मेगा डीएससी-2025 भर्ती घोटाला: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में सीबीआई जांच की मांग, तीन सप्ताह बाद अगली सुनवाई
सारांश
मुख्य बातें
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने मंगलवार, 4 अगस्त को शिक्षक भर्ती परीक्षा 'मेगा डीएससी-2025' में कथित अनियमितताओं की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई की। अदालत ने दलीलें सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद के लिए निर्धारित कर दी है।
मुख्य घटनाक्रम
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता और आंध्र प्रदेश के पूर्व महाधिवक्ता एस. श्रीराम सुब्रह्मण्यम ने हाईकोर्ट के समक्ष पूरी भर्ती प्रक्रिया की सीबीआई जांच का आग्रह किया। उन्होंने तर्क दिया कि सामने आई अनियमितताएं कोई अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ये एक व्यापक व्यवस्थागत विफलता की ओर संकेत करती हैं जिसने पूरी भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता को प्रभावित किया।
स्पोर्ट्स कोटा में बदलाव पर सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम ने अदालत को बताया कि सरकार ने मेगा डीएससी-2025 अधिसूचना जारी करने से ठीक पहले स्पोर्ट्स कोटा नीति में बड़े बदलाव किए। उनके अनुसार, स्पोर्ट्स कोटा के तहत आरक्षण 2 प्रतिशत से बढ़ाकर 3 प्रतिशत कर दिया गया और प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने की अनिवार्य शर्त को भी हटा दिया गया।
उन्होंने तर्क दिया कि इन बदलावों से उम्मीदवारों के एक पूर्व-निर्धारित समूह को लाभ पहुँचा और ये बदलाव बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के लागू किए गए। कई उम्मीदवारों को ऐसे खेल प्रमाण-पत्रों के आधार पर नियुक्तियाँ मिलीं जो निर्धारित पात्रता मानदंडों को पूरा नहीं करते थे। वकील ने अदालत के सामने प्रमाण-पत्रों के नमूने भी प्रस्तुत किए और बताया कि कुछ उम्मीदवारों ने मान्यता प्राप्त राज्य या राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के बजाय केवल स्थानीय आयोजनों में भागीदारी दर्शाई थी।
सरकार की पॉलिसी वापसी और विवाद
श्रीराम ने अदालत को बताया कि जनता की व्यापक आलोचना के बाद सरकार ने स्पोर्ट्स कोटा से संबंधित सरकारी आदेश वापस ले लिए। उनके अनुसार, इस वापसी ने ही नीतिगत बदलावों की वैधता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए और एक स्वतंत्र जांच की आवश्यकता को और अधिक प्रासंगिक बना दिया। गौरतलब है कि यह कदम तब उठाया गया जब भर्ती प्रक्रिया पहले से ही विवादों के घेरे में थी।
आरटीआई और साक्ष्य की सीमाएं
वकील ने अदालत को बताया कि प्रस्तुत की गई अधिकांश जानकारियाँ सूचना का अधिकार (RTI) आवेदनों और अन्य सार्वजनिक स्रोतों से प्राप्त की गई हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत के समक्ष केवल कुछ उदाहरण ही पेश किए जा सके क्योंकि सरकार ने पूरी मेरिट सूची सार्वजनिक नहीं की है। उन्होंने यह भी कहा कि कई प्रभावित उम्मीदवार कानूनी कार्रवाई और प्रतिशोध के भय से अदालत का दरवाज़ा खटखटाने से कतरा रहे हैं।
PIL की प्रासंगिकता और आगे की राह
याचिकाकर्ता की राजनीतिक संबद्धता पर उठे सवालों के जवाब में वकील ने स्पष्ट किया कि यह PIL व्यापक जनहित में दायर की गई है, क्योंकि यह मामला हजारों शिक्षक उम्मीदवारों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि जहाँ व्यक्तिगत रिट याचिकाएं व्यक्तिगत शिकायतों का निपटारा कर सकती हैं, वहीं केवल एक PIL ही भर्ती प्रक्रिया में निहित व्यवस्थागत समस्याओं की जांच की मांग उठा सकती है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद निर्धारित की है।