जब भगत सिंह को मुक्त कराने के लिए ट्रक चलाना सीखा, वही युवा बन गया महान साहित्यकार 'अज्ञेय'
सारांश
Key Takeaways
- अज्ञेय का जीवन साहित्य और क्रांतिकारी गतिविधियों का संगम है।
- उन्होंने भगत सिंह को छुड़ाने के लिए ट्रक चलाना सीखा।
- उनका लेखन प्रयोगवाद की नई दिशा स्थापित करता है।
- वे हिंदी और अंग्रेजी दोनों में कुशल थे।
- उनका योगदान आज भी साहित्य में महत्वपूर्ण है।
नई दिल्ली, 6 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। "हाथों ने कई अनर्थ किए, पग ठौर-कुठौर चले। मन के आगे भी खोटे लक्ष्य रहे, वाणी ने (जाने-अनजाने) सौ झूठ कहे। पर आंखों ने हार, दुख, अवसान, मृत्यु का, अंधकार भी देखा तो सच-सच देखा।" हिंदी साहित्य में जब भी नए प्रयोगवादी कवियों की चर्चा होती है, तो सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' का नाम सबसे पहले आता है। कविता, उपन्यास, निबंध और पत्रकारिता, हर क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले 'अज्ञेय' ने हिंदी साहित्य को पारंपरिक रास्तों से हटाकर प्रयोगवाद की नई दिशा दी।
7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में जन्मे सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन को अन्य कवियों और लेखकों से अलग माना जाता है। उन्होंने साहित्य को अपनी अनूठी रंगत दी। उस समय के साहित्यकारों की स्थिति दीनहीन और उदास थी, लेकिन सच्चिदानंद इस रिवायत को तोड़ने वाले पहले लेखक थे।
चुपचाप चुपचाप
झरने का स्वर, हम में भर जाए,
चुपचाप चुपचाप
शरद की चांदनी झील की लहरों पर तिर आए।
चुपचाप चुपचाप
जीवन का रहस्य जो कहा न जाए,
हमारी ठहरी आंख में गहराए।
चुपचाप चुपचाप
हम पुलकित विराट में डूबें
पर विराट हम में मिल जाए।
एक बार एक इंटरव्यू में प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह ने 'अज्ञेय' के बारे में कहा, "अज्ञेय को प्रयोगवाद से जोड़ा गया, लेकिन मैं मानता हूं कि प्रयोगवाद से उन्हें गलत ढंग से जोड़ा गया।" उन्होंने स्वतंत्रता की बात की, यह सवाल हमेशा बना रहेगा। उन्होंने कहा था कि समाजवादी जो व्यक्ति बना रहा है, वह सांचे में ढला हुआ है। वह स्वतंत्र नहीं है।
उनकी पकड़ सिर्फ हिंदी साहित्य में ही नहीं, बल्कि वे अंग्रेजी के भी अच्छे जानकार थे। यही कारण है कि उन्होंने अपने जीवन में हिंदी और अंग्रेजी दोनों पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया।
लेखन कला ही उनकी प्रतिभा नहीं थी, बल्कि वे क्रांतिकारियों की टोली का भी हिस्सा रहे, जिससे उनके देशप्रेम और समर्पण को समझा जा सकता है। जब वे 18 वर्ष के थे, तब लाहौर में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की टोली में शामिल हुए। उनका सक्रिय क्रांतिकारी जीवन सरदार भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना में भाग लेने से शुरू हुआ। भगत सिंह को बचाने के लिए एक ट्रक का उपयोग करने की योजना बनाई गई और उस ट्रक की स्टेयरिंग 'अज्ञेय' के हाथों में थी। हालांकि, इसके लिए ट्रक ड्राइविंग सीखने के लिए 5 दिन का समय दिया गया था। उनके अंदर जज्बा और देशभक्ति का जुनून था कि वे महज 3 दिन में ही ट्रक चलाना सीख गए। हालांकि, यह अलग बात है कि वह योजना मुखबिरी के कारण सफल नहीं हो पाई।
