क्या आचार्य शिवपूजन सहाय हिंदी साहित्य के वटवृक्ष हैं?
सारांश
Key Takeaways
पटना, 20 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। 9 अगस्त, 1893 को बिहार के बक्सर (तत्कालीन शाहाबाद) जिले के उनवास गांव में एक बालक का जन्म हुआ, जिसे उसके परिजन प्यार से ‘भोलानाथ’ कहते थे। यही बच्चा आगे चलकर आचार्य शिवपूजन सहाय के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
उनका बचपन गांव की सोंधी मिट्टी, लोकगीतों और सादगी के बीच गुजरा। औपचारिक शिक्षा केवल हाई स्कूल तक ही सीमित रही, लेकिन स्वाध्याय की ऐसी जिज्ञासा जागी कि उन्होंने कई भाषाओं और विधाओं का ज्ञान अपने भीतर समेट लिया।
बनारस के कचहरी में ‘नकल नवीस’ (कॉपीराइटर) के रूप में करियर की शुरुआत करने वाले सहाय का असली लक्ष्य तो साहित्य की दुनिया था। 1921 में जब देश महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की लहर में बह रहा था, तब प्रेमचंद की तरह शिवपूजन सहाय ने भी अपनी सरकारी शिक्षक की नौकरी को छोड़ दिया। यह एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति का राष्ट्र के प्रति सबसे बड़ा बलिदान था।
1926 में जब ‘देहाती दुनिया’ का प्रकाशन हुआ, तो साहित्य जगत में हड़कंप मच गया। उस समय जब उपन्यासों में शहरी समस्याओं और काल्पनिक आदर्शवाद का बोलबाला था, शिवपूजन सहाय ने ‘ठेठ देहाती’ भाषा का सहारा लिया। उन्होंने सिद्ध किया कि गांव की भाषा केवल गंवारू नहीं, बल्कि जीवंत और कलात्मक होती है। फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ के ‘मैला आंचल’ से लगभग 30 साल पहले उन्होंने आंचलिकता की जो नींव रखी, उसने हिंदी कथा-साहित्य को एक नई दिशा दी। उनके उपन्यास का पात्र ‘भोलानाथ’ वास्तव में उनके अपने बचपन का अक्स था।
शिवपूजन सहाय का संपादन कौशल इतना उत्कृष्ट था कि उन्हें शब्दों के जौहरी कहा जाता था। कोलकाता के ‘मतवाला’ मंडल में उनकी मुलाकात महाप्राण निराला से हुई। निराला जैसे विद्रोही कवि को निखारने और उनकी रचनाओं को व्यवस्थित करने में सहाय का बड़ा योगदान था। निराला उन्हें इतना सम्मान देते थे कि उन्होंने ही सहाय को ‘हिंदी भूषण’ की उपाधि दी।
लखनऊ में ‘माधुरी’ के संपादन के दौरान उन्होंने मुंशी प्रेमचंद के साथ काम किया। कहा जाता है कि प्रेमचंद जैसे दिग्गज भी अपनी रचनाओं के भाषाई परिष्कार के लिए शिवपूजन सहाय पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे। उन्होंने प्रेमचंद की प्रसिद्ध ‘रंगभूमि’ का संपादन कर उसे पठनीय बनाया।
शिवपूजन सहाय ने केवल लेखन नहीं किया, बल्कि लेखकों की एक पूरी पौध तैयार की। ‘मारवाड़ी सुधार’, ‘मतवाला’, ‘माधुरी’, ‘जागरण’, ‘बालक’, ‘हिमालय’ और ‘नई धारा’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के प्रतिमान स्थापित किए।
महाकवि जयशंकर प्रसाद के कहने पर उन्होंने ‘जागरण’ की मशाल संभाली और हिंदी आलोचना को नई ऊंचाई दी।
उनका संस्मरण संग्रह ‘वे दिन वे लोग’ आज भी साहित्य प्रेमियों के लिए किसी टाइम मशीन से कम नहीं है। इसमें उन्होंने अपने समकालीनों (प्रसाद, निराला, दिनकर) के जीवन के उन पन्नों को उजागर किया है, जो इतिहास की किताबों में दर्ज नहीं थे।
स्वतंत्रता के बाद उन्होंने ‘बिहार राष्ट्रभाषा परिषद’ की स्थापना और संचालन में अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी। पटना में रहते हुए उन्होंने ‘हिंदी साहित्य और बिहार’ जैसे शोध-परक ग्रंथों का संपादन किया। भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की ‘आत्मकथा’ को साहित्यिक रूप देने का श्रेय भी उन्हें जाता है।
21 जनवरी, 1963 को पटना में इस ‘विनयमूर्ति’ और ‘संपादकाचार्य’ का भौतिक अंत हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी हिंदी के हर उस शब्द में जीवित है जो मिट्टी से जुड़ा है।
आचार्य शिवपूजन सहाय का व्यक्तित्व उस विशाल वटवृक्ष की तरह था, जिसकी शीतल छाया में हिंदी साहित्य का एक पूरा युग विकसित हुआ। उन्हें 1960 में ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया, लेकिन उनका असली सम्मान वह ‘देहाती चेतना’ है, जिसे उन्होंने साहित्य की मुख्यधारा का हिस्सा बनाया।
आज जब हम ‘माता का आंचल’ पढ़ते हैं या ग्रामीण संवेदनाओं की बात करते हैं, तो अनायास ही आचार्य शिवपूजन सहाय का मुस्कुराता हुआ, सौम्य चेहरा आंखों के सामने आ जाता है।