पीओके में अशांति: पाकिस्तान का अवसरवादी चरित्र बेनकाब, जून से अब तक 90 की मौत
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में महीनों से जारी जन-आंदोलन ने इस्लामाबाद के शासन तंत्र की असलियत सामने ला दी है — एक ऐसा तंत्र जो राजनीतिक सुविधा के अनुसार अपनी भाषा और नीति बदलता रहता है। 'खालसा वॉक्स' की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक शोषण, राजनीतिक दमन और सत्ता-केंद्रित शासन ने पीओके की आम जनता को उसके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा है।
मुख्य घटनाक्रम
रिपोर्ट के अनुसार, पीओके में आम नागरिक बढ़ती महंगाई, बिजली की ऊँची दरों, खराब शासन व्यवस्था और एक ऐसी विधायी संरचना के खिलाफ सड़कों पर उतरे हैं, जिसमें वास्तविक सत्ता इस्लामाबाद के हाथों में केंद्रित है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तानी राजनीतिक दल लंबे समय से 12 आरक्षित 'शरणार्थी' सीटों का उपयोग अपनी पसंद की सरकार स्थापित करने के लिए करते रहे हैं।
जब प्रतिबंधित ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) ने इस व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन छेड़ा, तो रिपोर्ट के अनुसार उसे आतंकवाद रोधी कानूनों के तहत प्रतिबंधित कर दिया गया, इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं और बल प्रयोग किया गया। कथित तौर पर जून 2026 से अब तक कम से कम 90 नागरिकों की मौत हो चुकी है।
पाकिस्तान का बदलता रुख
रिपोर्ट में एक तीखा विरोधाभास उजागर किया गया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने प्रदर्शनकारियों को 'भारत जैसे दुश्मन' करार दिया था। लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सलाहकार राणा सनाउल्लाह ने जेएएसी से जुड़े 99 प्रतिशत लोगों को 'हमारे देशभक्त भाई' बताया।
रिपोर्ट में कहा गया, "आतंकवादी और गद्दार से अचानक देशभक्त भाई में हुआ यह बदलाव पाकिस्तान के खोखले और अवसरवादी चरित्र को उजागर करता है।" यह बदलाव राजनीतिक परिपक्वता का नहीं, बल्कि सत्ता-समीकरण की मजबूरी का प्रतीक बताया गया है।
मानवाधिकार की स्थिति
रिपोर्ट में कथित तौर पर अस्पतालों पर कब्जे, चिकित्सा सहायता में बाधा और पत्रकारों को क्षेत्र से दूर रखने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है, क्योंकि रिपोर्टों के अनुसार मीडिया की पहुँच प्रतिबंधित है।
गौरतलब है कि पीओके में विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों के लिए पाकिस्तान के प्रति निष्ठा की पुष्टि करना अनिवार्य बताया गया है — एक ऐसी शर्त जो स्वायत्त लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करती है।
व्यापक संदर्भ
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान का प्रतिष्ठान पीओके के निवासियों को तब महत्व देता है, जब वे भारत के विरुद्ध उसके कश्मीर-केंद्रित नैरेटिव को मजबूत करते हैं। लेकिन जब वही लोग बुनियादी अधिकारों की माँग करते हैं, तो उन्हें 'दुश्मन' घोषित किया जाता है। यह ऐसे समय में सामने आया है जब पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर के मुद्दे पर नैतिक भूमिका का दावा करता रहता है।
रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि जो सरकार अपने कब्जे वाले क्षेत्र की जनता के साथ निरंतरता और बुनियादी सम्मान से व्यवहार नहीं कर सकती, उसके पास दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने का कोई आधार नहीं है।
आगे क्या
पीओके में जन-असंतोष थमने के कोई संकेत नहीं हैं। रिपोर्टों के अनुसार, जेएएसी को अचानक 'देशभक्त' बताने की कवायद टिकाऊ राजनीतिक समाधान की बजाय तात्कालिक दबाव से उपजी प्रतीत होती है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की नज़र इस क्षेत्र पर बनी हुई है।