ऑक्सफोर्ड में आचार्य प्रशांत ने पढ़ाया ईशावास्य उपनिषद, डेढ़ सदी बाद जीवंत वेदांत की वापसी
सारांश
मुख्य बातें
आचार्य प्रशांत ने 8 जून 2025 को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मैनर रोड बिल्डिंग स्थित लेक्चर थिएटर में ईशावास्य उपनिषद के द्वितीय श्लोक पर एक विस्तृत दार्शनिक सत्र को संबोधित किया — लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले जिस ऑक्सफोर्ड से प्रोफेसर मैक्स म्यूलर ने 1879 में इस उपनिषद का पहला अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित कर पश्चिमी जगत को इससे परिचित कराया था, उसी भूमि पर यह वापसी हुई। यह सत्र उस ऐतिहासिक परंपरा की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ अब वेदांत बाहरी अध्ययन की वस्तु नहीं, बल्कि जीवंत दर्शन के रूप में प्रस्तुत हुआ।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सत्र का महत्त्व
मैक्स म्यूलर ऑक्सफोर्ड में तुलनात्मक भाषाविज्ञान के प्रथम प्रोफेसर थे और उन्होंने 'सेक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट' श्रृंखला की समूची देखरेख की थी। उसी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की इमारत के सामने खड़े होकर आचार्य प्रशांत ने कहा, "मैक्स म्यूलर ने इस ग्रंथ को पश्चिम तक पहुंचाने का असाधारण कार्य किया। पर शब्दों को जीवन देना पड़ता है, और जीवन यही क्षण है। आज मैं उपनिषद की उस प्रासंगिकता को सामने रखने आया हूं, जिसकी आज के संसार को आवश्यकता है।"
जिस मैनर रोड बिल्डिंग में यह सत्र हुआ, वह ऑक्सफोर्ड के अर्थशास्त्र विभाग का केंद्र है और प्रतिष्ठित एटकिंसन मेमोरियल लेक्चर का स्थल रहा है, जहाँ हाल के वर्षों में नोबेल पुरस्कार विजेताओं सहित अर्थशास्त्र, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जलवायु पर विश्व के अग्रणी विचारक संबोधन दे चुके हैं।
सत्र का केंद्रीय दार्शनिक तर्क
सत्र का मूल प्रश्न था — "कर्ता कौन है?" आचार्य प्रशांत ने कहा कि उपनिषद कर्म से अधिक उस कर्ता में रुचि रखते हैं जो प्रत्येक विचार, कर्म और अनुभव के पीछे खड़ा रहता है। विद्या और अविद्या के भेद को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि बाहरी जगत का ज्ञान मनुष्य के पास प्रचुर है, परंतु जानने वाले को जानने का कार्य आज भी अधूरा है।
उन्होंने कहा, "अहम न केवल दुख भोगता है, वह स्वयं ही दुख है।" उनका तर्क था कि कोई भी कर्म अपने आप में न शुभ है न अशुभ — वह जिस चेतना से उपजता है, वही उसे बंधनकारी या मुक्तिदायी बनाती है। उन्होंने अहम की तुलना एक उपनिवेशक से की जो शरीर को प्रेम से नहीं, अपने स्वार्थ से जीवित रखता है, और कहा, "शरीर एक तथ्य है, अहम एक भूल।"
जलवायु संकट और पश्चिमी सभ्यता पर चेतावनी
मीडिया से बातचीत में आचार्य प्रशांत ने कहा कि पश्चिम ने बाहरी जगत में — ब्रह्मांड के अन्वेषण से लेकर परमाणु और शरीर के रहस्यों तक — असाधारण उपलब्धियाँ अर्जित की हैं, फिर भी मानवता आज छठे बड़े पैमाने पर विलुप्ति के दौर में है, और यह संकट पूर्णतः मनुष्य का गढ़ा हुआ है। उन्होंने कहा, "बाहर से हम इतिहास में किसी भी समय की तुलना में अधिक समृद्ध और शक्तिशाली हैं। भीतर से हम आज भी आदिम मनुष्य ही हैं।"
उनका मत था कि आत्मज्ञान के बिना पर्यावरण संकट, सांप्रदायिकता, परमाणु युद्ध के खतरे और मानसिक स्वास्थ्य की महामारी — किसी का भी समाधान संभव नहीं। उन्होंने कहा कि कोई शिखर सम्मेलन, कोई संधि या दक्षता में सुधार इस संकट का समाधान नहीं कर सकता क्योंकि ये उस मूल कारक को संबोधित नहीं करते जो संकट को चला रहा है।
यूके दौरे के अन्य महत्त्वपूर्ण पड़ाव
यह ऑक्सफोर्ड सत्र आचार्य प्रशांत के व्यापक यूके दौरे की एक कड़ी है। 30 मई को उन्होंने कैम्ब्रिज यूनियन में, कैम्ब्रिज इंडिया बिजनेस डायलॉग के अंतर्गत, कैम्ब्रिज जज बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर जयदीप प्रभु की अध्यक्षता में अपना दर्शन रखा। 1 जून को उन्होंने लॉर्ड क्रिश रावल (यूके हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य) के साथ जलवायु और पर्यावरण संकट के आंतरिक आयामों पर विस्तृत चर्चा की।
6 और 7 जून को काठमांडू में आयोजित चौथे काठमांडू कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल में लंदन से ऑनलाइन जुड़ते हुए उन्होंने भागीदारी की, जहाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार डॉ. प्रतिभा राय ने उन्हें "भारत का पुत्र" कहकर संबोधित किया।
आगे की योजना
आगामी सप्ताहों में आचार्य प्रशांत लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) और किंग्स कॉलेज लंदन में भी सत्र आयोजित करेंगे। 20 से 28 जून तक चलने वाले लंदन क्लाइमेट ऐक्शन वीक — यूरोप के सबसे बड़े स्वतंत्र जलवायु परिवर्तन आयोजन — में भी उनकी भागीदारी निर्धारित है। प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक और हार्परकॉलिन्स द्वारा प्रकाशित 'Truth and Apology' के लेखक आचार्य प्रशांत ने ऑक्सफोर्ड में कहा, "अंतर केवल इतना है कि जब आप इन्हीं उपकरणों को अपने ऊपर लागू करते हैं, तो भीतर से प्रतिरोध उठता है, क्योंकि वहाँ द्रष्टा ही दृश्य बन जाता है।"