एआई के खतरों पर सिंगापुर के विदेश मंत्री की चेतावनी, संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय समझौते की अपील
सारांश
मुख्य बातें
सिंगापुर के विदेश मंत्री विवियन बालाकृष्णन ने 27 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते जोखिमों से निपटने के लिए एक बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौते पर बातचीत शुरू करने की अपील की। उन्होंने स्पष्ट किया कि जहाँ सरकारें एआई से आर्थिक लाभ उठाना चाहती हैं, वहीं स्वचालित प्रणालियों से उत्पन्न खतरे भी उतने ही गंभीर हैं।
तीन बड़े खतरे जो बालाकृष्णन ने गिनाए
एशिया सोसायटी में एक चर्चा के दौरान बालाकृष्णन ने एआई से जुड़े जोखिमों को तीन श्रेणियों में रखा। पहला — एआई एजेंट्स पर मानवीय नियंत्रण का खोना; दूसरा — दुर्भावनापूर्ण तत्वों द्वारा इस तकनीक का हथियार के रूप में उपयोग; और तीसरा — डीपफेक व भ्रामक सामग्री के जरिये जनता के भरोसे और लोकतांत्रिक बहस को नुकसान पहुँचना।
उन्होंने चेतावनी दी कि एआई से गलत मंशा रखने वाले लोगों के लिए जैविक या रासायनिक हथियार बनाना आसान हो सकता है। उन्होंने कहा, 'मैं निराशावादी नहीं हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि जोखिम बहुत ज़्यादा हैं।'
किल स्विच और नियंत्रण का सवाल
बालाकृष्णन ने सीधे सवाल उठाया कि क्या एआई के निर्माता भी इस तकनीक पर पूर्ण नियंत्रण का दावा कर सकते हैं। उनके अनुसार, 'कोई भी — चाहे वह एआई का निर्माता ही क्यों न हो — अगर यह कहे कि उसके पास किल स्विच पर पूरा नियंत्रण है, तो वह आपको धोखा दे रहा है। नियंत्रण खोना एक बहुत वास्तविक खतरा है।'
यह ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में एआई गवर्नेंस को लेकर बहस तेज हो रही है और कई देश अपने-अपने नियामक ढाँचे बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र समझौते की ज़रूरत क्यों
विदेश मंत्री ने एआई के विकास की तुलना तेज गति से चलने वाली कार से की। उन्होंने कहा कि जिस तरह ताकतवर इंजन के लिए ब्रेक, सीट बेल्ट और यातायात नियमों की ज़रूरत होती है, उसी तरह एआई को भी सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र को उन्होंने सबसे उपयुक्त मंच बताया क्योंकि यहाँ अलग-अलग तकनीकी क्षमता और आकार वाले देश एक साथ भाग ले सकते हैं।
बालाकृष्णन ने समुद्र के कानून (UNCLOS) और जलवायु परिवर्तन पर हुए अंतरराष्ट्रीय समझौतों का हवाला देते हुए कहा कि ये समझौते कठिन थे, लेकिन अनिवार्य साबित हुए। उन्होंने तर्क दिया कि एआई पर भी ऐसी ही बहुपक्षीय प्रक्रिया अपरिहार्य है।
अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और दक्षिण-पूर्व एशिया का नज़रिया
बालाकृष्णन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एआई पर हुई चर्चा का स्वागत किया, हालाँकि उन्होंने माना कि इस वार्ता से निकले सुरक्षा नियम अभी कमज़ोर हैं। उन्होंने अनुमान लगाया कि फ्रंटियर एआई मॉडल में अमेरिका को लगभग छह महीने की बढ़त हासिल है, लेकिन चीन भी इस तकनीकी युग में पीछे नहीं रहना चाहता।
गौरतलब है कि दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए दोनों महाशक्तियों के बीच यह तकनीकी होड़ गहरे भू-राजनीतिक परिणाम लेकर आ सकती है। सिंगापुर और उसके पड़ोसी देशों की प्राथमिकता तकनीक तक पहुँच, आपूर्ति श्रृंखला को खुला रखना और एआई को अर्थव्यवस्था में प्रभावी ढंग से लागू करना है।
दक्षिण-पूर्व एशिया की रणनीति और भविष्य की राह
बालाकृष्णन ने स्वीकार किया कि दक्षिण-पूर्व एशिया फ्रंटियर एआई मॉडल बनाने में दोनों महाशक्तियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएगा। लेकिन उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के देश सार्वजनिक सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में एआई को लागू करने में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं। इसके लिए शिक्षा प्रणाली में बदलाव और निरंतर कौशल प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी।
वैश्विक एआई गवर्नेंस की यह बहस अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन सिंगापुर की यह पहल संकेत देती है कि छोटे-मध्यम देश भी इस बड़े तकनीकी एजेंडे पर सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार हैं।