सिंधु जल संधि निलंबन: पाकिस्तान में आमूल बदलाव के बिना पानी का सामान्य प्रवाह असंभव — रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
सिंधु जल संधि (IWT) के निलंबन को लेकर एक विश्लेषण रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि जब तक पाकिस्तान अपनी राष्ट्रीय नीति और सैन्य-राजनीतिक ढाँचे में आमूलचूल परिवर्तन नहीं करता, तब तक सिंधु नदी के जल का सामान्य प्रवाह और सीमा पार व्यापार की बहाली दूर की कौड़ी बनी रहेगी। भारत सरकार ने पहलगाम आतंकी हमले — जिसमें 26 निर्दोष नागरिकों की जान गई — के बाद 1960 में हस्ताक्षरित इस संधि को निलंबित कर दिया था।
संधि निलंबन की पृष्ठभूमि
मीडिया इंडिया ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार, सिंधु जल संधि का मौजूदा ढाँचा बिना शर्त भरोसे पर टिका था, जिसमें समस्त दायित्व भारत पर थे और बदले में कोई ठोस प्रतिफल नहीं मिल रहा था। रिपोर्ट में इस व्यवस्था को 'नाकाम' करार देते हुए कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय समझौते किसी एक पक्ष के हितों की बलि देकर नहीं चलाए जा सकते।
गौरतलब है कि यह संधि सिंधु बेसिन की पाँच हिमालयी नदियों के जल-बँटवारे से संबंधित है और दशकों से भारत-पाकिस्तान जल-कूटनीति की आधारशिला रही है। भारत ने इसे निलंबित करते हुए स्पष्ट किया कि यह कदम पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद की प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया है।
पाकिस्तान की विफलताएँ और शत्रुतापूर्ण रवैया
रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि इस्लामाबाद शांतिपूर्ण संबंध स्थापित करने, रचनात्मक कूटनीतिक संवाद बनाए रखने और संधि के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक प्रतिबद्धता दिखाने में लगातार विफल रहा है। पाकिस्तानी नेतृत्व की ओर से भारत के खिलाफ परमाणु हमले की धमकियाँ तक दी गई हैं, जिसे रिपोर्ट में 'गैर-कूटनीतिक उकसावा' बताया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, सीमा पार आतंकवाद को पाकिस्तानी प्रतिष्ठान का खुला समर्थन मिलता रहा है, जिससे संधि की भावना और उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन दोनों कमज़ोर हुए हैं।
भारत का आधिकारिक पक्ष
नई दिल्ली ने स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान के साथ सार्थक संवाद केवल तभी संभव है जब आतंक और हिंसा से मुक्त माहौल हो और पाकिस्तान यह सुनिश्चित करे कि उसकी भूमि का उपयोग भारत-विरोधी आतंकी गतिविधियों के लिए न हो। भारत सरकार का आधिकारिक रुख इन शब्दों में सामने आया है: "पानी और खून साथ नहीं बह सकते, और न ही आतंक और व्यापार साथ चल सकते हैं।"
रिपोर्ट के मुताबिक, चाहे अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण का रास्ता हो या परमाणु दबाव की रणनीति — इनमें से कोई भी पाकिस्तान के लिए वांछित परिणाम नहीं लाएगा, जब तक वह अपना व्यवहार नहीं बदलता।
पाकिस्तान का ऐतिहासिक पैटर्न
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध चार पारंपरिक युद्ध छेड़े और हर बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक पराजय का सामना किया। बावजूद इसके, पाकिस्तान की सैन्य-राजनीतिक स्थापना ने आत्मचिंतन के बजाय वैचारिक कट्टरता और शत्रुता को और गहरा किया। जवाबदेही के स्थान पर इनकार को प्राथमिकता दी गई।
आगे क्या होगा
रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि जब तक पाकिस्तान में लोकतांत्रिक जवाबदेही नहीं आती, सेना की वैचारिक एकाधिकार समाप्त नहीं होती और पाकिस्तान खुद को भारत के विरुद्ध एक सैन्य गढ़ के बजाय एक जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में नहीं देखता — तब तक सिंधु जल का सामान्य प्रवाह और सीमा पार व्यापार की बहाली की हर उम्मीद अधूरी रहेगी। रिपोर्ट के अनुसार, इस आमूल कायापलट के बिना पाकिस्तान के साथ कोई भी संवाद नाजुक और अस्थिर रहेगा।