पीओके में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की कथित बर्बरता: महीनों बाद भी इंसाफ को तरस रहे परिवार
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा की गई कथित हिंसक कार्रवाई के महीनों बाद भी पीड़ित परिवार न्याय के लिए भटक रहे हैं। यूके-पंजीकृत संगठन जम्मू कश्मीर ह्यूमन राइट्स ऑब्जर्वेटरी (जेकेएचआरओ) की 47 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट में मनमाने ढंग से हिरासत में लेने, न्यायेतर हत्याओं और मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप दर्ज किए गए हैं। ब्रिटिश अखबार 'द इंडिपेंडेंट' ने इस रिपोर्ट के हवाले से इन मामलों को सार्वजनिक किया है।
विरोध की पृष्ठभूमि
पीओके में यह आंदोलन मूलतः बिजली की बढ़ती कीमतों और जीवन-यापन की लागत के विरोध में शुरू हुआ था। धीरे-धीरे यह क्षेत्र के संवैधानिक और राजनीतिक ढाँचे को चुनौती देने वाले व्यापक आंदोलन में बदल गया। जमीनी कार्यकर्ताओं के संगठन 'जॉइंट अवामी एक्शन कमिटी' (जेएएसी) ने 27 जुलाई से 10 अगस्त के बीच चरणबद्ध चुनाव बहिष्कार का आह्वान किया था। संगठन का तर्क था कि मौजूदा शासन-व्यवस्था स्थानीय निवासियों के हितों का प्रतिनिधित्व करने में विफल रही है।
दमन और कार्रवाई
रिपोर्टों के अनुसार, जेएएसी के इस कदम के बाद पाकिस्तान सरकार ने संगठन पर कड़े आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत प्रतिबंध लगा दिया। कई नेताओं को गिरफ्तार किया गया और आंदोलन को कुचलने के लिए एक व्यापक सुरक्षा अभियान शुरू किया गया। इसी अभियान के दौरान कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की घटनाएँ सामने आईं। जेएएसी ने सार्वजनिक रूप से 5 जून के बाद से 100 से अधिक मौतों का दावा किया है, जबकि स्थानीय निवासियों के अनुसार वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।
फहद बरकत का मामला
26 वर्षीय फहद बरकत रावलकोट के एक सैन्य अस्पताल में रक्तदान करने गए थे, लेकिन 7 जून की रात 11:31 बजे अपनी बहन को अंतिम संदेश भेजने के बाद वे कभी घर नहीं लौटे। उनकी बहन के अनुसार, रात लगभग 1 बजे अस्पताल के गेट में प्रवेश करते समय उन्हें गर्दन में गोली मारी गई थी। परिवार दो महीने से अधिक समय तक यह मानता रहा कि उन्हें पुलिस ने हिरासत में रखा है और वे रिहा हो जाएँगे।
पाकिस्तानी अखबार 'डॉन' ने जून में प्रकाशित एक रिपोर्ट में रावलकोट झड़प का जिक्र करते हुए मारे गए नागरिकों की सूची में बरकत का नाम शामिल किया था। जेकेएचआरओ ने आरोप लगाया है कि अधिकारियों ने बरकत का शव तब तक नहीं सौंपा जब तक परिवार उन्हें 'मुठभेड़ में मारा गया आतंकवादी' घोषित करने वाले बयान पर हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं हुआ।
अन्य पीड़ित परिवारों की व्यथा
शौकत नवाज मीर का परिवार 30 जून को धीरकोट से उनकी कथित गिरफ्तारी के तीन महीने से अधिक समय बाद भी उनके ठिकाने की जानकारी का इंतजार कर रहा है। एक अन्य मामले में जाबिर मुमताज को कथित तौर पर 5 सितंबर को सुरक्षाकर्मियों ने मार डाला, जबकि वे दो हफ्ते से हिरासत में थे। उनके परिवार ने भी दावा किया कि शव सौंपने के बदले उन्हें आतंकवादी घोषित करने वाले बयान पर हस्ताक्षर की शर्त रखी गई। परिवार के इनकार के बाद कथित तौर पर अधिकारियों ने स्वयं दफनाने की प्रक्रिया पूरी की।
जवाबदेही की माँग
जेकेएचआरओ ने अधिकारियों से लिखित जवाब, हताहतों और हिरासत के रिकॉर्ड तथा 'ऑपरेशनल ऑर्डर' उपलब्ध कराने की माँग की है। संगठन ने सीसीटीवी फुटेज, अस्पताल के रक्तदाता रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम दस्तावेज और दफन के रिकॉर्ड जारी करने की भी अपील की है। संगठन ने यह भी कहा है कि उसने अधिकारियों को रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों पर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है। ये मामले पीओके में नागरिकों के साथ हुए कथित बर्ताव को लेकर पारदर्शी जाँच और जवाबदेही की माँग को और तीव्र कर रहे हैं।