ऑक्सफोर्ड में आचार्य प्रशांत: वेदांत और आत्म-ज्ञान से वैश्विक संकटों का समाधान
सारांश
मुख्य बातें
आचार्य प्रशांत ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में वेदांत और भारतीय दर्शन पर व्याख्यान देने के लिए तैयार हैं — यह यात्रा काठमांडू में कलिंगा लिटरेरी अवॉर्ड 2026 प्राप्त करने के ठीक बाद हो रही है। उन्होंने 9 जून को लंदन से कहा कि भारत के उपनिषदों का संदेश केवल सांस्कृतिक गौरव का विषय नहीं, बल्कि जलवायु संकट, युद्ध और मानसिक स्वास्थ्य जैसी आज की वैश्विक चुनौतियों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है।
आधुनिक संकट और आत्म-ज्ञान की आवश्यकता
आचार्य प्रशांत के अनुसार, आधुनिक मानवता ने विज्ञान, तकनीक और भौतिक विकास में असाधारण उपलब्धियाँ हासिल की हैं, फिर भी वह गंभीर पर्यावरणीय संकट और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से जूझ रही है। उनके अनुसार यह विरोधाभास यह सिद्ध करता है कि केवल बाहरी विकास पर्याप्त नहीं है।
उन्होंने 'आत्म-ज्ञान' और 'स्व-शिक्षा' को इन संकटों के समाधान की कुंजी बताया। उनके शब्दों में, 'उपनिषदों में वर्णित विद्या और अविद्या दोनों का संतुलन जरूरी है, जहाँ अविद्या भौतिक ज्ञान को दर्शाती है, वहीं विद्या आत्म-ज्ञान की ओर ले जाती है।'
ऑक्सफोर्ड और उपनिषदों का ऐतिहासिक संबंध
आचार्य प्रशांत ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि यही वह स्थान है जहाँ पहली बार उपनिषदों — विशेष रूप से ईशावास्य उपनिषद — को अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत किया गया था। उन्होंने कहा, 'जब मैक्स मूलर ने 'सेक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट' का अनुवाद किया था, तब उपनिषदों को पश्चिमी दुनिया तक पहुँचाने में इस स्थान की अहम भूमिका रही थी।'
यह संदर्भ उनके व्याख्यान को एक वृत्त पूर्ण करने जैसा बनाता है — वही दर्शन, उसी स्थान पर, नए वैश्विक प्रश्नों के साथ।
विज्ञान और वेदांत: विरोध नहीं, दृष्टिकोण का अंतर
ऑक्सफोर्ड की तार्किक-विश्लेषणात्मक परंपरा और वेदांत की आत्म-चिंतन आधारित दृष्टि के बीच टकराव के प्रश्न पर आचार्य प्रशांत ने कहा कि दोनों में मूल विरोध नहीं है, केवल दृष्टिकोण का फर्क है। उनके अनुसार, 'जब वही वैज्ञानिक और विश्लेषणात्मक उपकरण बाहरी दुनिया पर लागू होते हैं तो परिणाम स्पष्ट मिलते हैं, लेकिन जब इन्हें अपने भीतर, अपने 'स्व' पर लागू किया जाता है, तो स्थिति बदल जाती है।'
उन्होंने समझाया, 'बाहरी वस्तुएँ जैसे पदार्थ या हवा कोई प्रतिरोध नहीं करतीं, लेकिन आत्म-निरीक्षण के दौरान मनुष्य के भीतर प्रतिरोध उत्पन्न होता है, क्योंकि यहाँ देखने वाला और देखा जाने वाला एक ही होता है।' इसी कारण आत्म-विश्लेषण अधिक जटिल हो जाता है।
आंतरिक ईमानदारी: आत्म-ज्ञान की पूर्वशर्त
आचार्य प्रशांत ने जोर देकर कहा कि आत्म-चिंतन की प्रक्रिया में 'आंतरिक ईमानदारी' सबसे निर्णायक तत्व है। विज्ञान में शोधकर्ता की व्यक्तिगत मंशा का प्रभाव सीमित होता है, किंतु आत्म-ज्ञान में व्यक्ति की नीयत और आंतरिक स्थिति ही परिणाम तय करती है।
उनके अनुसार, 'कोई भी व्यक्ति एक अच्छा वैज्ञानिक हो सकता है, लेकिन अच्छा मनुष्य बनने के लिए केवल योग्यता नहीं, बल्कि सही दृष्टि और आत्म-जागरूकता भी आवश्यक है।' यह वक्तव्य उनके व्याख्यान का केंद्रीय संदेश प्रतीत होता है।
आचार्य प्रशांत का ऑक्सफोर्ड व्याख्यान ऐसे समय में आ रहा है जब वैश्विक स्तर पर पूर्वी दर्शन और पश्चिमी अकादमिक जगत के बीच संवाद को नई गति मिल रही है।