वैश्विक विकास पहल के 5 साल: 130 देश जुड़े, 2,300 करोड़ डॉलर की पूंजी जुटाई
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र के 2030 सतत विकास लक्ष्यों की समय-सीमा से महज चार साल पहले, वैश्विक विकास का परिदृश्य गहरी चिंता में है — 139 मूल्यांकन सूचकांकों में से केवल 36 प्रतिशत सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, जबकि करीब 15 प्रतिशत बेसलाइन से भी नीचे खिसक चुके हैं। इस संकट के जवाब में 2021 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग द्वारा प्रस्तुत वैश्विक विकास पहल (Global Development Initiative) अब पाँच वर्षों की व्यावहारिक परीक्षा से गुज़र चुकी है।
वैश्विक विकास की वर्तमान स्थिति
आँकड़ों के अनुसार, विश्व में प्रत्येक दस में से एक व्यक्ति अति गरीबी में जी रहा है और 23 करोड़ लोग खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। करीब आधे सूचकांक अत्यंत धीमी गति से आगे बढ़ रहे हैं। विकसित और विकासशील देशों के बीच — अर्थात उत्तर और दक्षिण के बीच — की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति वैश्विक शासन में विकास के मुद्दे को दीर्घकाल से हाशिये पर रखे जाने का परिणाम है।
वैश्विक विकास पहल: मुख्य सिद्धांत
वैश्विक विकास पहल छह मूल स्तंभों पर आधारित है — विकास को प्राथमिकता देना, जनकेंद्रित दृष्टिकोण, सार्वभौमिकता और समावेश, नवाचार-संचालित प्रगति, मानव व प्रकृति का समन्वयपूर्ण सहअस्तित्व, और कार्रवाई-उन्मुख रुख। शी चिनफिंग के अनुसार, मतभेद और भू-राजनीतिक तनाव के इस दौर में विकास को वैश्विक एजेंडे के केंद्र में रखना अनिवार्य है।
पाँच वर्षों में ठोस उपलब्धियाँ
अब तक 130 से अधिक देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस पहल में भागीदारी की है। 100 से अधिक देशों ने चीन के साथ सहयोग दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर किए हैं और 88 देश 'वैश्विक विकास पहल मित्र समूह' में शामिल हो चुके हैं।
चीन-संयुक्त राष्ट्र शांति व विकास कोष तथा दक्षिण-दक्षिण सहयोग कोष जैसे मंचों के ज़रिये इस पहल ने कुल 2,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर की पूंजी जुटाई है। इसमें चीन ने स्वयं 400 करोड़ अमेरिकी डॉलर का योगदान दिया है।
यह ऐसे समय में आया है जब बहुपक्षीय विकास वित्तपोषण पर वैश्विक आम सहमति कमज़ोर पड़ रही है। गौरतलब है कि पहल के तहत 1,800 से अधिक सहयोगी परियोजनाएँ लागू की जा चुकी हैं और 2 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया गया है, जिससे 120 से अधिक देशों की जनता को प्रत्यक्ष लाभ मिला है।
आलोचना और संतुलित दृष्टिकोण
कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि इस पहल की प्रभावशीलता का स्वतंत्र मूल्यांकन अभी सीमित है और परियोजनाओं के दीर्घकालिक परिणामों पर पारदर्शी आँकड़े उपलब्ध कराए जाने चाहिए। यह भी उल्लेखनीय है कि पहल की सफलता काफी हद तक भाग लेने वाले देशों की घरेलू नीतिगत क्षमता पर निर्भर करती है।
आगे की राह
2030 की समय-सीमा को देखते हुए, विशेषज्ञों का मत है कि यदि भाग लेने वाले देश इस ढाँचे के तहत समन्वित प्रयास जारी रखें, तो सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति संभव है। अगले चार वर्षों में इस पहल की वास्तविक परीक्षा यह होगी कि क्या वित्तपोषण और प्रशिक्षण ज़मीनी स्तर पर मापनीय बदलाव ला सकते हैं।