7 जुलाई 2026
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सिंधु जल संधि निलंबन पाकिस्तान की जनता नहीं, आतंकवाद के खिलाफ भारत का दबाव: रिपोर्ट

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सिंधु जल संधि निलंबन पाकिस्तान की जनता नहीं, आतंकवाद के खिलाफ भारत का दबाव: रिपोर्ट

सारांश

पहलगाम हमले के बाद भारत का सिंधु जल संधि निलंबन महज़ एक जल-विवाद नहीं — यह आतंकवाद को राजकीय हथियार बनाने की कीमत चुकाने का संकेत है। रिपोर्ट बताती है कि 80.52% पानी देने वाली इस संधि को भारत ने रद्द नहीं, बल्कि 'फिलहाल लागू न रखने' का रास्ता चुना है — दरवाज़ा खुला है, लेकिन शर्त साफ़ है।

मुख्य बातें

भारत सरकार ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि (IWT) को फिलहाल लागू न रखने का निर्णय लिया है।
इंटरनेशनल सेंटर फॉर पीस स्टडीज की रिपोर्ट के अनुसार यह कदम पाकिस्तान की आम जनता नहीं, बल्कि आतंकवाद-समर्थक सरकारी नीति के खिलाफ है।
संधि के तहत सिंधु प्रणाली के कुल जल का 80.52% पाकिस्तान को और मात्र 19.48% भारत को मिलता है।
पाकिस्तानी जलवायु मंत्री मुसादिक मसूद मलिक और डीजी आईएसपीआर लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने उग्र धमकी भरे बयान दिए।
भारत ने संधि रद्द नहीं की — इसे प्रतिवर्ती रूप से निलंबित रखा गया है; पाकिस्तान के आतंकवाद-समर्थन बंद करने पर पुनः लागू हो सकती है।
यह संधि 1965 , 1971 और 1999 (कारगिल) के युद्धों के दौरान भी भारत ने ईमानदारी से निभाई थी।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने सिंधु जल संधि (IWT) को फिलहाल लागू न रखने का जो निर्णय लिया है, वह पाकिस्तान की आम जनता के विरुद्ध नहीं, बल्कि आतंकवाद को राजकीय हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाली पाकिस्तान सरकार पर कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर पीस स्टडीज की एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की नीतियों ने सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा दिया है और पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को कमज़ोर किया है। इसका असर केवल भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं, बल्कि मध्य एशिया, दक्षिण एशिया और उससे आगे तक महसूस किया जा सकता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान लगातार भारत के खिलाफ भड़काऊ बयान और गैर-कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल करता रहा है। सीमा पार आतंकवाद को निरंतर समर्थन और बार-बार की सैन्य आक्रामकता ने सिंधु जल संधि की मूल भावना को कमज़ोर किया है।

पाकिस्तानी नेताओं की उग्र भाषा

हाल ही में पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मसूद मलिक ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'जो भी हमारे पानी को छुएगा, उसके हाथ काट दिए जाएंगे।' इसी तरह पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता (डीजी आईएसपीआर) लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने कथित तौर पर कहा, 'अगर आप हमारा पानी रोकेंगे, तो हम आपकी सांसें रोक देंगे।' इससे पहले लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के प्रमुख और घोषित आतंकवादी हाफिज सईद ने भी इसी तरह की धमकी दी थी।

संधि का इतिहास और भारत की उदारता

1960 में हस्ताक्षरित इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के कुल जल का लगभग 80.52 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान को मिलता है, जबकि ऊपरी धारा का देश होने के बावजूद भारत को मात्र 19.48 प्रतिशत पानी ही मिला है। रिपोर्ट इसे दुनिया का एक अनोखा उदाहरण बताती है, जहाँ ऊपरी धारा वाले देश ने स्वेच्छा से छह नदियों के पानी का चार गुना से भी अधिक हिस्सा निचली धारा के देश को दे दिया।

