पीओके में छठे हफ्ते भी हिंसा जारी, मृतकों की संख्या 12 हुई; अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग तेज
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में 15 जुलाई को रावलाकोट में स्थानीय प्रदर्शनकारियों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच भीषण झड़पें हुईं, जिनमें मृतकों की कुल संख्या बढ़कर 12 हो गई है। यह आंदोलन अब लगातार छठे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है और इस्लामाबाद के खिलाफ जन-आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा।
मुख्य घटनाक्रम
रिपोर्टों के अनुसार, रावलाकोट में बढ़ते सरकार-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने भीड़ पर गोलीबारी की, जिसमें कई आम नागरिकों की जान गई। पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन के अनुसार, मंगलवार की अलग-अलग झड़पों में कम से कम दो सुरक्षाकर्मी भी मारे गए। इलाके में 4,000 से अधिक रेंजर्स तैनात किए गए हैं और मीडिया की पहुँच पर भी पाबंदी लगाई गई है।
गौरतलब है कि यह वही क्षेत्र है जहाँ दशकों से बिजली, आटे और ईंधन की कीमतों को लेकर असंतोष सुलगता रहा है — और अब यह आंदोलन राजनीतिक स्वायत्तता की माँग में तब्दील हो चुका है।
नेताओं के बयान और आरोप
जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) के नेता सरदार अम्मान खान ने रावलाकोट की विशाल रैली में पाकिस्तान पर पीओके पर 'जबरन कब्जा' करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, "यह जबरन कब्जा किया गया इलाका है।" उन्होंने स्पष्ट किया कि इस क्षेत्र को 'विवादित' नहीं, बल्कि 'कब्जे वाला क्षेत्र' कहा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी ऐलान किया कि यह आंदोलन जीत मिलने तक — चाहे जान भी देनी पड़े — नहीं रुकेगा।
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने पिछले महीने से जारी हालात को 'बेहद चिंताजनक' बताया और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर तथा प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की भूमिका पर सवाल उठाए।
यूकेपीएनपी की कड़ी निंदा और माँगें
यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स नेशनल पार्टी (यूकेपीएनपी) ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा आम नागरिकों की कथित हत्याओं की कड़ी निंदा की। पार्टी ने पाकिस्तान सरकार से माँग की कि शांतिपूर्ण नागरिकों के खिलाफ अत्यधिक बल का इस्तेमाल तत्काल बंद किया जाए, गैरकानूनी हत्याएँ, मनमानी गिरफ्तारियाँ और जबरन गुमशुदगियाँ रोकी जाएँ।
यूकेपीएनपी ने यह भी माँग की कि लोगों तक खाद्य सामग्री, दवाइयाँ और मानवीय सहायता बिना रुकावट पहुँचने दी जाए, संचार पाबंदियाँ हटाई जाएँ और आवाजाही की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाए।
अंतरराष्ट्रीय दबाव और मीडिया पर रोक
यह ऐसे समय में आया है जब पीओके में मीडिया की पहुँच पूरी तरह प्रतिबंधित है, जिससे स्वतंत्र सत्यापन संभव नहीं हो पा रहा। प्रदर्शनकारी और विपक्षी नेता अंतरराष्ट्रीय जाँच की माँग कर रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि मीडिया ब्लैकआउट और बड़े पैमाने पर सुरक्षा बल तैनाती मिलकर एक ऐसी स्थिति बना रहे हैं जहाँ जवाबदेही लगभग असंभव हो जाती है।
आगे क्या होगा
जेएएसी नेताओं ने स्पष्ट किया है कि जब तक उनकी माँगें पूरी नहीं होतीं, आंदोलन जारी रहेगा। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की नज़र इस क्षेत्र पर टिकी है, और कथित तौर पर कई देशों ने पाकिस्तान से संयम बरतने की अपील की है। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए आने वाले दिनों में कूटनीतिक दबाव और बढ़ने की संभावना है।