पीओके में आर्थिक शोषण और राजनीतिक दमन से भड़का जनआंदोलन, 50 से अधिक मौतें: अमेरिकी पत्रिका की रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी पत्रिका जैकोबिन में प्रकाशित एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में 5 जून 2026 से जारी व्यापक जनआंदोलन और उसमें हुई हिंसा पाकिस्तान की प्रशासनिक विफलता का अचानक परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी गहरी संरचनात्मक व्यवस्था की अभिव्यक्ति है जो पीओके के लोगों को अपने राजनीतिक और आर्थिक भविष्य पर किसी भी सार्थक नियंत्रण से वंचित रखती है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस आंदोलन में कथित तौर पर 50 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों घायल हैं।
मुख्य घटनाक्रम
रिपोर्ट के अनुसार, पीओके में विरोध प्रदर्शन 5 जून से शुरू हुए और लगातार तेज होते गए। प्रदर्शनकारियों की तत्काल माँगें बिजली की बढ़ती दरें, ईंधन की महंगाई और गिरते जीवन स्तर से जुड़ी थीं। आंदोलन को दबाने के लिए पूरे क्षेत्र में इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी गईं और मोबाइल संचार भी निलंबित कर दिया गया।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने आंदोलन को कुचलने के लिए कड़ी कार्रवाई की। उनका यह भी दावा है कि वास्तविक मृतकों की संख्या सरकारी आँकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है — हालाँकि इसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
दिखावटी स्वायत्तता, असल नियंत्रण इस्लामाबाद का
रिपोर्ट में कहा गया है कि पीओके को आधिकारिक तौर पर राजनीतिक रूप से स्वायत्त क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और इसे औपचारिक रूप से पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बताया जाता। लेकिन व्यवहार में वहाँ की स्वायत्तता केवल दिखावटी है — सभी महत्वपूर्ण निर्णयों का अंतिम अधिकार इस्लामाबाद के पास है।
रिपोर्ट के अनुसार, वहाँ की चुनावी प्रक्रिया भी निष्पक्ष नहीं है। खासकर आरक्षित सीटों के जरिए चुनावों में हेरफेर कर इस्लामाबाद अपनी पसंद की सरकार बनवाता है। यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरी मुसलमानों के अधिकारों की वकालत करने का दावा करता रहा है।
आर्थिक शोषण और राजनीतिक अधीनता का चक्र
रिपोर्ट का तर्क है कि पीओके के लोगों को उन नीतियों का बोझ उठाना पड़ता है जिनके निर्माण में उनकी कोई वास्तविक लोकतांत्रिक भागीदारी नहीं होती। रिपोर्ट के शब्दों में, आर्थिक शोषण और राजनीतिक अधीनता एक-दूसरे को मजबूत करते हैं — और यही इस संकट की जड़ है।
गौरतलब है कि जॉइंट आवामी एक्शन कमेटी की प्रमुख माँगें पाकिस्तान की संघीय सरकार और सेना के प्रभाव में काम कर रहे स्थानीय प्रशासन ने पूरी नहीं कीं, जिससे जनता का असंतोष और गहरा हो गया।
पाकिस्तान के दावों पर सवाल
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा नागरिकों पर की गई कार्रवाई ने इस्लामाबाद के उस दीर्घकालिक दावे पर भी सवाल खड़े किए हैं, जिसमें वह खुद को कश्मीरी मुसलमानों का सबसे बड़ा हितैषी बताता रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान का शासक वर्ग केवल किसी एक सरकार या प्रशासनिक संस्था की रक्षा नहीं कर रहा, बल्कि ऐसी पूरी व्यवस्था को बचाने में लगा है जिसकी स्थिरता इसी बात पर टिकी है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को अपने भविष्य पर प्रभावी नियंत्रण न मिले।
क्या होगा आगे
रिपोर्ट में इस आंदोलन को पीओके के पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा जनआंदोलन बताया गया है। विश्लेषकों के अनुसार, जब तक पीओके के लोगों को वास्तविक राजनीतिक और आर्थिक स्वायत्तता नहीं मिलती, तब तक असंतोष की यह आग बुझने की संभावना नहीं है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नज़र अब इस्लामाबाद की अगली कार्रवाई पर है।