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PM मोदी ने एक्स पर साझा किया संस्कृत सुभाषित: प्रकृति-संतुलन ही भारतीय संस्कृति की आत्मा

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PM मोदी ने एक्स पर साझा किया संस्कृत सुभाषित: प्रकृति-संतुलन ही भारतीय संस्कृति की आत्मा

सारांश

PM मोदी ने लगातार तीन दिनों — 4, 5 और 8 जून — को एक्स पर संस्कृत सुभाषित साझा किए, जो योग, पर्यावरण और प्रकृति-संतुलन को भारतीय संस्कृति की आत्मा से जोड़ते हैं। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से पहले यह श्रृंखला प्राचीन ज्ञान को समकालीन विमर्श से जोड़ने का प्रयास है।

मुख्य बातें

PM नरेंद्र मोदी ने 8 जून 2026 को एक्स पर संस्कृत श्लोक साझा कर कहा कि प्रकृति-संतुलन भारतीय संस्कृति की मूल भावना है।
5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर उन्होंने वैदिक सुभाषित 'मधु वाता ऋतायते…' साझा किया था, जो वायु, नदियों और वनस्पतियों के कल्याणकारी स्वरूप की कामना करता है।
4 जून को योग पर महर्षि पतञ्जलि की स्तुति में श्लोक साझा किया था, जो योग, व्याकरण और आयुर्वेद के त्रिवेणी-संगम को रेखांकित करता है।
यह सुभाषित-श्रृंखला 21 जून के अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से पहले भारत की सांस्कृतिक-पर्यावरण कूटनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार, 8 जून 2026 को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक संस्कृत सुभाषित साझा करते हुए कहा कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना और समस्त जीवों का कल्याण सुनिश्चित करना भारतीय संस्कृति की मूल भावना रही है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ भारत आज प्रगति और समृद्धि के पथ पर अग्रसर है।

8 जून का सुभाषित और उसका अर्थ

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी एक्स पोस्ट में संस्कृत श्लोक 'यावच्चतस्रः प्रदिशश्चक्षुर्यावत् समश्नुते। तावत् समैत्विन्द्रियं मयि तद्धस्तिवर्चसम्॥' साझा किया। इस श्लोक का भाव है कि चारों दिशाओं के विस्तार और नेत्रों की दृष्टि-शक्ति की जागरूकता से युक्त ऐसी समृद्धि प्राप्त हो, जिसमें प्रकृति के साथ पूर्ण संतुलन बनाए रखते हुए पर्यावरण का संरक्षण और समस्त जीवन का सतत कल्याण सुनिश्चित हो।

उन्होंने पोस्ट में लिखा, 'प्रकृति के साथ संतुलन बिठाकर समस्त जीवों का कल्याण हो, यही हमारी संस्कृति की मूल भावना रही है। इसी व्यापक दृष्टि से आज भारतवर्ष प्रगति और समृद्धि के पथ पर निरंतर आगे बढ़ रहा है।'

5 जून: विश्व पर्यावरण दिवस पर भी साझा किया था सुभाषित

गौरतलब है कि 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर भी प्रधानमंत्री ने एक संस्कृत सुभाषित साझा किया था। उस पोस्ट में उन्होंने लिखा था कि प्रकृति का संरक्षण केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और संस्कारों का अभिन्न हिस्सा है।

उन्होंने वैदिक श्लोक 'मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥' साझा किया था, जिसका अर्थ है कि वायु हमारे लिए आनंददायक और कल्याणकारी रूप से प्रवाहित हो, नदियाँ जीवनदायिनी और पोषणकारी जल प्रदान करें, तथा औषधियाँ और वनस्पतियाँ समस्त जीव-जगत के लिए आरोग्य और सुख का कारण बनें।

4 जून: योग पर भी साझा किया था सुभाषित

4 जून को प्रधानमंत्री ने योग के महत्व पर एक सुभाषित साझा करते हुए लिखा था कि योग का नियमित अभ्यास तन को स्वस्थ और मन को शांत रखता है, और इसे दिनचर्या का हिस्सा बनाने से जीवन संतुलित एवं ऊर्जावान बनता है।

