यादों में 'हरिऔध' और विजयानंद: कानूनगो और वकील की अद्वितीय यात्रा
सारांश
Key Takeaways
- अयोध्या सिंह उपाध्याय ने खड़ी बोली का पहला महाकाव्य 'प्रियप्रवास' लिखा।
- विजयानंद त्रिपाठी ने 'रामचरितमानस' की गहन मीमांसा की।
- दोनों की कहानियाँ साहित्य में क्रांति लाने वाली हैं।
- १६ मार्च की तारीख हिंदी साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- इनकी रचनाएँ आज भी प्रेरणा देती हैं।
नई दिल्ली, १५ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं होतीं; वे युगों के अंत और आरंभ की साक्षी होती हैं। भारतीय साहित्य और विचारों के क्षेत्र में १६ मार्च एक ऐसी अद्भुत और रहस्यमयी तारीख है। इस दिन ने हिंदी जगत से उसके दो सबसे महान साधकों को छीन लिया। जब १६ मार्च १९४७ को अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने अंतिम सांस ली, और ठीक आठ वर्ष बाद १६ मार्च १९५५ को विजयानंद त्रिपाठी इस धरती से विदाई ली।
लेकिन इन दोनों की कहानी उनके अंत से नहीं, बल्कि उनके उस विद्रोही और आश्चर्यजनक आरंभ से शुरू होती है, जिसने स्थापित मान्यताओं को चुनौती दी थी।
कल्पना कीजिए १९वीं सदी के अंत में एक युवा का, जो बनारस के प्रसिद्ध क्वींस कॉलेज में पढ़ाई करने गया। उसकी आँखों में अंग्रेजी शिक्षा और सुनहरे भविष्य के सपने थे, लेकिन अचानक एक गंभीर बीमारी ने उसे घेर लिया। उसे अपनी पढ़ाई बीच में छोड़कर अपने गाँव निजामाबाद (आजमगढ़) लौटना पड़ा। उस समय यह किसी भी युवा के लिए जीवन का अंत माना जाता, लेकिन अयोध्या सिंह उपाध्याय के लिए यह एक नए महाकाव्य की शुरुआत थी।
१५ अप्रैल १८६५ को आजमगढ़ में जन्मे अयोध्या सिंह उपाध्याय ने संघर्ष नहीं किया। बिना किसी गुरु या स्कूल के, उन्होंने अपने घर की चारदीवारी में खुद को सीमित कर लिया और स्वाध्याय की वह ज्वाला प्रज्वलित की, जिससे वे संस्कृत, फारसी, उर्दू और अंग्रेजी के विद्वान बनकर उभरे।
अयोध्या सिंह उपाध्याय का असली जीवन और भी दिलचस्प था। वे पेशे से 'कानूनगो' (राजस्व अधिकारी) थे। दिनभर वे गाँवों में काम करते, किसानों की बातें सुनते, जमीनें मापते, और रात में लालटेन की रोशनी में 'खड़ी बोली' का व्याकरण तैयार करते, जिसे तत्कालीन आलोचक 'कर्कश और नीरस' कहकर नकारते थे। आलोचकों का मानना था कि खड़ी बोली में ब्रज भाषा की मिठास नहीं है, इसलिए इसमें महाकाव्य नहीं लिखा जा सकता।
अयोध्या सिंह उपाध्याय ने इस चुनौती को स्वीकार किया और १९१४ में 'प्रियप्रवास' की रचना की, खड़ी बोली का पहला महाकाव्य! उन्होंने कठिन संस्कृत के 'मंदाक्रांता' छंद को आधुनिक हिंदी में इस तरह पिरोया कि आलोचक दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो गए। सबसे क्रांतिकारी कदम था उनका 'राधा' का चित्रण। उन्होंने पारंपरिक राधा को, जो कृष्ण के विरह में केवल रोती रहती थी, एक 'लोक-सेविका' में बदल दिया। उनकी राधा अपने आंसुओं को समाज सेवा का हथियार बनाती है।
वे 'प्रिय प्रवास' जैसी संस्कृतनिष्ठ रचना कर रहे थे, साथ ही अपने कानूनगो के अनुभव का उपयोग करके 'ठेठ हिंदी का ठाठ' नामक उपन्यास लिख रहे थे, जिसमें उन्होंने जानबूझकर एक भी संस्कृत या विदेशी शब्द का प्रयोग नहीं किया। यह उनकी भाषाई जादूगरी का चरम था।
अयोध्या सिंह उपाध्याय जहां भाषा को आधुनिक बना रहे थे, वहीं काशी के भदैनी इलाके में एक और क्रांति का आरंभ हो रहा था। यह कहानी विजयानंद त्रिपाठी की है। वे कोई पारंपरिक साधु-संन्यासी नहीं थे। वे इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक बेहद सफल, प्रभावशाली और अमीर वकील थे। लेकिन सफलता की उस ऊँचाई पर पहुँचकर, जहाँ आम इंसान दुनिया को मुट्ठी में करने का सपना देखता है, विजयानंद त्रिपाठी के भीतर एक अजीब वैराग्य की लहर उठी।
उन्होंने एक झटके में वकालत का काला कोट उतार दिया, सांसारिक जीवन को अलविदा कहा और राम-भक्ति के केंद्र अयोध्या की ओर बढ़ चले। एक वकील अब एक आध्यात्मिक जिज्ञासु बन चुका था। योग और वेदांत की कठिन साधना के बाद, उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट उठाया, गोस्वामी तुलसीदास की 'रामचरितमानस' की तार्किक और दार्शनिक मीमांसा, जिसे आज 'विजया टीका' के नाम से जाना जाता है।
विजयानंद त्रिपाठी ने रामचरितमानस को एक भक्त की नहीं, बल्कि एक वकील और एक 'जासूस' की दृष्टि से पढ़ा। उन्होंने देखा कि प्रिंटिंग प्रेस वालों ने अपनी अज्ञानता में तुलसीदास की मूल चौपाइयों का कचरा कर दिया है। १६वीं सदी की लिपियों का अध्ययन करके उन्होंने साबित किया कि प्रकाशकों ने 'च्छ' को 'छ' पढ़ लिया और मात्राओं को पूरा करने के लिए बेकार के वैदिक चिह्न जोड़ दिए।
उनकी कुशाग्रता का सबसे बड़ा प्रमाण है 'मानस की तिथि तालिका'। उन्होंने रामचरितमानस में वर्णित मौसमों और नक्षत्रों के विवरण का खगोलीय और गणितीय विश्लेषण किया और साबित कर दिया कि राम और सीता का पुष्पवाटिका में पहला मिलन 'आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी' को ही हुआ था।
स्वतंत्रता के बाद जब भारत में 'हिंदू कोड बिल' आया, तो यह संन्यासी फिर से एक बौद्धिक योद्धा बन गया। उन्होंने 'सन्मार्ग' पत्रिका के संपादक के रूप में अपनी ओजस्वी लेखनी से पारंपरिक धर्म की रक्षा की।
अयोध्या सिंह उपाध्याय १९४७ में तब विदाई हुए जब भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो रहा था, और उन्होंने हिंदी को भाषाई स्वतंत्रता दिला दी थी। विजयानंद त्रिपाठी १९५५ में तब गए जब एक नया राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक और विधिक पहचान खोज रहा था।