अफगानिस्तान पर पकड़ खोता पाकिस्तान: ISKP नेटवर्क को 'बर्दाश्त' करने की नई रणनीति
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान की अफगानिस्तान पर कूटनीतिक पकड़ तेज़ी से कमज़ोर पड़ रही है और रिपोर्टों के अनुसार इस्लामाबाद एक बार फिर चुनिंदा आतंकवादी समूहों को 'बर्दाश्त' करने की पुरानी रणनीति की ओर लौट रहा है। अमेरिकन थिंकर की एक विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रोविंस (ISKP) का नेटवर्क खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांतों में अभी भी सक्रिय है और कथित तौर पर पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र के भीतर कुछ तत्वों के समर्थन या묵인 से जीवित है।
रणनीतिक गहराई की नीति का पतन
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की दशकों पुरानी 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' (रणनीतिक गहराई) की नीति अब विफल हो चुकी है। पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी के नेताओं का यह मानना था कि काबुल में अपने अनुकूल सरकार रखने से भारत के खिलाफ अतिरिक्त रणनीतिक जगह मिलेगी और पश्चिमी सीमा पर शत्रुता का खतरा नहीं रहेगा। रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि यह सोच गलत साबित हो चुकी है।
जब अगस्त 2021 में तालिबान सत्ता में लौटा, तो पाकिस्तानी नेतृत्व को उम्मीद थी कि तालिबान डूरंड लाइन को मान्यता देगा, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को दबाएगा और पाकिस्तानी व्यापार मार्गों पर निर्भर रहेगा। इसके बजाय, तालिबान ने अपनी स्वायत्तता को प्राथमिकता दी।
इस्लामाबाद-काबुल संबंधों में गहरी दरार
रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद और काबुल के बीच संबंध अब गंभीर रूप से बिगड़ चुके हैं। दोनों पक्षों के बीच सीमा पर झड़पें, हवाई हमले, आर्थिक दबाव और आतंकवाद को समर्थन देने के आपसी आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं। तालिबान ने पाकिस्तान पर आरोप लगाया है कि वह अपनी जमीन से ISKP को पनपने की अनुमति दे रहा है और ISKP नेता सनाउल्लाह गफारी के पाकिस्तान के भीतर कथित आतंकी शिविरों में आने-जाने का हवाला दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, जून 2026 में तालिबान ने दावा किया कि उन्होंने बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में उन स्थानों पर हमले किए जो उनके अनुसार ISKP से जुड़े थे। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने फरवरी 2026 में कहा था कि 'हमारे सब्र का बांध टूट चुका है' और खुली जंग शुरू हो गई है।
ISKP: तालिबान का सबसे खतरनाक दुश्मन
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि ISKP तालिबान का सबसे खतरनाक जिहादी प्रतिद्वंद्वी बना हुआ है। जहाँ तालिबान का एजेंडा मुख्यतः अफगानिस्तान-केंद्रित है, वहीं ISKP इस्लामिक स्टेट की अंतरराष्ट्रीय विचारधारा को मानता है और तालिबान को अवैध घोषित करता है। 2021 से तालिबान इस समूह के विरुद्ध आक्रामक अभियान चला रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि पाकिस्तान ISKP के प्रति कोई भी नरमी दिखाता है, तो इससे तालिबान की आतंकवाद-विरोधी कोशिशें कमज़ोर हो सकती हैं और एक सक्षम क्षेत्रीय आतंकी नेटवर्क का खतरा बढ़ सकता है।
वाखान कॉरिडोर: नई भू-राजनीतिक रणभूमि
रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे टकराव में वाखान कॉरिडोर एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है। जमीन की यह संकरी पट्टी अफगानिस्तान को चीन के शिनजियांग इलाके से सीधे जोड़ती है। मई 2026 तक, अफगान अधिकारियों ने बताया कि काबुल से चीन की ओर जाने वाली इस सड़क का लगभग 70 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है।
यह ऐसे समय में आया है जब रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि यह कॉरिडोर चालू हो जाता है, तो अफगानिस्तान पाकिस्तानी भूभाग पर निर्भर हुए बिना चीन के साथ व्यापार कर सकेगा। इससे जमीन से घिरे अफगानिस्तान पर पाकिस्तान का पुराना दबदबा कम होगा और अफगान व्यापार के लिए चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) का महत्व भी शायद घट जाएगा। रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि बदख्शान प्रांत और वाखान क्षेत्र में अस्थिरता से पाकिस्तान को लाभ हो सकता है, क्योंकि इससे बीजिंग को सीधी कनेक्टिविटी में देरी का बहाना मिल सकता है और चीन के प्रमुख पश्चिमी सहयोगी के रूप में पाकिस्तान की भूमिका बनी रह सकती है।
आगे क्या होगा
गौरतलब है कि यह स्थिति केवल पाकिस्तान-अफगानिस्तान द्विपक्षीय संकट नहीं है — यह पूरे दक्षिण एशिया और मध्य एशिया की सुरक्षा वास्तुकला को प्रभावित करती है। ISKP के सक्रिय रहने, TTP के हमलों और वाखान कॉरिडोर की प्रगति के बीच, क्षेत्रीय शक्तियों — विशेष रूप से भारत, चीन और अमेरिका — की प्रतिक्रिया आने वाले महीनों में इस समीकरण को नई दिशा दे सकती है।