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सिंधु जल संधि स्थगित रहेगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद नहीं रोकता: विदेश मंत्रालय

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सिंधु जल संधि स्थगित रहेगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद नहीं रोकता: विदेश मंत्रालय

सारांश

पहलगाम हमले के बाद स्थगित की गई सिंधु जल संधि को भारत ने एक बार फिर पाकिस्तान के आतंकवाद-समर्थन से सीधे जोड़ा। MEA ने 15 मई के मध्यस्थता फैसले को भी 'शून्य और अवैध' बताया। छह दशक पुरानी यह संधि अब भारत के लिए कूटनीतिक दबाव का औज़ार बन चुकी है।

मुख्य बातें

MEA प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने 5 जून 2026 को दोहराया कि सिंधु जल संधि (IWT) तब तक स्थगित रहेगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद पूरी तरह बंद नहीं करता।
पाकिस्तान ने चिनाब-ब्यास लिंक टनल और सलाल बांध से गाद निकालने की भारत की योजनाओं पर आपत्ति जताई थी।
भारत ने 15 मई 2026 को तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय के फैसले को 'शून्य और अवैध' बताते हुए अस्वीकार किया।
संधि पर 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर हुए थे; पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इसे स्थगित किया था।
किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं पर भी इसी न्यायाधिकरण के पूर्व फैसलों को भारत खारिज कर चुका है।

विदेश मंत्रालय (MEA) ने शुक्रवार, 5 जून 2026 को स्पष्ट किया कि सिंधु जल संधि (IWT) तब तक स्थगित रहेगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह और विश्वसनीय तरीके से समाप्त नहीं कर देता। नई दिल्ली में साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान MEA प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने यह बयान दिया, जो पाकिस्तान द्वारा भारत की कुछ जल-संबंधी परियोजनाओं पर आपत्ति जताए जाने के बाद आया है।

पाकिस्तान की आपत्ति और भारत का जवाब

पाकिस्तान ने चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना और सलाल बांध जलाशय से गाद निकालने की भारत की योजनाओं पर एतराज जताते हुए आरोप लगाया था कि भारत पानी को 'हथियार' के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है। इस पर प्रवक्ता जायसवाल ने सीधे शब्दों में कहा, 'हमने सिंधु जल संधि को स्थगित कर रखा है और यह तब तक स्थगित रहेगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह समाप्त नहीं कर देता।'

मध्यस्थता न्यायालय के फैसले को भारत की अस्वीकृति

भारत ने पिछले महीने भी 15 मई 2026 को तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय (कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन) द्वारा जारी फैसले को 'शून्य और अवैध' करार दिया था। यह फैसला सिंधु जल संधि की व्याख्या और अधिकतम जल भंडारण क्षमता से जुड़े विवाद पर था। विदेश मंत्रालय का कहना है कि भारत ने इस न्यायाधिकरण के गठन को कभी मान्यता नहीं दी, इसलिए इसकी कोई भी कार्यवाही, फैसला या आदेश भारत की दृष्टि में कानूनी रूप से मान्य नहीं है।

गौरतलब है कि भारत ने इससे पहले जम्मू-कश्मीर में स्थित किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े मामलों में भी इसी न्यायाधिकरण के फैसलों को खारिज किया था। भारत का आरोप है कि यह पूरा तंत्र ही सिंधु जल संधि का उल्लंघन है और पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों का दुरुपयोग कर जवाबदेही से बचने की कोशिश करता रहा है।

संधि की पृष्ठभूमि और स्थगन का कारण

सिंधु जल संधि पर भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर हुए थे। यह संधि सिंधु नदी प्रणाली की नदियों के जल उपयोग को नियंत्रित करती है और दशकों से दोनों देशों के बीच जल-बँटवारे का आधार रही है। पिछले वर्ष पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपने संप्रभु अधिकारों का हवाला देते हुए इस संधि को स्थगित करने का निर्णय लिया था। यह ऐसे समय में आया है जब भारत-पाकिस्तान संबंध पहले से ही गहरे तनाव में हैं।

संप्रभुता और कश्मीर पर भारत का स्पष्ट रुख

जम्मू-कश्मीर में स्विट्जरलैंड के राजदूत की यात्रा पर पाकिस्तान की टिप्पणी के संदर्भ में भी जायसवाल ने दो-टूक कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और स्विस राजदूत सहित किसी भी देश के राजदूत को वहाँ जाने की पूरी स्वतंत्रता है। विदेश मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि संधि के स्थगन की अवधि में भारत उसके तहत अपने दायित्वों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है।

आगे क्या

भारत की यह स्थिति संकेत देती है कि जब तक पाकिस्तान की ओर से ठोस और सत्यापन-योग्य कार्रवाई नहीं होती, सिंधु जल संधि की बहाली की कोई तत्काल संभावना नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार यह गतिरोध दोनों देशों के बीच व्यापक कूटनीतिक संबंधों को भी प्रभावित करता रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

किंतु यह तर्क अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सर्वस्वीकृत नहीं है। असली सवाल यह है कि बिना किसी सत्यापन-योग्य मानदंड के 'पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद बंद करने' की शर्त को कौन प्रमाणित करेगा — और यह अस्पष्टता इस गतिरोध को अनिश्चित काल तक खींच सकती है।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सिंधु जल संधि क्या है और इसे क्यों स्थगित किया गया?
सिंधु जल संधि (IWT) भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षरित एक द्विपक्षीय समझौता है जो सिंधु नदी प्रणाली के जल-उपयोग को नियंत्रित करता है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इसे स्थगित कर दिया, यह कहते हुए कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद विश्वसनीय रूप से बंद नहीं करता, संधि बहाल नहीं होगी।
भारत ने मध्यस्थता न्यायालय के फैसले को क्यों खारिज किया?
भारत का कहना है कि उसने इस तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय के गठन को कभी मान्यता नहीं दी, इसलिए 15 मई 2026 का फैसला भारत की नज़र में 'शून्य और अवैध' है। भारत का तर्क है कि यह न्यायाधिकरण ही सिंधु जल संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करके बना है।
पाकिस्तान ने किन परियोजनाओं पर आपत्ति जताई है?
पाकिस्तान ने चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना और सलाल बांध जलाशय से गाद निकालने की भारत की योजनाओं पर एतराज जताया है। पाकिस्तान का आरोप है कि भारत पानी को 'हथियार' के रूप में इस्तेमाल कर रहा है, जिसे भारत ने खारिज किया है।
संधि स्थगित रहने से पाकिस्तान पर क्या असर पड़ता है?
संधि के स्थगन का अर्थ है कि भारत उसके तहत अपने दायित्वों — जैसे जल-प्रवाह की सूचना देना और कुछ परियोजनाओं पर परामर्श करना — को पूरा करने के लिए बाध्य नहीं है। इससे पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों के जल-प्रवाह की जानकारी और संयुक्त तंत्र से मिलने वाले लाभ प्रभावित हो सकते हैं।
संधि बहाल होने की क्या शर्त है?
भारत ने स्पष्ट किया है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह और स्थायी रूप से बंद नहीं करता, संधि बहाल नहीं की जाएगी। हालाँकि इस शर्त को सत्यापित करने का कोई स्पष्ट तंत्र अभी तक सार्वजनिक रूप से परिभाषित नहीं किया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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