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ट्रंप का दावा: ईरान से नई डील जेसीपीओए से बेहतर होगी, जानें क्या था 2015 का परमाणु समझौता

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ट्रंप का दावा: ईरान से नई डील जेसीपीओए से बेहतर होगी, जानें क्या था 2015 का परमाणु समझौता

सारांश

ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर दावा किया कि ईरान से नई परमाणु डील 2015 के जेसीपीओए से बेहतर होगी — वही समझौता जिसे उन्होंने 2018 में 'खराब डील' कहकर तोड़ा था। दोनों डील में ठोस अंतर अभी अस्पष्ट है, लेकिन यह बयान वैश्विक परमाणु कूटनीति में नई हलचल का संकेत है।

मुख्य बातें

डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर दावा किया कि ईरान के साथ प्रस्तावित नई डील जेसीपीओए से बेहतर होगी।
जेसीपीओए ( 2015 ) ईरान और छह विश्व शक्तियों के बीच हुआ परमाणु समझौता था, जिसमें यूरेनियम संवर्धन 3.67% तक सीमित था।
ईरान ने सेंट्रीफ्यूज संख्या 20,000 से घटाकर 6,104 करने और अराक रिएक्टर को पुनः डिज़ाइन करने पर सहमति दी थी।
समझौते के बदले ईरान को अरबों डॉलर की राहत मिली, जिसमें 1.7 अरब डॉलर नकद शामिल थे।
ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को जेसीपीओए से बाहर निकाला था; नई डील की शर्तें अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान के साथ प्रस्तावित नया परमाणु समझौता पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में हुए जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओए) से कहीं अधिक मज़बूत और प्रभावी होगा। ट्रंप ने यह बात अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर शनिवार को पोस्ट की, जिसमें उन्होंने 2015 के समझौते को अमेरिका के लिए 'खराब डील' करार दिया।

जेसीपीओए क्या था और कैसे हुआ था यह समझौता

2015 में ईरान और छह प्रमुख विश्व शक्तियों — अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, रूस और चीन — के बीच एक ऐतिहासिक परमाणु समझौता संपन्न हुआ था। इसे 'संयुक्त व्यापक कार्ययोजना' यानी जेसीपीओए के नाम से जाना जाता है। इस समझौते का मूल उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगाम लगाना और बदले में उस पर आरोपित अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देना था।

समझौते की प्रमुख शर्तें

जेसीपीओए के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कई अहम प्रतिबंध स्वीकार किए थे। संवर्धित यूरेनियम का भंडार 300 किलोग्राम से कम तक सीमित करना था, और यूरेनियम संवर्धन का स्तर 3.67 प्रतिशत तक रखना था। तुलनात्मक रूप से, परमाणु हथियार निर्माण के लिए लगभग 90 प्रतिशत संवर्धन आवश्यक होता है, जबकि नागरिक बिजली उत्पादन के लिए 3.67 प्रतिशत पर्याप्त माना जाता है।

इसके साथ ही, यूरेनियम संवर्धन में प्रयुक्त सेंट्रीफ्यूज मशीनों की संख्या लगभग 20,000 से घटाकर 6,104 करने पर सहमति बनी। ईरान के अराक हेवी वॉटर रिएक्टर को पुनः डिज़ाइन किया गया ताकि उससे हथियार-योग्य प्लूटोनियम का उत्पादन न हो सके।

अंतरराष्ट्रीय निगरानी और आर्थिक राहत

जेसीपीओए की एक उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि इसने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) को ईरान के परमाणु ठिकानों की व्यापक और कठोर निगरानी का अधिकार दिया। इसे उस समय दुनिया की सबसे सख्त परमाणु निरीक्षण व्यवस्थाओं में से एक माना गया था। बदले में, ईरान को अरबों डॉलर की आर्थिक राहत मिली, जिसमें 1.7 अरब डॉलर नकद शामिल थे।

