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अमित शाह: भगवान बुद्ध का ज्ञान 2500 वर्षों बाद भी उतना ही प्रासंगिक, लद्दाख में पवित्र अवशेषों के दर्शन का सौभाग्य

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अमित शाह: भगवान बुद्ध का ज्ञान 2500 वर्षों बाद भी उतना ही प्रासंगिक, लद्दाख में पवित्र अवशेषों के दर्शन का सौभाग्य

सारांश

75 वर्षों के बाद भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष लद्दाख पहुंचे और गृह मंत्री अमित शाह ने इसे ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि 2500 वर्षों बाद भी बुद्ध का मध्यम मार्ग और करुणा का संदेश उतना ही प्रासंगिक है — और लद्दाख जैसी धम्म भूमि पर इसका अनुभव और भी गहरा है।

मुख्य बातें

गृह मंत्री अमित शाह ने 1 मई 2025 को लद्दाख में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों की पहली अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी को संबोधित किया।
पवित्र अवशेष 75 वर्षों के बाद पुनः लद्दाख पहुंचे; वैशाख पूर्णिमा के अवसर पर दर्शन उपलब्ध।
शाह ने कहा कि 2500 वर्षों बाद भी भगवान बुद्ध का ज्ञान और मध्यम मार्ग उतना ही प्रासंगिक है।
भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व लुम्बिनी उद्यान में हुआ था; जन्म, ज्ञान-प्राप्ति और महापरिनिर्वाण तीनों एक ही दिन।
दलाई लामा के अनुसार लद्दाख बौद्ध संस्कृति और करुणा की जीवंत प्रयोगशाला है।

गृह मंत्री अमित शाह ने 1 मई 2025 को लद्दाख में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों की पहली अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी को संबोधित करते हुए कहा कि इन पवित्र अवशेषों के दर्शन का सौभाग्य मिलना अपने आप में अत्यंत दुर्लभ और महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि 2500 वर्षों के बाद भी भगवान बुद्ध का ज्ञान और उनके उपदेश उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे।

75 वर्षों के बाद लद्दाख पहुंचे पवित्र अवशेष

अमित शाह ने कहा कि 75 वर्षों के बाद ये पवित्र अवशेष पुनः लद्दाख पहुंचे हैं। उन्होंने स्मरण कराया कि जब 75 साल पहले ये अवशेष यहाँ आए थे, तब यह क्षेत्र अत्यंत दुर्गम था — न सड़कें थीं, न आवागमन के साधन। इसलिए उस समय बहुत कम लोग ही इनके दर्शन कर पाए थे और इनकी आध्यात्मिक ऊर्जा को महसूस कर पाए थे।

शाह ने कहा कि अब वैशाख पूर्णिमा के शुभ अवसर पर इन अवशेषों की वापसी से लद्दाख और कारगिल के बौद्ध धर्म के अनुयायियों सहित अन्य धर्मों के लोग भी इनसे आध्यात्मिक ऊर्जा और दिव्यता का अनुभव प्राप्त करेंगे।

बुद्ध पूर्णिमा का विशेष महत्व

गृह मंत्री ने कहा कि बुद्ध पूर्णिमा हर वर्ष आती है, लेकिन इस वर्ष लद्दाख के लिए यह दिन विशेष रूप से शुभ है क्योंकि भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों की उपस्थिति में ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं भगवान बुद्ध यहाँ विराजमान हों। उन्होंने कहा कि 563 ईसा पूर्व में लुम्बिनी उद्यान में राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ था, जिन्होंने ज्ञानोदय प्राप्त करने के पश्चात 'तथागत बुद्ध' के नाम से ख्याति पाई।

शाह ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि भगवान बुद्ध के अलावा शायद कोई अन्य अवतार नहीं हुआ जिनका जन्म, ज्ञान-प्राप्ति और महापरिनिर्वाण — ये तीनों एक ही दिन घटित हुए हों। उन्होंने बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे सर्वोच्च ज्ञान प्राप्ति के दिन को भी समान रूप से पवित्र बताया।

बुद्ध के संदेश की वैश्विक प्रासंगिकता

अमित शाह ने कहा कि जब भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया और उसका प्रचार-प्रसार किया, तब उन्होंने अनेक भिक्षुओं को संसार में भेजकर ज्ञान का प्रसार कराया। उन्होंने आशा व्यक्त की कि भगवान बुद्ध के संदेश को पूरी दुनिया समझे और मध्यम मार्ग को अपनाकर समाधान के पथ पर आगे बढ़े।

यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर संघर्ष और अशांति के बीच भारत की सभ्यतागत विरासत को नई दृष्टि से देखा जा रहा है। गौरतलब है कि लद्दाख जैसे विविधताओं से भरे क्षेत्र में शांति और सहअस्तित्व का यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।

लद्दाख — धम्म की जीवंत भूमि

लद्दाख सैकड़ों वर्षों से धम्म की जीवंत भूमि रहा है। दलाई लामा के अनुसार लद्दाख की भूमि केवल भौगोलिक भूमि नहीं, बल्कि बौद्ध संस्कृति और करुणा की जीवंत प्रयोगशाला है। जब भी बौद्ध धर्म पर संकट आया, इस भूमि ने बुद्ध के उपदेशों को संरक्षित किया और शांतिकाल में उस ज्ञान को संवर्धित भी किया।

इस ऐतिहासिक प्रदर्शनी के माध्यम से भारत सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह बौद्ध विरासत और आध्यात्मिक कूटनीति को वैश्विक मंच पर प्रमुखता देने के प्रति प्रतिबद्ध है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारत की सभ्यतागत कूटनीति का एक सुविचारित कदम है — ऐसे समय में जब पड़ोसी देशों के साथ तनाव और सीमावर्ती क्षेत्रों में भू-राजनीतिक संवेदनशीलता चरम पर है। लद्दाख जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में बौद्ध विरासत को केंद्र में रखना एक ऐसा संदेश है जो धर्म और राजनीति दोनों को एक साथ साधता है। आलोचक यह भी पूछ सकते हैं कि क्या इस आध्यात्मिक आयोजन के साथ-साथ लद्दाख के लोगों की दीर्घकालिक राज्य-दर्जे की माँग और विकास की आकांक्षाओं पर भी उतनी ही गंभीरता से ध्यान दिया जा रहा है।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों की अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी क्या है?
यह भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों की पहली अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी है, जो 1 मई 2025 को वैशाख पूर्णिमा के अवसर पर लद्दाख में आयोजित की गई। 75 वर्षों के बाद ये अवशेष पुनः लद्दाख पहुंचे हैं, जिससे बौद्ध अनुयायियों और अन्य धर्मों के लोगों को दर्शन का अवसर मिला।
अमित शाह ने बुद्ध के ज्ञान को 2500 वर्षों बाद भी प्रासंगिक क्यों बताया?
गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि भगवान बुद्ध ने जो मध्यम मार्ग और करुणा का संदेश दिया, वह आज के संघर्षग्रस्त विश्व में भी उतना ही सार्थक है। उनके अनुसार बुद्ध का ज्ञान समाधान का वह मार्ग है जिसे पूरी दुनिया को अपनाना चाहिए।
लद्दाख में पवित्र अवशेष 75 वर्षों बाद क्यों आए?
75 वर्ष पूर्व जब ये अवशेष लद्दाख में आए थे, तब यह क्षेत्र अत्यंत दुर्गम था और आवागमन के साधन नहीं थे, इसलिए बहुत कम लोग दर्शन कर सके। अब बेहतर संपर्क और बुनियादी ढाँचे के साथ इस वर्ष वैशाख पूर्णिमा पर पुनः इन्हें लाया गया है।
बुद्ध पूर्णिमा का क्या महत्व है और इस वर्ष यह विशेष क्यों है?
बुद्ध पूर्णिमा भगवान बुद्ध के जन्म, ज्ञान-प्राप्ति और महापरिनिर्वाण — तीनों का स्मरण कराती है, जो एक ही दिन घटित हुए थे। इस वर्ष लद्दाख में पवित्र अवशेषों की उपस्थिति के कारण यह अवसर विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
लद्दाख को बौद्ध धर्म की दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?
लद्दाख सैकड़ों वर्षों से बौद्ध धर्म की जीवंत भूमि रहा है। दलाई लामा के अनुसार यह भूमि बौद्ध संस्कृति और करुणा की जीवंत प्रयोगशाला है, जिसने संकट के समय बुद्ध के उपदेशों को संरक्षित किया और शांतिकाल में उन्हें संवर्धित किया।
राष्ट्र प्रेस
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