म-बोध की सामूहिक शिक्षा के लिए उनके मंच के ऐप को पाँच मिलियन से अधिक बार डाउनलोड किया जा चुका है।
मुख्य विचार-बिंदु: कानून की सीमाएँ और चेतना का प्रश्न
प्रोफेसर बर्च ने कहा कि पश्चिमी विज्ञान आज जिन निष्कर्षों पर पहुँचा है, वे भारतीय दार्शनिक परंपराओं में सदियों पहले से विद्यमान रहे हैं। उन्होंने 2024 के न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन ऑन एनिमल कॉन्शियसनेस का उल्लेख किया — जिसे तैयार करने में उन्होंने सहयोग दिया — और जिसमें कशेरुकी जीवों से कहीं आगे चेतना की वास्तविक संभावना को स्वीकार किया गया है। उन्होंने दार्शनिक जेरेमी बेंथम का वह प्रसिद्ध कथन भी उद्धृत किया कि नैतिक स्थिति का प्रश्न यह नहीं है कि कोई प्राणी तर्क या भाषा जानता है, बल्कि यह है कि क्या वह कष्ट अनुभव कर सकता है।
आचार्य प्रशांत ने इसे एक सुंदर विचार बताते हुए आगे पूछा कि मानवीय अहंकार इस नैतिक रेखा को कहीं न कहीं खींचने पर इतना आग्रही क्यों रहता है। उन्होंने तर्क दिया कि कठिनाई कभी वैज्ञानिक प्रमाण के अभाव में नहीं रही, बल्कि इरादे के अभाव में रही है। उनके शब्दों में, 'जो मनुष्य बोलते पेड़ों और संवेदनशील महासागरों की बात करता था, वह कोई असाधारण काम नहीं कर रहा था। वह बस शोषण के इरादे से मुक्त था, इसलिए सब कुछ स्वतः स्पष्ट था।'
नशे में धुत्त चालक का रूपक: शाम का सबसे तीखा क्षण
सत्र का सर्वाधिक चर्चित क्षण वह था जब आचार्य प्रशांत ने एक रूपक प्रस्तुत किया — नशे में धुत्त वाहन चालक का। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया हर संकट में, चाहे वह पशु क्रूरता हो या जलवायु परिवर्तन, उसी समाज की तरह व्यवहार करती है जो नशे में गाड़ी चला रहे चालक की दशा सुधारने की बजाय बेहतर सड़कें बनाता है, नरम डिवाइडर लगाता है और तेज़ एंबुलेंस सेवा का इंतज़ाम करता है। 'हम चालक की हालत देखने के अलावा सब कुछ करने को तैयार हैं,' उन्होंने कहा, और पूरे सभागार में तालियों की लहर दौड़ गई। उन्होंने स्पष्ट किया, 'मनुष्य वही चालक है, और यही वह एकमात्र चीज़ है जिसे बदलने की ज़रूरत है।'
एक श्रोता के यह पूछने पर कि क्या इसका अर्थ है कि समाधान केवल व्यक्तिगत आंतरिक परिवर्तन से होगा, आचार्य प्रशांत ने स्पष्ट किया कि वे कानून या प्रौद्योगिकी के विरोध में नहीं हैं। उन्होंने लंदन के रिचमंड पार्क में छोटे पौधों की रक्षा के लिए लगाई जाने वाली बांस की बाड़ का उदाहरण दिया — 'बैसाखियाँ इसलिए जरूरी हैं क्योंकि पैर अभी इतने मजबूत नहीं हुए।' उनके अनुसार, कानून और तकनीक की सार्थकता इसी में है कि वे कितनी जल्दी अनावश्यक हो जाएँ, न कि इसमें कि उन्हें स्थायी समाधान मान लिया जाए।
गौरतलब है कि पिछले दो सौ वर्षों में पशु कल्याण कानून लगातार बढ़े हैं, किंतु आचार्य प्रशांत ने रेखांकित किया कि प्रजातियों के विलुप्त होने की दर और प्रति व्यक्ति मांस उपभोग में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आई। प्रोफेसर बर्च ने माना कि अकेला कानून पर्याप्त नहीं है, किंतु व्यवहार में क्रूरता को सीमित करने के लिए यह अभी भी सबसे उपयोगी साधनों में से एक है।
वीगन जीवनशैली, AI और वेदांत पर दृष्टिकोण
दोनों वक्ताओं ने स्वयं को शुद्ध शाकाहारी (वीगन) बताया, लेकिन आचार्य प्रशांत ने एक महत्वपूर्ण भेद किया। उन्होंने कहा, 'मैंने शुद्ध शाकाहार को कभी एक विचारधारा के रूप में या करो-मत-करो के नियमों के रूप में नहीं अपनाया। मेरा शाकाहार उस समझ का स्वाभाविक परिणाम है जो मैं देखता हूँ, समझता हूँ और प्रतिदिन अनुभव करता हूँ।' उन्होंने कहा कि सच्ची अहिंसा भी ऐसी ही होती है — व्यक्ति को स्वयं पता नहीं चलता, कोई दूसरा बताता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में चेतना की संभावना पर एक श्रोता के प्रश्न के उत्तर में प्रोफेसर बर्च ने कहा कि आज के चैटबॉट चेतना का एक शक्तिशाली भ्रम उत्पन्न करते हैं, लेकिन मशीन चेतना को परखने का कोई विश्वसनीय तरीका अभी उपलब्ध नहीं है। आचार्य प्रशांत ने कहा कि इससे भी अधिक उपयोगी प्रश्न यह है कि क्या कोई मशीन कभी अपने स्वयं के डिज़ाइन से बाहर निकलने की क्षमता हासिल कर सकती है, जिस तरह आत्म-जिज्ञासा मनुष्य को अपने अहंकार की संरचना देखने में सक्षम बनाती है।
वेदांत के दृष्टिकोण पर उन्होंने कहा कि वेदांत की मूल स्थिति जानने की सीमाओं पर नहीं, बल्कि जानने वाले के न होने पर है — एक ऐसा उत्तर जिसने सभागार में गहरी चुप्पी और फिर तालियाँ बटोरीं।
आगे की यात्रा और व्यापक संदर्भ
यह LSE संवाद आचार्य प्रशांत की ब्रिटेन यात्रा की कड़ी का हिस्सा है। वे कैम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड और हाउस ऑफ लॉर्ड्स में श्रोताओं को संबोधित कर चुके हैं। आगे वे यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन, रोहैम्प्टन यूनिवर्सिटी लंदन और भारतीय उच्चायोग द्वारा आयोजित एक सार्वजनिक सत्र को संबोधित करेंगे। इसके अतिरिक्त, कैम्ब्रिज-प्रशिक्षित जीवविज्ञानी एवं रॉयल सोसाइटी के पूर्व रिसर्च फेलो रूपर्ट शेल्ड्रेक के साथ एक विशेष संवाद भी निर्धारित है। यह श्रृंखला पश्चिमी अकादमिक जगत में भारतीय दार्शनिक परंपराओं की बढ़ती स्वीकार्यता को रेखांकित करती है।