थारपारकर में 9 महीनों में 122 आत्महत्याएँ: सूखा, गरीबी और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव बना कारण
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान के सिंध प्रांत का जिला थारपारकर इन दिनों बेहद गंभीर कारणों से चर्चा में है — जनवरी से सितंबर 2026 के बीच यहाँ 122 लोगों ने आत्महत्या कर ली। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 17 लाख 78 हज़ार से अधिक की आबादी वाले इस जिले में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी है, जो इस संकट को और गहरा बना रही है। सात तालुकों में फैले इस जिले के दूरदराज के गाँवों में रहने वाले लोगों के लिए मनोवैज्ञानिक सहायता पाना लगभग असंभव बना हुआ है।
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली
द फ्राइडे टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के स्वास्थ्य विभाग ने थारपारकर की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने के लिए केवल दो प्रशिक्षित पेशेवरों को नियुक्त किया है — यह संख्या 17 लाख से अधिक की आबादी के मुकाबले नगण्य है। जिले के दूर-दराज के इलाकों में स्टाफ की कमी, अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएँ और जर्जर सड़कें लोगों को चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक सहायता से वंचित कर देती हैं। यह ऐसे समय में आया है जब पूरे पाकिस्तान में मानसिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढाँचे को लेकर पहले से ही गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
सूखा और पलायन: संकट की जड़
थारपारकर के ग्रामीण इलाकों में अधिकांश परिवार अपनी आजीविका के लिए बारिश और पशुधन पर निर्भर हैं। बार-बार पड़ने वाले सूखे के कारण ये परिवार पानी की कमी, फसल बर्बादी और पशुधन के नुकसान की चोट झेलते रहते हैं। गौरतलब है कि सूखा पीड़ित अक्सर कृषि कार्य और दिहाड़ी मज़दूरी की तलाश में संघार, मीरपुरखास और बदिन जिलों के सिंचित क्षेत्रों की ओर पलायन करने को मजबूर होते हैं। इस विस्थापन से परिवार टूटते हैं, सामुदायिक संबंध कमज़ोर होते हैं और मानसिक तनाव बढ़ता है।
महिलाएँ और बच्चे सबसे अधिक प्रभावित
रिपोर्ट के अनुसार, थारपारकर में बच्चे गरीबी और पलायन की मार सबसे तीखी झेलते हैं। बार-बार होने वाले विस्थापन से उनकी पढ़ाई बाधित होती है और आर्थिक तंगी के चलते उन्हें स्कूल छोड़कर परिवार की मदद करने पर मजबूर होना पड़ता है। महिलाओं की स्थिति भी कम दयनीय नहीं है — पीने का पानी लाने, ईंधन के लिए लकड़ी जुटाने और कपास की कटाई जैसे कठिन कार्यों के बोझ के साथ-साथ कुछ मामलों में उन्हें घरेलू हिंसा का भी सामना करना पड़ता है, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुँचाती है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
अली नवाज़ रहीमू ने द फ्राइडे टाइम्स को बताया, 'हालांकि आत्महत्या एक गंभीर समस्या है और इसे किसी एक कारण से नहीं जोड़ा जा सकता, लेकिन थारपारकर में लगातार गरीबी, बेरोज़गारी, पारिवारिक कलह, सामाजिक दबाव, विस्थापन और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अपर्याप्त मदद लोगों में मानसिक परेशानी का कारण बन सकते हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि आत्महत्या की बढ़ोतरी के वास्तविक कारणों को समझने के लिए महज़ अनुमान के बजाय गहन शोध आवश्यक है और पिछले वर्षों के आँकड़ों से तुलना भी ज़रूरी है।
सुझाए गए समाधान और आगे की राह
रिपोर्ट में सिंध सरकार से माँग की गई है कि वह थारपारकर के अस्पतालों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और परामर्शदाता नियुक्त करे। इसके अलावा, जहाँ परिवहन सुविधाएँ सीमित हैं, वहाँ मोबाइल मेंटल हेल्थ टीम और रेफरल सेवाएँ शुरू करने की बात भी कही गई है। सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रमों के ज़रिए मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक कलंक को कम करने और लोगों को मानसिक तनाव के शुरुआती लक्षण पहचानने में सक्षम बनाने की सिफारिश भी की गई है। थारपारकर का यह संकट तब तक थमने की उम्मीद कम है जब तक सरकार ठोस और दीर्घकालिक कदम नहीं उठाती।