पीओके में जनाक्रोश चरम पर: इस्लामाबाद के हस्तक्षेप और महंगाई के खिलाफ बड़ा जनआंदोलन
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में इस्लामाबाद के बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप, लगातार बढ़ती महंगाई और शासन-विफलता के खिलाफ जनाक्रोश अब खुले विद्रोह का रूप लेता दिख रहा है। ऑनलाइन पत्रिका 'द डिप्लोमैट' की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस महीने प्रदर्शनकारियों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच हुई हिंसक झड़पों ने क्षेत्र में वर्षों से दबी नाराजगी को सतह पर ला दिया है। इस कार्रवाई में कई लोगों की मौत की खबर है, जिसने इस्लामाबाद के सामने गंभीर राजनीतिक और कूटनीतिक संकट खड़ा कर दिया है।
जनाक्रोश की जड़ें: महंगाई और राजनीतिक वंचना
रिपोर्ट के अनुसार, पीओके में असंतोष का मूल कारण केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी है। पिछले दो वर्षों में जीवन-यापन की बढ़ती लागत, विशेष रूप से बिजली, ईंधन और गेहूं की ऊंची कीमतें, आम जनता के लिए असहनीय बन गई हैं। क्षेत्र में विशाल जलविद्युत संसाधन होने के बावजूद स्थानीय लोगों का मानना है कि इन संसाधनों का लाभ उन्हें नहीं, बल्कि संघीय सरकार को मिलता है। यह भावना लोगों में यह धारणा पुख्ता करती है कि पाकिस्तान के अधीन रहने से उन्हें अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिली।
जेएएसी पर प्रतिबंध और चुनावी घोषणा: संयोग या रणनीति?
5 जून को पाकिस्तानी अधिकारियों ने 27 जुलाई को विधानसभा चुनाव कराने की घोषणा की। ठीक उसी समय, वकीलों, व्यापारियों, परिवहन कर्मियों और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं के संगठन जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) पर आतंकवाद में संलिप्तता का आरोप लगाते हुए प्रतिबंध लगा दिया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह दोनों घटनाएँ एक साथ होना महज संयोग नहीं माना जा सकता। आशंका जताई गई है कि इस्लामाबाद और पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान के निर्देश पर स्थानीय प्रशासन ने क्षेत्र के सबसे प्रभावशाली जनआंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की, ताकि चुनाव-विरोधी संभावित उभार को पहले ही दबाया जा सके।
जेएएसी ने इस प्रतिबंध, चुनावी घोषणा और आरक्षित सीटों को बरकरार रखने संबंधी न्यायिक फैसले के विरोध में 9 जून को 'व्हील-जाम हड़ताल' का आह्वान किया था, जिसे व्यापक जन-समर्थन मिला।
इस्लामाबाद के शासन मॉडल की परीक्षा
रिपोर्ट के अनुसार, पीओके का मौजूदा संकट इस्लामाबाद के शासन मॉडल की सीमाओं और क्षेत्र में उसके कमजोर होते सामाजिक अनुबंध को उजागर करता है। चुनावी हस्तक्षेप के आरोप, राजनीतिक अधिकारों की कमी और आर्थिक शोषण की भावना मिलकर एक ऐसे असंतोष को जन्म दे रही है, जिसे न कूटनीतिक प्रयासों से और न शांति-समर्थक छवि से ढका जा सकता है। जुलाई के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले यह अशांति पाकिस्तान सरकार के लिए एक बड़ी घरेलू चुनौती बन गई है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की कार्रवाई के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। विशेष रूप से कश्मीरी प्रवासी समुदाय के हजारों लोगों ने लंदन की सड़कों पर मार्च निकालकर इस कार्रवाई की निंदा की। आलोचकों का कहना है कि यह घटनाक्रम पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय साख को नुकसान पहुंचाता है और कश्मीर मुद्दे पर उसकी नैतिक स्थिति को कमजोर करता है।
आगे की राह
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि 27 जुलाई के चुनाव तक और उसके बाद भी पीओके में तनाव बने रहने की आशंका है। जब तक महंगाई, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संसाधनों पर स्थानीय हिस्सेदारी जैसे बुनियादी मुद्दों का समाधान नहीं होता, यह जनाक्रोश और गहरा होता जाएगा। क्षेत्र में स्थायी स्थिरता के लिए इस्लामाबाद को शासन के अपने मौजूदा मॉडल पर पुनर्विचार करना होगा।