उन्होंने पतञ्जलि-स्तुति श्लोक 'योगेन चित्तस्य पदेन वाचां, मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। योऽपाकरोत् तं प्रवरं मुनीनां, पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥' साझा किया था। इस श्लोक का अर्थ है कि मन की चित्त-वृत्तियों को योग से, वाणी को व्याकरण से और शरीर की अशुद्धियों को आयुर्वेद द्वारा शुद्ध करने वाले मुनिश्रेष्ठ महर्षि पतञ्जलि को दोनों हाथ जोड़कर नमन।

सुभाषित-श्रृंखला का व्यापक संदर्भ

यह ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) निकट है और सरकार पर्यावरण संरक्षण को नीतिगत प्राथमिकता के रूप में प्रस्तुत कर रही है। प्रधानमंत्री की यह सुभाषित-श्रृंखला भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को समकालीन पर्यावरण-विमर्श से जोड़ने का प्रयास है — जो उनकी सांस्कृतिक कूटनीति का एक स्थायी तत्व रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

आलोचक यह भी पूछते हैं कि संस्कृत श्लोकों की काव्यात्मक अभिव्यक्ति और ज़मीनी पर्यावरण नीतियों के बीच की खाई कब पाटी जाएगी — जब वायु प्रदूषण सूचकांक और वन-क्षरण के आँकड़े चिंताजनक बने हुए हैं। सांस्कृतिक संवाद मूल्यवान है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता मापनीय पर्यावरणीय परिणामों से ही सिद्ध होगी।
RashtraPress
24 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

PM मोदी ने 8 जून को एक्स पर कौन-सा संस्कृत श्लोक साझा किया?
उन्होंने 'यावच्चतस्रः प्रदिशश्चक्षुर्यावत् समश्नुते। तावत् समैत्विन्द्रियं मयि तद्धस्तिवर्चसम्॥' श्लोक साझा किया, जिसका अर्थ है कि चारों दिशाओं की जागरूकता के साथ प्रकृति-संतुलन में रहते हुए समस्त जीवन का सतत कल्याण सुनिश्चित हो।
5 जून को मोदी ने किस सुभाषित से विश्व पर्यावरण दिवस मनाया?
5 जून को उन्होंने वैदिक श्लोक 'मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥' साझा किया, जो वायु, नदियों और औषधीय वनस्पतियों के जीवनदायी स्वरूप की कामना करता है। साथ ही उन्होंने कहा कि प्रकृति-संरक्षण हमारी संस्कृति और संस्कारों का अभिन्न हिस्सा है।
4 जून को PM मोदी ने योग पर कौन-सा श्लोक साझा किया था?
उन्होंने महर्षि पतञ्जलि की स्तुति में 'योगेन चित्तस्य पदेन वाचां…' श्लोक साझा किया था। इसका अर्थ है कि योग से मन, व्याकरण से वाणी और आयुर्वेद से शरीर को शुद्ध करने वाले मुनिश्रेष्ठ पतञ्जलि को नमन।
मोदी की सुभाषित-श्रृंखला का क्या महत्व है?
यह श्रृंखला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) से पहले भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को पर्यावरण और स्वास्थ्य के समकालीन विमर्श से जोड़ने का प्रयास है। यह सरकार की उस व्यापक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है जो भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करती है।
इन श्लोकों में प्रकृति को लेकर क्या संदेश दिया गया है?
तीनों श्लोक मिलकर यह संदेश देते हैं कि मानव-जीवन का कल्याण प्रकृति — वायु, जल, वनस्पति — के साथ सामंजस्य में ही संभव है। यह भारतीय दर्शन की वह अवधारणा है जो पर्यावरण-संरक्षण को नैतिक और आध्यात्मिक दायित्व मानती है।
राष्ट्र प्रेस
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