15 अक्टूबर 2026
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सैम पित्रोदा का सीजेपी पर भरोसा: 'युवाओं ने साहस दिखाया, समाज को जागरूक किया'

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सैम पित्रोदा का सीजेपी पर भरोसा: 'युवाओं ने साहस दिखाया, समाज को जागरूक किया'

सारांश

85 वर्षीय सैम पित्रोदा ने वॉशिंगटन से दिए साक्षात्कार में सीजेपी के युवा साहस को सराहा और कहा कि यह 'भारतीय मानसून' है। साथ ही लोकतंत्र पर हमले, आर्थिक असमानता, शिक्षा संकट और भारत की कमजोर विदेश नीति पर बेबाक टिप्पणी की।

मुख्य बातें

सैम पित्रोदा ने 15 अक्टूबर 2026 को वॉशिंगटन से दिए साक्षात्कार में सीजेपी के युवा आंदोलन को 'साहस और जागरूकता' का प्रतीक बताया।
उन्होंने कहा कि हर साल लगभग एक लाख भारतीय छात्र विदेश पढ़ने जाते हैं और देश से सालाना करीब 50 अरब डॉलर शिक्षा पर खर्च होते हैं।
पित्रोदा ने रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत की मध्यस्थता की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले पाँच वर्षों में भारत की भूमिका कहीं नजर नहीं आई।
सीजेपी को राहुल गांधी के नेतृत्व में लाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह फैसला युवाओं और कांग्रेस दोनों का है; उन्हें स्वतंत्र दबाव समूह बनाना चाहिए।
आम आदमी पार्टी (AAP) के कांग्रेस पर हमलों को उन्होंने लोकतांत्रिक अधिकार बताया और संवाद की वकालत की।

इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने 15 अक्टूबर 2026 को वॉशिंगटन से दिए एक विशेष साक्षात्कार में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और उसके छात्र आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि इस युवा समूह ने निडर होकर आवाज उठाने और जिम्मेदारी लेने का साहस दिखाया है। उन्होंने माना कि भाषा के मामले में कुछ कमियाँ रही होंगी, लेकिन इस आंदोलन ने अनेक वर्गों के लिए अपनी बात कहने के द्वार खोले। 85 वर्षीय पित्रोदा ने लोकतंत्र, चुनावी विश्वसनीयता, आर्थिक असमानता, शिक्षा, रोजगार, विपक्षी एकता और भारत की विदेश नीति जैसे अनेक मुद्दों पर अपना विस्तृत मत रखा।

सीजेपी और छात्र आंदोलन की पृष्ठभूमि

पित्रोदा ने कहा कि सीजेपी और छात्र आंदोलन को देश में चल रही व्यापक राजनीतिक एवं सामाजिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, जब किसी छात्र समूह को 'कॉकरोच' कहा गया, तो वे एकजुट हुए — और उस समय परीक्षाओं में गड़बड़ी, पेपर लीक, बढ़ती फीस, बेरोजगारी और शिक्षा की बदहाली जैसी समस्याएँ पहले से मौजूद थीं। उन्होंने कहा कि अपने एक लेख में उन्होंने इसे 'भारतीय मानसून' की संज्ञा दी थी, जो किसी हद तक 'अरब स्प्रिंग' जैसा है।

पित्रोदा ने कहा कि उन युवाओं ने कुछ गलत कदम भी उठाए होंगे और कभी-कभी भाषा भी उचित नहीं रही, लेकिन उनके गुस्से को समझा जा सकता है। 'जो लोग पहले बोलने से डरते थे, उन्हें भी हिम्मत मिली' — यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

लोकतंत्र और चुनावी व्यवस्था पर चिंता

पित्रोदा ने कहा कि उनकी दृष्टि में देश में एक साथ पाँच बड़ी प्रक्रियाएँ चल रही हैं। पहली, संस्थाओं पर कब्जे की कोशिश, मीडिया नियंत्रण और सत्तावादी सोच के कारण लोकतंत्र पर हमले की आशंका। उन्होंने कहा कि जब हर फैसला एक केंद्र के इर्द-गिर्द सिमट जाता है, तो लोग बोलने से डरते हैं और उन्हें प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई का भय सताता है।

दूसरी, चुनावी व्यवस्था को लेकर अविश्वास। उन्होंने कहा कि ईवीएम, मतदाता सूची और मतगणना प्रक्रिया को लेकर लोगों में भ्रम और संदेह बढ़ा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये आरोप सही भी हो सकते हैं और गलत भी, लेकिन इनसे भरोसा कमजोर हुआ है।

आर्थिक असमानता और सरकारी प्रदर्शन

पित्रोदा के अनुसार, अल्पसंख्यकों, ओबीसी, दलितों और आदिवासियों को लगता है कि आर्थिक वृद्धि का लाभ उन तक नहीं पहुँच रहा। उन्होंने कहा कि मजदूरी नहीं बढ़ी, महंगाई बढ़ी है और क्रय शक्ति घटी है। उनका कहना था कि '20 लोगों की संपत्ति सौ गुना बढ़ जाती है और आँकड़े अच्छे दिखने लगते हैं, लेकिन मजदूरों की स्थिति नहीं बदलती।'

उन्होंने शिक्षा व्यवस्था की दशा पर भी चिंता जाहिर की। उनके अनुसार, हर साल लगभग एक लाख भारतीय छात्र विदेश पढ़ने जाते हैं और औसतन 50,000 डॉलर सालाना खर्च करते हैं, जिससे देश से सालाना करीब 50 अरब डॉलर बाहर जाते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि भारत अपने देश में उच्च गुणवत्ता की उदार कला शिक्षा क्यों नहीं दे पा रहा।

