PM मोदी ने एक्स पर साझा किया संस्कृत सुभाषित: प्रकृति-संतुलन ही भारतीय संस्कृति की आत्मा
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार, 8 जून 2026 को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक संस्कृत सुभाषित साझा करते हुए कहा कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना और समस्त जीवों का कल्याण सुनिश्चित करना भारतीय संस्कृति की मूल भावना रही है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ भारत आज प्रगति और समृद्धि के पथ पर अग्रसर है।
8 जून का सुभाषित और उसका अर्थ
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी एक्स पोस्ट में संस्कृत श्लोक 'यावच्चतस्रः प्रदिशश्चक्षुर्यावत् समश्नुते। तावत् समैत्विन्द्रियं मयि तद्धस्तिवर्चसम्॥' साझा किया। इस श्लोक का भाव है कि चारों दिशाओं के विस्तार और नेत्रों की दृष्टि-शक्ति की जागरूकता से युक्त ऐसी समृद्धि प्राप्त हो, जिसमें प्रकृति के साथ पूर्ण संतुलन बनाए रखते हुए पर्यावरण का संरक्षण और समस्त जीवन का सतत कल्याण सुनिश्चित हो।
उन्होंने पोस्ट में लिखा, 'प्रकृति के साथ संतुलन बिठाकर समस्त जीवों का कल्याण हो, यही हमारी संस्कृति की मूल भावना रही है। इसी व्यापक दृष्टि से आज भारतवर्ष प्रगति और समृद्धि के पथ पर निरंतर आगे बढ़ रहा है।'
5 जून: विश्व पर्यावरण दिवस पर भी साझा किया था सुभाषित
गौरतलब है कि 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर भी प्रधानमंत्री ने एक संस्कृत सुभाषित साझा किया था। उस पोस्ट में उन्होंने लिखा था कि प्रकृति का संरक्षण केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और संस्कारों का अभिन्न हिस्सा है।
उन्होंने वैदिक श्लोक 'मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥' साझा किया था, जिसका अर्थ है कि वायु हमारे लिए आनंददायक और कल्याणकारी रूप से प्रवाहित हो, नदियाँ जीवनदायिनी और पोषणकारी जल प्रदान करें, तथा औषधियाँ और वनस्पतियाँ समस्त जीव-जगत के लिए आरोग्य और सुख का कारण बनें।
4 जून: योग पर भी साझा किया था सुभाषित
4 जून को प्रधानमंत्री ने योग के महत्व पर एक सुभाषित साझा करते हुए लिखा था कि योग का नियमित अभ्यास तन को स्वस्थ और मन को शांत रखता है, और इसे दिनचर्या का हिस्सा बनाने से जीवन संतुलित एवं ऊर्जावान बनता है।
उन्होंने पतञ्जलि-स्तुति श्लोक 'योगेन चित्तस्य पदेन वाचां, मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। योऽपाकरोत् तं प्रवरं मुनीनां, पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥' साझा किया था। इस श्लोक का अर्थ है कि मन की चित्त-वृत्तियों को योग से, वाणी को व्याकरण से और शरीर की अशुद्धियों को आयुर्वेद द्वारा शुद्ध करने वाले मुनिश्रेष्ठ महर्षि पतञ्जलि को दोनों हाथ जोड़कर नमन।
सुभाषित-श्रृंखला का व्यापक संदर्भ
यह ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) निकट है और सरकार पर्यावरण संरक्षण को नीतिगत प्राथमिकता के रूप में प्रस्तुत कर रही है। प्रधानमंत्री की यह सुभाषित-श्रृंखला भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को समकालीन पर्यावरण-विमर्श से जोड़ने का प्रयास है — जो उनकी सांस्कृतिक कूटनीति का एक स्थायी तत्व रहा है।