बड़ा झटका: राघव चड्ढा समेत 6 'आप' सांसदों ने पार्टी छोड़ी, भाजपा में होंगे शामिल
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली, 24 अप्रैल: आम आदमी पार्टी (AAP) को गुरुवार को उस समय करारा झटका लगा जब पार्टी के वरिष्ठ राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने पार्टी से औपचारिक इस्तीफे की घोषणा करते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का ऐलान किया। उनके साथ डॉ. संदीप कुमार पाठक और अशोक मित्तल भी पार्टी छोड़ने वाले हैं। राघव चड्ढा ने दावा किया कि स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, बलबीर सिंह सीचेवाल और विक्रमजीत सिंह साहनी भी 'आप' से अलग हो रहे हैं।
क्या है पूरा घटनाक्रम?
पिछले कई महीनों से राघव चड्ढा को पार्टी के भीतर हाशिए पर धकेला जा रहा था। हाल ही में उन्हें राज्यसभा में 'आप' के उपनेता पद से हटाकर अशोक मित्तल को यह जिम्मेदारी दी गई थी। राजनीतिक विश्लेषक इसे चड्ढा को संगठन में कमजोर करने की कोशिश मान रहे थे। इस घटना के बाद से ही अटकलें थीं कि चड्ढा जल्द नया राजनीतिक रास्ता चुन सकते हैं।
'आप' सांसद संजय सिंह ने इस सामूहिक पलायन को 'ऑपरेशन लोट्स' करार दिया है और इसे भाजपा की सुनियोजित रणनीति बताया है। हालांकि, भाजपा की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
कौन हैं ये नेता और क्यों है इनका जाना अहम?
राघव चड्ढा 'आप' के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक और पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट रहे चड्ढा ने 2012 में महज 24 वर्ष की उम्र में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने में भूमिका निभाई थी। वह भारतीय राजनीतिक दलों में सबसे कम उम्र के राष्ट्रीय प्रवक्ता बने और पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष भी रहे।
2020 से मार्च 2022 तक वह दिल्ली के राजेंद्र नगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे और इस दौरान दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली। अप्रैल 2022 से वह पंजाब से राज्यसभा सांसद हैं।
डॉ. संदीप कुमार पाठक पार्टी के संगठन महासचिव रहे हैं और 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में 'आप' की ऐतिहासिक जीत के सूत्रधार माने जाते हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ से स्नातकोत्तर, हैदराबाद व पुणे में उच्च शिक्षा और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है।
सबसे चौंकाने वाला नाम अशोक मित्तल का है, जो लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) के संस्थापक कुलाधिपति हैं। 'आप' ने उन्हें 2022 में पंजाब से राज्यसभा भेजा था और हाल ही में उन्हें राज्यसभा में उपनेता बनाया गया था। अब वे भी राघव चड्ढा के साथ पार्टी छोड़ने की राह पर हैं।
पंजाब की राजनीति पर क्या होगा असर?
यह सामूहिक पलायन महज व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि 'आप' के संगठनात्मक ढांचे पर गहरी चोट है। स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, बलबीर सिंह सीचेवाल और विक्रमजीत सिंह साहनी — ये सभी पंजाब से जुड़े सांसद हैं। इनके एक साथ जाने से पंजाब में 'आप' की जमीनी पकड़ कमजोर पड़ सकती है।
गौरतलब है कि 2022 के पंजाब चुनाव में 'आप' ने 117 में से 92 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया था। लेकिन तब से पार्टी के भीतर असंतोष के संकेत मिलते रहे हैं। संदीप पाठक जैसे संगठन-निर्माता का जाना पार्टी की चुनावी मशीनरी को सीधे प्रभावित कर सकता है।
क्या यह 'ऑपरेशन लोट्स' है?
'आप' के नेता संजय सिंह ने इसे 'ऑपरेशन लोट्स' बताया है — यानी भाजपा द्वारा विपक्षी दलों के नेताओं को तोड़कर अपने पाले में लाने की रणनीति। यह आरोप नया नहीं है। पहले भी कर्नाटक, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में इसी तरह के दलबदल की घटनाएं देखी गई हैं। हालांकि, इस बार 'आप' के भीतर से ही जो असंतोष की आवाजें उठ रही थीं, वे भी इस पलायन की एक वजह मानी जा रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अरविंद केजरीवाल के लिए यह सबसे कठिन दौर है — एक तरफ कानूनी लड़ाइयां और दूसरी तरफ पार्टी के भीतर विश्वसनीय चेहरों का साथ छोड़ना। आने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव पर इसका असर निश्चित तौर पर दिखेगा।