आचार्य रामचंद्र शुक्ल जयंती: हिंदी आलोचना को नया शास्त्र देने वाले साहित्य के शिखर पुरुष
सारांश
मुख्य बातें
आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के उस विरल आचार्य हैं जिन्होंने आलोचना, निबंध और इतिहास-लेखन — तीनों विधाओं को एकसाथ अपने काल का सर्वोच्च शिखर प्रदान किया। उनका जन्म 4 अक्टूबर 1884 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना गाँव में हुआ था। मात्र 56 वर्ष के जीवन में उन्होंने जो साहित्यिक विरासत छोड़ी, वह आज भी हिंदी जगत की धुरी बनी हुई है।
प्रारंभिक जीवन और साहित्यिक अभिरुचि
जब शुक्ल जी मात्र आठ वर्ष के थे, तब उनके पिता की नियुक्ति मिर्जापुर में सदर कानूनगो के रूप में हुई और वे पिता के साथ वहाँ आ गए। पिता उर्दू और अंग्रेजी पर ध्यान देने पर ज़ोर देते थे, किंतु शुक्ल जी पिता की दृष्टि बचाकर हिंदी का अध्ययन करते रहे। परीक्षाओं में उनका प्रदर्शन अपेक्षाकृत साधारण रहा — कई परीक्षाओं में वे असफल भी हुए — परंतु साहित्य, मनोविज्ञान और इतिहास के प्रति उनकी लगन अविचल बनी रही।
मिर्जापुर में पं. केदारनाथ पाठक और भारतेन्दु युग के प्रसिद्ध साहित्यकार बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमधन' के सान्निध्य ने उनके अध्ययन को नई दिशा दी। यहीं उन्होंने हिंदी, उर्दू, संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य का गहन अनुशीलन आरंभ किया, जो आगे चलकर उनके लेखन की अटूट नींव सिद्ध हुई।
जीवन-यात्रा और काशी से जुड़ाव
जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने मिर्जापुर के एक कार्यालय में नौकरी की, किंतु स्वाभिमानी स्वभाव के कारण हेड क्लर्क से मतभेद हो गया और उन्होंने नौकरी छोड़ दी। कुछ समय मिशन स्कूल में ड्राइंग अध्यापक के रूप में भी कार्य किया। 1909-10 के आसपास वे 'हिन्दी शब्द सागर' के संपादन में वैतनिक सहायक के रूप में काशी आए। इस विशाल कोश के प्रधान संपादक बाबू श्यामसुंदर दास थे।
1927 में कोश का कार्य सम्पन्न हुआ। शुक्ल जी द्वारा लिखी गई इसकी विस्तृत भूमिका ही परिवर्तित रूप में 'हिंदी साहित्य का इतिहास' के नाम से प्रकाशित हुई — जो आज भी हिंदी का सर्वाधिक प्रामाणिक इतिहास-ग्रंथ माना जाता है। उन्होंने 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का संपादन भी किया। तत्पश्चात् वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में हिंदी अध्यापक नियुक्त हुए। कुछ काल अलवर में भी रहे, परंतु रुचि का कार्य न मिलने पर पुनः काशी लौट आए। 1937 में वे BHU के हिंदी विभागाध्यक्ष बने और इसी पद पर रहते हुए 1941 में हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया।
साहित्यिक अवदान: बहुआयामी सृजन
शुक्ल जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। उन्होंने ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों में कविताएँ लिखीं। एडविन आर्नल्ड के 'लाइट ऑफ एशिया' का 'बुद्धचरित' नाम से ब्रजभाषा में पद्यानुवाद किया। जोसेफ एडिसन के 'प्लेजर्स ऑफ इमेजिनेशन' का 'कल्पना का आनंद' तथा राखालदास बंद्योपाध्याय के 'शशांक' उपन्यास का हिंदी अनुवाद भी उनकी उपलब्धियों में शामिल है।
सैद्धांतिक समीक्षा पर उनके लेख मृत्यु के पश्चात् 'रस मीमांसा' में संकलित हुए। तुलसी, सूर और जायसी पर लिखी उनकी विस्तृत समीक्षाएँ 'त्रिवेणी' नाम से प्रकाशित हैं। दर्शन के क्षेत्र में 'विश्व प्रपंच' उनकी महत्त्वपूर्ण कृति मानी जाती है।
आलोचना-शास्त्र में क्रांतिकारी योगदान
विद्वान नलिन विलोचन शर्मा ने कहा था कि शुक्ल जी से बड़ा समीक्षक उस युग में किसी भी भारतीय भाषा में नहीं था — और यह उक्ति आज भी प्रासंगिक प्रतीत होती है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी अपनी समीक्षा-पद्धति को युगानुकूल बनाना। रस और अलंकार का प्रयोग पूर्व से चला आ रहा था, किंतु उन्होंने मनोविज्ञान के प्रकाश में और पाश्चात्य शैली की कसौटी पर उनकी ऐसी अभिनव व्याख्या प्रस्तुत की कि ये सिद्धांत बहिष्कृत होने से बच गए। उन्होंने आलोचना का ढाँचा भारतीय रखा, किंतु रचना-विधान पश्चिम से ग्रहण किया।
उन्होंने काव्य को कर्मयोग और ज्ञानयोग के समकक्ष 'भाव योग' की संज्ञा दी — जो मनुष्य के हृदय को मुक्तावस्था में पहुँचाता है। उन्होंने काव्य को 'सिद्धावस्था' और 'साधनावस्था' में विभाजित किया। साहित्येतिहासकार के रूप में उन्होंने पहली बार केवल कवि-वृत्त-संग्रह से आगे बढ़कर साहित्य को 'शिक्षित जनता' से जोड़ा और सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर काल-विभाजन एवं नामकरण किया।
गौरतलब है कि उनसे पूर्व हिंदी साहित्य का कोई व्यवस्थित इतिहास नहीं था — शुक्ल जी ने यह रिक्तता न केवल भरी, बल्कि ऐसा वैज्ञानिक ढाँचा दिया जो आगे की पीढ़ियों के लिए आदर्श बना। रामचंद्र शुक्ल हिंदी के पहले ऐसे आचार्य थे जिन्होंने बिना किसी पूर्वाग्रह के हर मत को अपने विवेक की कसौटी पर परखा — और इसीलिए वे आज भी हिंदी आलोचना के शिखर पर अकेले और अपराजेय खड़े हैं।