विपक्षी एकता, सीजेआई और राहुल गांधी

आम आदमी पार्टी (AAP) द्वारा कांग्रेस पर हमलों के बारे में पूछे जाने पर पित्रोदा ने कहा कि मतभेद रखना किसी का अधिकार है और आमने-सामने बातचीत से उन्हें सुलझाया जा सकता है। उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा विपक्षी नेताओं से मिलने से इनकार करने के फैसले को उचित बताया और कहा कि यह उनका अधिकार है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में सीजेपी के आने के सवाल पर पित्रोदा ने कहा कि यह फैसला युवाओं और कांग्रेस दोनों को स्वयं करना है। उन्होंने सुझाव दिया कि सीजेपी किसी एक पार्टी के बजाय एक स्वतंत्र दबाव समूह के रूप में काम करे, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के लिए किसी भी सत्ताधारी दल से जवाबदेही माँगे।

भारत की विदेश नीति और रूस-यूक्रेन युद्ध

भारत की वैश्विक भूमिका पर पित्रोदा ने कहा कि उनके विचार में आज भारत के पास उतनी वैश्विक ताकत नहीं है जितनी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि 'विश्व गुरु' का दावा उनकी दृष्टि में निराधार है। रूस-यूक्रेन युद्ध में मध्यस्थता की भूमिका पर उन्होंने सवाल उठाया कि पिछले पाँच वर्षों में भारत की भूमिका कहाँ थी और अचानक इस चर्चा का क्या औचित्य है। गाजा संकट में भी उन्होंने भारत की निष्क्रियता पर चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार भारत को 'निर्णय-निर्माता मेज' पर होना चाहिए, न कि किनारे पर।

यह साक्षात्कार ऐसे समय में आया है जब देश में छात्र आंदोलन, विपक्षी एकजुटता और 2029 के चुनावी समीकरणों को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज है। पित्रोदा के ये विचार आगामी राजनीतिक बहस को और धार दे सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसमें वह सीजेपी जैसे स्वतंत्र आंदोलनों को अपने पक्ष में भुनाना चाहती है, लेकिन उनसे औपचारिक संबंध नहीं जोड़ना चाहती। 'स्वतंत्र दबाव समूह' की उनकी सलाह राजनीतिक रूप से सुरक्षित तो है, लेकिन यह उस सवाल का जवाब नहीं देती कि विपक्ष खुद कितनी जवाबदेही के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य के एजेंडे को अपने शासनकाल में लागू करता रहा है। रूस-यूक्रेन पर उनकी टिप्पणी साहसिक है, परंतु यह भी सत्य है कि भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' की नीति पारंपरिक रूप से सभी दलों ने अपनाई है — इसे केवल वर्तमान सरकार की विफलता के रूप में प्रस्तुत करना एकांगी विश्लेषण है।
RashtraPress
15 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सैम पित्रोदा ने सीजेपी के बारे में क्या कहा?
सैम पित्रोदा ने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के युवाओं ने निडर होकर आवाज उठाने और जिम्मेदारी लेने का साहस दिखाया है। उनके अनुसार, भले ही कभी-कभी भाषा उचित नहीं रही, लेकिन इस आंदोलन ने समाज के अन्य वर्गों को भी बोलने की हिम्मत दी।
क्या सीजेपी को राहुल गांधी के नेतृत्व में आना चाहिए?
पित्रोदा के अनुसार यह फैसला सीजेपी के युवाओं और कांग्रेस दोनों को मिलकर करना है। उन्होंने सुझाव दिया कि सीजेपी एक स्वतंत्र नैतिक दबाव समूह के रूप में काम करे, जो किसी भी सत्ताधारी दल से शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं पर जवाबदेही माँगे।
पित्रोदा ने भारत की विदेश नीति पर क्या कहा?
पित्रोदा ने कहा कि उनकी दृष्टि में आज भारत के पास उतनी वैश्विक ताकत नहीं है जितनी होनी चाहिए। रूस-यूक्रेन युद्ध में मध्यस्थता के सवाल पर उन्होंने पूछा कि पिछले पाँच वर्षों में भारत की भूमिका कहाँ थी, और 'विश्व गुरु' के दावे को उन्होंने अपनी राय में निराधार बताया।
पित्रोदा ने भारत की शिक्षा व्यवस्था पर क्या चिंता जताई?
उन्होंने कहा कि हर साल लगभग एक लाख भारतीय छात्र विदेश पढ़ने जाते हैं और औसतन 50,000 डॉलर सालाना खर्च करते हैं, जिससे सालाना करीब 50 अरब डॉलर देश से बाहर जाते हैं। उनका सवाल था कि तकनीक और संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद भारत अपने देश में उच्च गुणवत्ता की शिक्षा क्यों नहीं दे पा रहा।
AAP के कांग्रेस पर हमलों को पित्रोदा ने कैसे देखा?
पित्रोदा ने कहा कि अलग विचार रखना और उन्हें व्यक्त करना हर दल का लोकतांत्रिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि आमने-सामने बातचीत से मतभेद सुलझाए जा सकते हैं और किसी के विचार की आलोचना करना बिल्कुल ठीक है — यह व्यक्ति पर हमला नहीं है।
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