मुंबई की 13,500 जर्जर इमारतों के लिए आदित्य ठाकरे ने CM फडणवीस को लिखा पत्र, तत्काल फंड की मांग
सारांश
Key Takeaways
- आदित्य ठाकरे ने 24 अप्रैल 2025 को CM देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर तत्काल विशेष फंड जारी करने की मांग की।
- मुंबई में 13,500 से अधिक जर्जर सेस्ड इमारतें हैं, जिनमें से कई 50 से 80 वर्ष पुरानी हैं।
- मुंबई बिल्डिंग रिपेयर एंड रिकंस्ट्रक्शन बोर्ड (एमबीआरआरबी) इस समय गंभीर वित्तीय संकट में है।
- सेस्ड इमारतों को कैटेगरी ए, बी और सी में बांटा गया है — 1940 से पहले, 1940-1950 और 1950-1969 के बीच निर्मित।
- रेंट कंट्रोल कानून के तहत इन इमारतों का किराया मात्र 100 से 500 रुपए प्रतिमाह है, जिससे मरम्मत फंड अपर्याप्त रहता है।
- ठाकरे ने पुनर्विकास प्रक्रिया को भी तेज करने की मांग की, जो वर्षों से सरकारी प्रक्रियाओं में अटकी है।
मुंबई, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। शिवसेना (उद्धव गुट) के नेता आदित्य ठाकरे ने शुक्रवार, 24 अप्रैल को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को एक अहम पत्र लिखकर मुंबई की 13,500 से अधिक जर्जर इमारतों की मरम्मत के लिए तत्काल विशेष फंड जारी करने की मांग की है। मानसून से पहले इन खस्ताहाल इमारतों की मरम्मत न होने पर हजारों मुंबईकरों की जान खतरे में पड़ सकती है।
क्या है पूरा मामला
आदित्य ठाकरे ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से कहा कि मुंबई में हजारों परिवार आज भी जानलेवा परिस्थितियों में रहने को विवश हैं। इनमें से अनेक इमारतें 50 से 80 वर्ष पुरानी हैं और मानसून सीजन शुरू होने से पहले इनकी आपातकालीन मरम्मत अनिवार्य है।
उन्होंने यह भी बताया कि मुंबई बिल्डिंग रिपेयर एंड रिकंस्ट्रक्शन बोर्ड (एमबीआरआरबी) इस समय गंभीर वित्तीय संकट से गुजर रहा है, जिसके चलते जरूरी मरम्मत कार्य ठप पड़े हैं। ठाकरे ने साफ कहा कि फंड की कमी के नाम पर मुंबईवासियों की सुरक्षा से कोई समझौता स्वीकार्य नहीं है।
सेस्ड इमारतें — क्या है यह विशेष श्रेणी
हाउसिंग विभाग के अनुसार, मुंबई में 'सेस्ड इमारतें' एक अलग कानूनी श्रेणी में आती हैं। ये मुख्यतः दक्षिण मुंबई की वे पुरानी निजी इमारतें हैं जो 1969 से पहले निर्मित हुई थीं। इन इमारतों के किरायेदार म्हाडा को 'रिपेयर सेस' यानी एक विशेष कर चुकाते हैं, और इसके बदले इनकी रखरखाव व मरम्मत की जिम्मेदारी म्हाडा की होती है।
इन इमारतों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है — कैटेगरी ए (1940 से पहले निर्मित, सर्वाधिक जोखिम), कैटेगरी बी (1940-1950 के बीच निर्मित) और कैटेगरी सी (1950-1969 के बीच निर्मित)।
किराया नियंत्रण कानून बना सबसे बड़ी बाधा
चूंकि ये इमारतें रेंट कंट्रोल एक्ट के दायरे में आती हैं, इसलिए इनका मासिक किराया मात्र 100 से 500 रुपए तक सीमित है। इस कारण मकान मालिक मरम्मत में रुचि नहीं दिखाते। दूसरी ओर, म्हाडा द्वारा एकत्रित 'सेस' की राशि भी इन जर्जर इमारतों की भारी मरम्मत लागत को पूरा करने में अपर्याप्त साबित होती है।
सूत्रों के अनुसार, इन इमारतों का पुनर्विकास (री-डेवलपमेंट) ही स्थायी समाधान है, लेकिन यह प्रक्रिया अक्सर मकान मालिक-किरायेदार विवाद, छोटे भूखंड और डेवलपर्स के लिए अपर्याप्त व्यावसायिक लाभ के कारण वर्षों से अटकी हुई है।
पुनर्विकास में तेजी की मांग
आदित्य ठाकरे ने राज्य सरकार से इस स्थिति को आपात स्थिति घोषित करते हुए विशेष वित्तीय पैकेज देने की अपील की है ताकि भारी बारिश के मौसम में कोई दुर्घटना न हो। साथ ही उन्होंने सरकारी प्रक्रियाओं में वर्षों से फंसे पुनर्विकास प्रोजेक्ट्स को भी तेज करने की मांग की।
गौरतलब है कि मुंबई में हर मानसून सीजन में जर्जर इमारतें गिरने की घटनाएं सामने आती हैं। 2017 में भेंडी बाजार इमारत हादसे में दर्जनों लोगों की जान गई थी। ऐसे में यह मांग महज राजनीतिक नहीं, बल्कि जनसुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है।
अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस इस पत्र पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या राज्य सरकार मानसून 2025 से पहले विशेष फंड जारी करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाती है।