ट्रंप की आपत्तियाँ और 2018 में वापसी

ट्रंप के अनुसार, जेसीपीओए की शर्तें पर्याप्त सख्त नहीं थीं और इस समझौते से मिली आर्थिक राहत का उपयोग ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम और 'आक्रामक नीतियों' को आगे बढ़ाने में किया। इसी आधार पर 2018 में ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका को जेसीपीओए से बाहर निकाल लिया और ईरान पर पुनः कड़े आर्थिक प्रतिबंध लागू कर दिए।

नई डील की स्थिति और आगे की राह

ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर दावा किया कि प्रस्तावित नया समझौता जेसीपीओए से बेहतर होगा, हालाँकि दोनों समझौतों में ठोस अंतर क्या होगा, यह अभी तक स्पष्ट नहीं किया गया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कूटनीति को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें टिकी हुई हैं। आने वाले हफ्तों में दोनों पक्षों की वार्ता की दिशा यह तय करेगी कि नई डील की रूपरेखा क्या होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसी की तुलना में अपनी नई डील को बेहतर बताना एक कूटनीतिक दांव है — न कि ठोस नीतिगत खाका। असली सवाल यह है कि नई डील में सत्यापन तंत्र, समय-सीमा और प्रतिबंध-राहत की शर्तें क्या होंगी, जो अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई हैं। जेसीपीओए से अमेरिकी वापसी के बाद ईरान ने यूरेनियम संवर्धन का स्तर काफी बढ़ा लिया है, जिससे नई बातचीत की ज़मीन 2015 से कहीं अधिक जटिल हो चुकी है। बिना विस्तृत शर्तों के, यह बयान कूटनीतिक संकेत अधिक लगता है, नीतिगत घोषणा कम।
RashtraPress
29 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जेसीपीओए क्या है और यह कब हुआ था?
जेसीपीओए यानी 'जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन' 2015 में ईरान और छह विश्व शक्तियों — अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और चीन — के बीच हुआ परमाणु समझौता था। इसका उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना और बदले में उस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में राहत देना था।
ट्रंप ने जेसीपीओए को 'खराब डील' क्यों कहा?
ट्रंप का कहना है कि जेसीपीओए की शर्तें पर्याप्त सख्त नहीं थीं और इस समझौते से मिली आर्थिक राहत — जिसमें 1.7 अरब डॉलर नकद शामिल थे — का उपयोग ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम और 'आक्रामक नीतियों' को बढ़ावा देने में किया। इसी आधार पर उन्होंने 2018 में अमेरिका को इस समझौते से बाहर निकाल लिया था।
जेसीपीओए के तहत ईरान पर क्या प्रतिबंध थे?
जेसीपीओए के तहत ईरान को यूरेनियम संवर्धन 3.67 प्रतिशत तक सीमित रखना था, संवर्धित यूरेनियम का भंडार 300 किलोग्राम से कम रखना था, और सेंट्रीफ्यूज मशीनों की संख्या लगभग 20,000 से घटाकर 6,104 करनी थी। इसके अलावा, अराक हेवी वॉटर रिएक्टर को पुनः डिज़ाइन किया गया ताकि हथियार-योग्य प्लूटोनियम उत्पादन न हो सके।
ट्रंप की प्रस्तावित नई ईरान डील जेसीपीओए से कैसे अलग होगी?
ट्रंप ने दावा किया है कि नई डील जेसीपीओए से बेहतर होगी, लेकिन अभी तक दोनों समझौतों के बीच ठोस अंतर सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। नई डील की विस्तृत शर्तें, सत्यापन तंत्र और समय-सीमा अभी स्पष्ट नहीं है।
आईएईए की जेसीपीओए में क्या भूमिका थी?
जेसीपीओए ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) को ईरान के परमाणु ठिकानों की व्यापक और कठोर निगरानी का अधिकार दिया था। इसे उस समय दुनिया की सबसे सख्त परमाणु निरीक्षण व्यवस्थाओं में से एक माना गया था।
राष्ट्र प्रेस
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