पाकिस्तान का जल संकट: सिंधु जल संधि नहीं, भूजल दोहन और कुप्रबंधन है असली वजह — रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान में जल संकट की जड़ें सिंधु जल संधि में नहीं, बल्कि देश की अपनी खस्ताहाल सिंचाई व्यवस्था, अंधाधुंध भूजल दोहन और दशकों के कुप्रबंधन में हैं। यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, लाहौर और पंजाब प्रांत के कई इलाकों में पानी की किल्लत गहराती जा रही है, फिर भी इस्लामाबाद अपनी आंतरिक विफलताओं को सुधारने के बजाय इसका ठीकरा भारत पर फोड़ता रहा है।
सिंचाई व्यवस्था की बदहाली
रिपोर्ट में इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (IWMI) के 2024–2026 के आकलनों का हवाला देते हुए बताया गया है कि पाकिस्तान के कुल मीठे पानी का करीब 95 प्रतिशत हिस्सा कृषि में खर्च होता है। इनमें से लगभग 60 प्रतिशत सिंचाई का पानी नहरों के रिसाव और पुरानी तकनीकों की वजह से बर्बाद हो जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की सिंचाई व्यवस्था दुनिया की सबसे खराब व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है। खेतों तक पानी पहुँचाने के अप्रचलित तरीके और रखरखाव की उपेक्षा ने स्थिति को और विकट बना दिया है।
सेमिनार की रणनीति और अंतरराष्ट्रीय दबाव की कोशिश
हाल ही में पाकिस्तान ने इस्लामाबाद के जिन्ना कन्वेंशन सेंटर में एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया, जिसका विषय था — 'सिंधु जल संधि: शांति और क्षेत्रीय स्थिरता का एक साधन।' यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस सेमिनार का उद्देश्य सिंधु जल संधि (IWT) के मुद्दे को एक बड़े क्षेत्रीय सुरक्षा संकट के रूप में प्रस्तुत कर अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की माँग करना था।
रिपोर्ट के अनुसार, यह उसी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है जिसका उपयोग पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर मुद्दे को 'परमाणु खतरे वाले क्षेत्र' के रूप में पेश करने में करता रहा है — यानी आंतरिक विफलता को बाहरी संकट का रूप देना।
भारत की 'सद्भावना' और संधि का इतिहास
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान सिंधु जल संधि को सीमा पार नदी सहयोग का एक सफल उदाहरण बताता है, लेकिन 1960 से अब तक इसका जारी रहना काफी हद तक इसलिए संभव हुआ क्योंकि ऊपरी क्षेत्र के देश के रूप में भारत ने लगातार 'सद्भावना और उदारता' का परिचय दिया। रिपोर्ट में यह भी जोड़ा गया कि यदि पाकिस्तान ऊपरी क्षेत्र में होता, तो यह मानना कठिन होता कि वह जल स्रोतों का उपयोग भारत पर दबाव बनाने के लिए नहीं करता।
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने कई बार सिंधु जल संधि की भावना का उल्लंघन किया — जिसमें 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1999 का कारगिल संघर्ष और सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देना शामिल है।
पहलगाम हमले के बाद भारत का कड़ा रुख
रिपोर्ट में संसद हमले (दिसंबर 2001), मुंबई आतंकी हमले (नवंबर 2008), पुलवामा हमले (फरवरी 2019) और पहलगाम आतंकी हमले (अप्रैल 2025) सहित कई आतंकी घटनाओं का उल्लेख किया गया है।
पहलगाम हमले के बाद भारत सरकार ने सिंधु जल संधि को फिलहाल स्थगित कर दिया। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में इस संधि पर सहयोग पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद समाप्त करने के ठोस कदमों पर निर्भर करेगा।