बाद में वे चंद्रशेखर और भगत सिंह के कहने पर दिल्ली पहुंचे। 1930 में चंद्रशेखर ने 'अज्ञेय' को एक और बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। इस बार 'अज्ञेय' ने बम बनाने की एक गुप्त फैक्ट्री स्थापित की थी। तब टोली में उन्हें 'साइंटिस्ट' कहा जाता था, क्योंकि वे साइंस के छात्र रहे थे और बम बनाने की तकनीक जानते थे। वह गुप्त फैक्ट्री दिल्ली सदर थाने के सामने थी।
जेल में उनके साथी रहे विमल प्रसाद जैन ने एक बार इंटरव्यू में बताया, "चंद्रशेखर आजाद ने उन्हें मकान लेने का काम सौंपा था।" इसके बाद सच्चिदानंद भी वहां एक वैज्ञानिक के तौर पर आए थे। वे लाहौर से साइंस में बीएससी ऑनर्स कर चुके थे। उन्हें बम बनाने के लिए बुलाया गया था, लेकिन पुलिस उनकी तलाश में पहले से थी, इसलिए वे अमृतसर चले गए और वहां एक मस्जिद में मुस्लिम बनकर रहते रहे। वहीं से उनकी गिरफ्तारी हुई थी।
विमल प्रसाद जैन के अनुसार, सेशन जज ने अपने बयान में लिखा था कि इस आदमी (अज्ञेय) को सजा देते हुए मुझे अफसोस होता है। यह 'पीस ऑफ लिटरेचर' है। यह मामूली 'पीस' नहीं है, बल्कि महान 'पीस ऑफ लिटरेचर' है।
"हां दोस्त, तुमने पहाड़ की पगडंडी चुनी और मैंने सागर की लहर।" पहाड़ की पगडंडी स्पष्ट लक्ष्य की ओर जाती हुई, मातबर और भरोसेदार है। "सागर की लहर विशाल, चिकनी और सपाट पर बिछलती, फिसलती हमेशा अदृश्य को टेरती हुई।"
जेल में रहते हुए सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ने कई कहानियां लिखीं।
अज्ञेय नाम के पीछे की कहानी भी दिलचस्प है। उन्होंने एक बार अपनी रचनाएं प्रसिद्ध लेखक जैनेंद्र कुमार के पास प्रकाशन के लिए भेजी थीं। उस समय वे जेल में थे। जैनेंद्र ने वे रचनाएं मुंशी प्रेमचंद को दे दीं, जिन्होंने देखा कि इन रचनाओं पर लेखक का नाम नहीं है। जब उन्होंने जैनेंद्र से लेखक का नाम पूछा तो जवाब मिला कि लेखक का नाम नहीं बताया जा सकता। वह तो 'अज्ञेय' है। इस पर प्रेमचंद ने कहा, "मैं 'अज्ञेय' नाम से ही कहानी छाप दूंगा।" इस तरह सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन को 'अज्ञेय' नाम मुंशी प्रेमचंद से मिला।
जैनेंद्र कुमार ने एक इंटरव्यू में कहा था, "एक दिन शाम को एक साहब उनके पास आए थे। उन्होंने कुछ कागज मेरे सामने रख दिए थे।" वे मुझे पढ़ने के लिए दिए गए थे और तीन दिन बाद वह साहब फिर से आए थे। उन्होंने लेखक का नाम नहीं बताया। जब मैंने कहानी पढ़ने के बाद उन्हें यह लिखकर दिया कि वे अच्छी लगी हैं तो जेल से सामग्री आने लगी थी। कई कहानियां आईं, उनमें से किसी की दो से अधिक प्रतिलिपियां थीं। बाद में मुझसे उन कहानियों को छापने के लिए भी बोला गया था। लेखक का नाम नहीं पता था, इसलिए मैंने 'अज्ञेय' नाम बताकर उन कहानियों को प्रेमचंद के पास छपने के लिए भेजा था।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन का 'भद्रदूत' पहला संग्रह था, जो प्रकाशित हुआ। इसके बाद 'शिखर एक जीवनी' संग्रह लिखा। उनका लेखन और चिंतन का प्रवाह 'सांझ की उदासी' और गहराते काली रात को भोर का बावरा अहेरी के रूप में बिखर गया।