रिपोर्ट के अनुसार, यह संधि 1965, 1971 और 1999 (कारगिल) के युद्धों के दौरान भी जारी रही, क्योंकि भारत ने हर परिस्थिति में ईमानदारी से इसका पालन किया। लेकिन इस उदारता के कारण भारत को आर्थिक विकास, कृषि, जलविद्युत उत्पादन, सिंचाई विस्तार और बुनियादी ढाँचे में भारी नुकसान उठाना पड़ा।

भारत का वर्तमान रुख

रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत ने इस संधि को रद्द या निलंबित नहीं किया है, बल्कि इसे फिलहाल लागू न रखने का निर्णय लिया है। यह एक प्रतिवर्ती कदम है — यदि पाकिस्तान भारत के विरुद्ध सीमा पार आतंकवाद का समर्थन पूरी तरह बंद कर देता है, तो भविष्य में संधि को पुनः लागू किया जा सकता है।

आगे क्या होगा

रिपोर्ट के अनुसार, IWT का भविष्य अब सीधे तौर पर इस बात पर निर्भर है कि पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देना बंद करता है या नहीं। यह ऐसे समय में आया है जब पहलगाम हमले के बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव अपने उच्चतम स्तर पर है। गौरतलब है कि जल को कूटनीतिक दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की यह पहली औपचारिक रूप से दस्तावेज़ीकृत कार्रवाई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि वहाँ की निर्वाचित सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच खाई जगज़ाहिर है। 'फिलहाल लागू न रखने' और 'निलंबन' के बीच का कूटनीतिक अंतर सावधानी से बनाए रखा गया है — यह बताता है कि भारत वार्ता का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं करना चाहता। असली परीक्षा यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस कदम को वैध दबाव मानता है या जल-युद्ध की शुरुआत — और इस धारणा की लड़ाई अभी बाकी है।
RashtraPress
7 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत ने सिंधु जल संधि को क्यों निलंबित किया?
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) को फिलहाल लागू न रखने का निर्णय लिया, ताकि पाकिस्तान की आतंकवाद-समर्थक नीतियों पर कूटनीतिक दबाव बनाया जा सके। इंटरनेशनल सेंटर फॉर पीस स्टडीज की रिपोर्ट के अनुसार यह कदम पाकिस्तान की जनता के खिलाफ नहीं है।
सिंधु जल संधि के तहत भारत और पाकिस्तान को कितना पानी मिलता है?
संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के कुल जल का लगभग 80.52 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान को मिलता है, जबकि ऊपरी धारा का देश होने के बावजूद भारत को केवल 19.48 प्रतिशत पानी मिलता है। रिपोर्ट इसे दुनिया का एक अनोखा उदाहरण बताती है।
क्या भारत ने सिंधु जल संधि पूरी तरह रद्द कर दी है?
नहीं। भारत ने संधि को रद्द या निलंबित नहीं किया है, बल्कि इसे 'फिलहाल लागू न रखने' का निर्णय लिया है। रिपोर्ट के अनुसार यदि पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का समर्थन पूरी तरह बंद कर देता है, तो भविष्य में संधि पुनः लागू की जा सकती है।
पाकिस्तानी नेताओं ने सिंधु जल मुद्दे पर क्या कहा?
पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मसूद मलिक ने कहा, 'जो भी हमारे पानी को छुएगा, उसके हाथ काट दिए जाएंगे।' डीजी आईएसपीआर लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने कथित तौर पर कहा, 'अगर आप हमारा पानी रोकेंगे, तो हम आपकी सांसें रोक देंगे।' इससे पहले घोषित आतंकवादी हाफिज सईद ने भी इसी तरह की धमकी दी थी।
क्या यह संधि पहले भी युद्धों के दौरान लागू रही थी?
हाँ। रिपोर्ट के अनुसार यह संधि 1965, 1971 और 1999 (कारगिल) के युद्धों के दौरान भी जारी रही, क्योंकि भारत ने हर परिस्थिति में ईमानदारी से इसका पालन किया। पहलगाम हमले के बाद पहली बार भारत ने इसे लागू न रखने का निर्णय लिया है।
राष्ट्र प्रेस
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