पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: महिला हिंसा जांच में पूर्वाग्रह न्याय की राह में बाधा
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में केवल सामाजिक मानसिकता बदलना पर्याप्त नहीं है — जांच प्रक्रिया भी लैंगिक संवेदनशीलता से परिपूर्ण होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि जांच में पूर्वाग्रह या भेदभाव घर कर जाए, तो सच्चाई तक पहुँचने का रास्ता, न्यायाधीश के सामने सबूत आने से पहले ही, बाधित हो सकता है। यह फैसला एक हत्या मामले में आया, लेकिन इसका असर पाकिस्तान की पूरी आपराधिक न्याय प्रणाली पर पड़ने की संभावना है।
फैसले का मूल आधार
जस्टिस मोहम्मद हाशिम खान काकर ने दो सदस्यीय पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए कहा कि पुलिस अधिकारियों को महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों की जांच करते समय लैंगिक और पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रहों को पहचानने और उनसे ऊपर उठने का विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की जांच में रूढ़िवादी लैंगिक धारणाएं निष्पक्षता को कमज़ोर कर सकती हैं।
गौरतलब है कि यह टिप्पणी महज सैद्धांतिक नहीं है — अदालत ने प्रत्यक्ष रूप से कहा कि घरेलू हिंसा के मामलों में जांच एजेंसियों की पूर्वधारणाएं सबूत संग्रह के स्तर पर ही सच्चाई को विकृत कर सकती हैं।
घरेलू हिंसा: न्याय प्रणाली की विशेष चुनौती
सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया कि घरेलू हिंसा आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक असाधारण चुनौती है, क्योंकि ऐसे अपराध अक्सर बंद कमरों के भीतर घटित होते हैं। अदालत ने कहा कि त्रासदी केवल यह नहीं है कि किसी महिला की उसके घर में हत्या हो सकती है, बल्कि यह भी है कि उसकी मौत से जुड़े हालात चारदीवारी के भीतर दफन रह सकते हैं।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे मामलों में स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी नहीं होते, भौतिक सबूत छिपाए जा सकते हैं और परिवार के सदस्य अक्सर गवाही देने से कतराते हैं। यदि पीड़िता की मृत्यु हो जाए, तो वह अपना पक्ष रखने में भी असमर्थ होती है।
कानूनी व्यवस्था की जिम्मेदारी
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानूनी व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि वह सच को उजागर करे, न कि वैवाहिक घर की निजता को अपराधियों के लिए सुरक्षा कवच बनने दे। पारंपरिक धारणाएं और सबूतों से जुड़ी सामान्य अपेक्षाएं अक्सर महिलाओं के खिलाफ काम करती हैं।
इसके साथ ही अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उपलब्ध सभी सबूतों की पहचान करें, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करें और उन्हें रिकॉर्ड पर सुरक्षित रखें।
पाकिस्तान में महिला हिंसा के आँकड़े
इस फैसले का संदर्भ समझने के लिए आँकड़े चौंकाने वाले हैं। पीस एंड जस्टिस नेटवर्क पाकिस्तान की राष्ट्रीय लैंगिक हिंसा अपराध रिपोर्ट 2021-25 के अनुसार, केवल पंजाब प्रांत में इस अवधि में महिलाओं और लड़कियों से जुड़े 1,95,787 मामले दर्ज किए गए। रिपोर्टों के अनुसार यह संख्या देशभर में दर्ज लैंगिक हिंसा के कुल मामलों का लगभग 82 प्रतिशत है।
इनमें घरेलू हिंसा के 14,824 मामले थे, जिनमें 3,746 मामलों में महिलाओं की हत्या की गई। इसके अतिरिक्त 830 ऑनर किलिंग, 442 महिलाओं को जलाने के मामले — जिनमें 143 एसिड अटैक और 299 स्टोव से जलाने की घटनाएं शामिल थीं — दर्ज हुईं।
यौन हिंसा के मामले भी बड़ी संख्या में सामने आए: इस अवधि में 20,560 मामले दर्ज हुए, जिनमें 16,827 दुष्कर्म, 2,183 सामूहिक दुष्कर्म, 189 हिरासत में यौन हिंसा और 1,361 अनाचार के मामले शामिल थे। अपहरण और किडनैपिंग के 90,965 मामले सभी श्रेणियों में सर्वाधिक थे।
बढ़ती संख्या और आगे की राह
वर्षवार आँकड़े एक गंभीर प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं: पंजाब में 2021 में 23,032, 2022 में 28,080, 2023 में 35,238, 2024 में 52,824 और 2025 में 56,613 मामले दर्ज हुए — यानी चार वर्षों में मामले ढाई गुना से भी अधिक हो गए।
इस पृष्ठभूमि में सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला केवल एक न्यायिक टिप्पणी नहीं, बल्कि पूरी जांच और न्याय प्रणाली में संरचनात्मक सुधार की माँग है। अब देखना यह होगा कि पाकिस्तान सरकार और पुलिस प्रशासन इस निर्देश को ज़मीन पर कितनी प्रभावी रूप से लागू करते हैं।