सिंध जल संकट: पंजाब पर तय हिस्से से 21% अधिक पानी लेने का आरोप, खरीफ फसलें खतरे में
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान के सिंध प्रांत में खरीफ सीजन 2025 के दौरान गंभीर जल संकट गहरा गया है। सिंध सिंचाई विभाग के आंकड़ों और स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रांत को उसकी माँग से कहीं कम पानी मिल रहा है, जबकि पंजाब प्रांत पर आरोप है कि वह अपने निर्धारित हिस्से से लगभग 21 प्रतिशत अधिक पानी उपयोग कर रहा है। यह विवाद ऐसे समय उभरा है जब पाकिस्तान पहले से ही जलवायु परिवर्तन, सिकुड़ते जल संसाधनों और कृषि संकट की चपेट में है।
नहरों में पानी की भारी कमी
सुक्कुर बैराज की राइट बैंक नहर प्रणाली में पानी का स्तर चिंताजनक रूप से गिरा है। सिंध सिंचाई विभाग के आंकड़ों के अनुसार, नॉर्थ वेस्ट कैनाल (NWC) में 64.1 प्रतिशत, राइस कैनाल में 38 प्रतिशत और दादू कैनाल में 82 प्रतिशत पानी की कमी दर्ज की गई है। इससे लरकाना, कंबर-शहदादकोट, दादू, शिकारपुर और बलूचिस्तान के कई कृषि क्षेत्र सीधे प्रभावित हो रहे हैं।
किसानों का कहना है कि नहरों के अंतिम छोर तक पानी न पहुँचने के कारण कई क्षेत्रों में अभी तक धान की नर्सरी तैयार नहीं हो सकी है। यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो कृषि उत्पादन और ग्रामीण आजीविका को अपूरणीय नुकसान होने की आशंका है।
पंजाब पर अधिक पानी लेने का आरोप
रिपोर्टों के अनुसार, पंजाब को 44,000 क्यूसेक पानी आवंटित है, लेकिन वह 53,394 क्यूसेक पानी ले रहा है — जो तय हिस्से से 21 प्रतिशत अधिक है। इसी तरह तौंसा बैराज पर भी निर्धारित मात्रा से अधिक पानी निकाले जाने का दावा किया गया है। दूसरी ओर, चश्मा बैराज में जलस्तर लगातार बढ़ रहा है, जो संकेत देता है कि ऊपरी क्षेत्रों में पानी जमा हो रहा है जबकि निचले इलाकों में कमी बढ़ती जा रही है।
सिंध सरकार ने 1,30,000 क्यूसेक पानी की माँग की थी, लेकिन उसे केवल 1,00,000 क्यूसेक ही उपलब्ध कराया जा रहा है।
आर्थिक असर और राजनीतिक चेतावनी
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के सिंध अध्यक्ष निसार अहमद खुखरो ने चेतावनी दी है कि खरीफ सीजन में सिंध के हिस्से का पानी कम करना प्रांत की अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट करेगा। उन्होंने कहा कि सिंध हर साल 55 लाख टन चावल का उत्पादन करता है और लगभग 1.4 अरब डॉलर का निर्यात करता है। यह आँकड़ा बताता है कि जल संकट केवल प्रांतीय मसला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और विदेशी मुद्रा आय का सवाल भी है।
1991 जल समझौते पर उठे सवाल
यह विवाद पाकिस्तान के 1991 जल बंटवारा समझौते की प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े करता है। गौरतलब है कि अप्रैल 2025 में इसी मुद्दे पर पाकिस्तान लगभग दस दिनों तक आंशिक रूप से ठप रहा था। कराची से उत्तर की ओर माल ढुलाई पूरी तरह बंद हो गई थी, जब सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान के चोलिस्तान रेगिस्तान में सिंचाई के लिए छह नहरें बनाने की परियोजना का ऐलान किया था। दक्षिणी सिंध में व्यापक प्रदर्शनों के बाद सरकार को अंततः झुकना पड़ा था।
जल संसाधनों के असमान वितरण से प्रांतों के बीच राजनीतिक तनाव और गहरा होने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक 1991 समझौते को नए जलवायु वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं ढाला जाता, यह संकट हर खरीफ सीजन में दोहराता रहेगा।