पाकिस्तान में प्रांतीय पुनर्गठन: संरक्षण के नए रास्ते, विकास को खतरा — रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान में प्रांतों के नए सिरे से विभाजन की बहस एक बार फिर उभर आई है, जिसमें सिंध प्रांत विवाद के केंद्र में है। एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि इस तरह के क्षेत्रीय पुनर्गठन की कीमत बहुत अधिक है — और इसका बोझ उन संसाधनों पर पड़ेगा जो स्कूलों, अस्पतालों और बुनियादी ढाँचे के लिए काम आ सकते थे। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम राजनीतिक संरक्षण के नए रास्ते खोलेगा, न कि शासन-व्यवस्था में सुधार लाएगा।
पुनर्गठन की वास्तविक लागत
रिपोर्ट के अनुसार, हर नए प्रांत के निर्माण के लिए एक गवर्नर, कैबिनेट, सेक्रेटेरिएट, पुलिस कमांड और पूरी प्रशासनिक मशीनरी की ज़रूरत होती है। यह संसाधन वे हैं जो अन्यथा शिक्षा, स्वास्थ्य और ढाँचागत विकास में लगाए जा सकते थे।
रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है: 'इस तरह के पुनर्गठन की लागत कम नहीं है... इससे भी बुरा यह है कि यह संरक्षण के नए रास्ते बनाता है, जिससे सीमित संसाधन जनसेवा के बजाय राजनीतिक सौदेबाजी में लग जाते हैं।' यह आकलन ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है।
प्रशासनिक सुधार या भ्रम?
हर कुछ वर्षों में पंजाब या सिंध को बाँटने के प्रस्ताव आते हैं, जिन्हें प्रशासनिक जटिलता का समाधान बताया जाता है। लेकिन रिपोर्ट तर्क देती है कि प्रांतों की संख्या बढ़ाने से अपने आप निवासियों और फैसला लेने वालों के बीच नज़दीकी नहीं आएगी।
यदि पाकिस्तान 10 या 12 नए प्रांत बनाता है, तो परिणाम केवल अधिक सेक्रेटेरिएट, गवर्नर और विधानसभाओं के रूप में सामने आएगा — नौकरशाही की एक और परत। सत्ता का केंद्र भले ही भौगोलिक रूप से बदल जाए, लेकिन केंद्रीकृत नियंत्रण की संस्कृति जस की तस बनी रहेगी।
रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि चुनावी ढाँचा इस समस्या को और गहरा करता है। वार्डों का बिखरा हुआ ढाँचा प्रतिनिधियों को अपने इलाके के लिए अधिकतम फायदा उठाने के लिए प्रेरित करता है, जिसके चलते परिवहन योजना, आवास और आर्थिक रणनीति में तालमेल नहीं बन पाता।
पाकिस्तान की मौजूदा आर्थिक हालत
आँकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान की आधी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती है। देश में 2.8 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जाते, 10 में से 4 बच्चों का शारीरिक विकास बाधित (स्टंटेड ग्रोथ) है, और तीन-चौथाई आबादी को दूषित पानी मिलता है।
2023 से पाकिस्तान एक कठिन आर्थिक स्थिरीकरण कार्यक्रम से गुज़र रहा है, जिसने विकास को थाम दिया है और राजकोषीय एवं विदेशी मुद्रा भंडार को फिर से बनाने के नाम पर जनता पर बोझ डाला है। विदेशी भंडार अभी भी कमज़ोर हैं, और घरेलू व विदेशी निवेशक असुरक्षा के कारण दूरी बनाए हुए हैं।
गृह मंत्री नकवी की स्वीकारोक्ति
पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने जुलाई में पाकिस्तान इकोनॉमिक समिट में स्वीकार किया कि देश की मौजूदा शासन-प्रणाली विफल हो चुकी है। अखबार 'डॉन' ने नकवी के हवाले से लिखा: 'हम जिस सिस्टम के तहत जी रहे हैं, वह फेल हो चुका है। इसके ज़रिए समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता।'
नकवी ने आगे कहा कि यदि यह व्यवस्था जारी रही तो पाकिस्तान 10 वर्ष बाद भी इन्हीं मुद्दों पर चर्चा करता रहेगा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कृषि प्रधान देश होने के बावजूद पाकिस्तान गेहूँ का आयात करने को मजबूर है — यह शासन की विफलता का एक ठोस उदाहरण है।
नकवी ने राजनीतिक दलों के बीच संवाद का आह्वान करते हुए प्रशासनिक सुधार और नए प्रांतों के निर्माण का प्रस्ताव भी रखा। गौरतलब है कि यह वही नेतृत्व है जो एक ओर व्यवस्था की विफलता स्वीकार करता है और दूसरी ओर उसी व्यवस्था के विस्तार का सुझाव देता है।
आगे का रास्ता क्या?
रिपोर्ट का सार यह है कि प्रांतों की बहस केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि संसाधनों के नियंत्रण और लाभ के वितरण की है। कई जातीय समूहों वाले पाकिस्तान में, जनता की सहमति के बिना प्रांतीय पुनर्गठन पहचान-आधारित राजनीति को और तेज़ कर सकता है।
विश्लेषकों के अनुसार, असली ज़रूरत नए प्रांतों की नहीं, बल्कि मौजूदा प्रशासनिक ढाँचे में पारदर्शिता, जवाबदेही और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण की है — जब तक यह नहीं होता, भौगोलिक पुनर्गठन केवल नई कुर्सियाँ जोड़ेगा, नई उम्मीदें नहीं।