सिंधु जल संधि निलंबन पाकिस्तान की जनता नहीं, आतंकवाद के खिलाफ भारत का दबाव: रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने सिंधु जल संधि (IWT) को फिलहाल लागू न रखने का जो निर्णय लिया है, वह पाकिस्तान की आम जनता के विरुद्ध नहीं, बल्कि आतंकवाद को राजकीय हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाली पाकिस्तान सरकार पर कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर पीस स्टडीज की एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की नीतियों ने सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा दिया है और पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को कमज़ोर किया है। इसका असर केवल भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं, बल्कि मध्य एशिया, दक्षिण एशिया और उससे आगे तक महसूस किया जा सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान लगातार भारत के खिलाफ भड़काऊ बयान और गैर-कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल करता रहा है। सीमा पार आतंकवाद को निरंतर समर्थन और बार-बार की सैन्य आक्रामकता ने सिंधु जल संधि की मूल भावना को कमज़ोर किया है।
पाकिस्तानी नेताओं की उग्र भाषा
हाल ही में पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मसूद मलिक ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'जो भी हमारे पानी को छुएगा, उसके हाथ काट दिए जाएंगे।' इसी तरह पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता (डीजी आईएसपीआर) लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने कथित तौर पर कहा, 'अगर आप हमारा पानी रोकेंगे, तो हम आपकी सांसें रोक देंगे।' इससे पहले लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के प्रमुख और घोषित आतंकवादी हाफिज सईद ने भी इसी तरह की धमकी दी थी।
संधि का इतिहास और भारत की उदारता
1960 में हस्ताक्षरित इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के कुल जल का लगभग 80.52 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान को मिलता है, जबकि ऊपरी धारा का देश होने के बावजूद भारत को मात्र 19.48 प्रतिशत पानी ही मिला है। रिपोर्ट इसे दुनिया का एक अनोखा उदाहरण बताती है, जहाँ ऊपरी धारा वाले देश ने स्वेच्छा से छह नदियों के पानी का चार गुना से भी अधिक हिस्सा निचली धारा के देश को दे दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, यह संधि 1965, 1971 और 1999 (कारगिल) के युद्धों के दौरान भी जारी रही, क्योंकि भारत ने हर परिस्थिति में ईमानदारी से इसका पालन किया। लेकिन इस उदारता के कारण भारत को आर्थिक विकास, कृषि, जलविद्युत उत्पादन, सिंचाई विस्तार और बुनियादी ढाँचे में भारी नुकसान उठाना पड़ा।
भारत का वर्तमान रुख
रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत ने इस संधि को रद्द या निलंबित नहीं किया है, बल्कि इसे फिलहाल लागू न रखने का निर्णय लिया है। यह एक प्रतिवर्ती कदम है — यदि पाकिस्तान भारत के विरुद्ध सीमा पार आतंकवाद का समर्थन पूरी तरह बंद कर देता है, तो भविष्य में संधि को पुनः लागू किया जा सकता है।
आगे क्या होगा
रिपोर्ट के अनुसार, IWT का भविष्य अब सीधे तौर पर इस बात पर निर्भर है कि पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देना बंद करता है या नहीं। यह ऐसे समय में आया है जब पहलगाम हमले के बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव अपने उच्चतम स्तर पर है। गौरतलब है कि जल को कूटनीतिक दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की यह पहली औपचारिक रूप से दस्तावेज़ीकृत कार्रवाई है।