सैम पित्रोदा का सीजेपी पर भरोसा: 'युवाओं ने साहस दिखाया, समाज को जागरूक किया'
सारांश
मुख्य बातें
इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने 15 अक्टूबर 2026 को वॉशिंगटन से दिए एक विशेष साक्षात्कार में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और उसके छात्र आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि इस युवा समूह ने निडर होकर आवाज उठाने और जिम्मेदारी लेने का साहस दिखाया है। उन्होंने माना कि भाषा के मामले में कुछ कमियाँ रही होंगी, लेकिन इस आंदोलन ने अनेक वर्गों के लिए अपनी बात कहने के द्वार खोले। 85 वर्षीय पित्रोदा ने लोकतंत्र, चुनावी विश्वसनीयता, आर्थिक असमानता, शिक्षा, रोजगार, विपक्षी एकता और भारत की विदेश नीति जैसे अनेक मुद्दों पर अपना विस्तृत मत रखा।
सीजेपी और छात्र आंदोलन की पृष्ठभूमि
पित्रोदा ने कहा कि सीजेपी और छात्र आंदोलन को देश में चल रही व्यापक राजनीतिक एवं सामाजिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, जब किसी छात्र समूह को 'कॉकरोच' कहा गया, तो वे एकजुट हुए — और उस समय परीक्षाओं में गड़बड़ी, पेपर लीक, बढ़ती फीस, बेरोजगारी और शिक्षा की बदहाली जैसी समस्याएँ पहले से मौजूद थीं। उन्होंने कहा कि अपने एक लेख में उन्होंने इसे 'भारतीय मानसून' की संज्ञा दी थी, जो किसी हद तक 'अरब स्प्रिंग' जैसा है।
पित्रोदा ने कहा कि उन युवाओं ने कुछ गलत कदम भी उठाए होंगे और कभी-कभी भाषा भी उचित नहीं रही, लेकिन उनके गुस्से को समझा जा सकता है। 'जो लोग पहले बोलने से डरते थे, उन्हें भी हिम्मत मिली' — यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
लोकतंत्र और चुनावी व्यवस्था पर चिंता
पित्रोदा ने कहा कि उनकी दृष्टि में देश में एक साथ पाँच बड़ी प्रक्रियाएँ चल रही हैं। पहली, संस्थाओं पर कब्जे की कोशिश, मीडिया नियंत्रण और सत्तावादी सोच के कारण लोकतंत्र पर हमले की आशंका। उन्होंने कहा कि जब हर फैसला एक केंद्र के इर्द-गिर्द सिमट जाता है, तो लोग बोलने से डरते हैं और उन्हें प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई का भय सताता है।
दूसरी, चुनावी व्यवस्था को लेकर अविश्वास। उन्होंने कहा कि ईवीएम, मतदाता सूची और मतगणना प्रक्रिया को लेकर लोगों में भ्रम और संदेह बढ़ा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये आरोप सही भी हो सकते हैं और गलत भी, लेकिन इनसे भरोसा कमजोर हुआ है।
आर्थिक असमानता और सरकारी प्रदर्शन
पित्रोदा के अनुसार, अल्पसंख्यकों, ओबीसी, दलितों और आदिवासियों को लगता है कि आर्थिक वृद्धि का लाभ उन तक नहीं पहुँच रहा। उन्होंने कहा कि मजदूरी नहीं बढ़ी, महंगाई बढ़ी है और क्रय शक्ति घटी है। उनका कहना था कि '20 लोगों की संपत्ति सौ गुना बढ़ जाती है और आँकड़े अच्छे दिखने लगते हैं, लेकिन मजदूरों की स्थिति नहीं बदलती।'
उन्होंने शिक्षा व्यवस्था की दशा पर भी चिंता जाहिर की। उनके अनुसार, हर साल लगभग एक लाख भारतीय छात्र विदेश पढ़ने जाते हैं और औसतन 50,000 डॉलर सालाना खर्च करते हैं, जिससे देश से सालाना करीब 50 अरब डॉलर बाहर जाते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि भारत अपने देश में उच्च गुणवत्ता की उदार कला शिक्षा क्यों नहीं दे पा रहा।
विपक्षी एकता, सीजेआई और राहुल गांधी
आम आदमी पार्टी (AAP) द्वारा कांग्रेस पर हमलों के बारे में पूछे जाने पर पित्रोदा ने कहा कि मतभेद रखना किसी का अधिकार है और आमने-सामने बातचीत से उन्हें सुलझाया जा सकता है। उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा विपक्षी नेताओं से मिलने से इनकार करने के फैसले को उचित बताया और कहा कि यह उनका अधिकार है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में सीजेपी के आने के सवाल पर पित्रोदा ने कहा कि यह फैसला युवाओं और कांग्रेस दोनों को स्वयं करना है। उन्होंने सुझाव दिया कि सीजेपी किसी एक पार्टी के बजाय एक स्वतंत्र दबाव समूह के रूप में काम करे, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के लिए किसी भी सत्ताधारी दल से जवाबदेही माँगे।
भारत की विदेश नीति और रूस-यूक्रेन युद्ध
भारत की वैश्विक भूमिका पर पित्रोदा ने कहा कि उनके विचार में आज भारत के पास उतनी वैश्विक ताकत नहीं है जितनी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि 'विश्व गुरु' का दावा उनकी दृष्टि में निराधार है। रूस-यूक्रेन युद्ध में मध्यस्थता की भूमिका पर उन्होंने सवाल उठाया कि पिछले पाँच वर्षों में भारत की भूमिका कहाँ थी और अचानक इस चर्चा का क्या औचित्य है। गाजा संकट में भी उन्होंने भारत की निष्क्रियता पर चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार भारत को 'निर्णय-निर्माता मेज' पर होना चाहिए, न कि किनारे पर।
यह साक्षात्कार ऐसे समय में आया है जब देश में छात्र आंदोलन, विपक्षी एकजुटता और 2029 के चुनावी समीकरणों को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज है। पित्रोदा के ये विचार आगामी राजनीतिक बहस को और धार दे सकते हैं।